महाराष्ट्र के बीड जिले के जंगलों में इन दिनों एक बाघ की आवाजाही चर्चा में है. कुछ दिन पहले तक यह बाघ पाटोदा तहसील के आसपास देखा गया था, लेकिन अब यह आष्टी वन क्षेत्र में पहुंच गया है. 2 नवंबर को भुरेवाड़ी गांव के पास लगाए गए कैमरा ट्रैप में इसकी तस्वीर कैद हुई. बाघ की मौजूदगी सामने आने के बाद वन विभाग ने आसपास के गांवों के किसानों और लोगों को सावधान रहने की सलाह दी है.
इस बाघ का जन्म यवतमाल के टिपेश्वर वन्यजीव अभयारण्य में हुआ था. वहां से निकलने के बाद इसने महाराष्ट्र के कई जिलों का सफर किया. चंद्रपुर, धाराशिव, लातूर, अहिल्यानगर और सोलापुर होते हुए यह बीड पहुंचा. अब यह एक बार फिर इसी जिले के जंगलों में घूमता दिखाई दे रहा है. वन विभाग के मुताबिक, बीड में करीब एक सदी बाद बाघ की मौजूदगी दर्ज की गई है.
बीड के रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर अमोल मुंडे ने बताया कि 2 नवंबर को सौताडा ग्राम पंचायत के पास भुरेवाड़ी इलाके में लगाए गए कैमरा ट्रैप में बाघ की तस्वीर मिली. इससे पहले यह पाटोदा तहसील में देखा गया था. अब इसकी मौजूदगी आष्टी वन क्षेत्र में दर्ज हुई है. बाघ की तस्वीर सामने आने के बाद वन विभाग ने आसपास के किसानों और गांव वालों को सतर्क रहने की सलाह दी है. खास तौर पर जंगल के किनारे और उससे सटे इलाकों में जाने से बचने को कहा गया है. विभाग इसकी गतिविधियों पर लगातार नजर रख रहा है.
2022 में यवतमाल में हुआ था जन्म
वन अधिकारियों के मुताबिक, इस बाघ का जन्म 2022 में यवतमाल जिले के टिपेश्वर वन्यजीव अभयारण्य में हुआ था. इसकी मां बाघिन T-22 है. बड़ा होने के बाद यह अपने पुराने इलाके से बाहर निकल गया और नए ठिकाने की तलाश में सफर पर निकल पड़ा. बाघों में जवान होने के बाद अपना अलग इलाका तलाशने की प्रवृत्ति होती है. इस दौरान वे भोजन और रहने के लिए सुरक्षित जगह की तलाश में एक जंगल से दूसरे जंगल तक जा सकते हैं. यह बाघ भी इसी तलाश में कई जिलों से होकर गुजरा.
वन विभाग के मुताबिक, यवतमाल से निकलने के बाद यह चंद्रपुर, धाराशिव, लातूर और अहिल्यानगर जिलों से होते हुए बीड पहुंचा. इस बीच इसकी मौजूदगी सोलापुर जिले की बार्शी तहसील के कारी इलाके में भी दर्ज की गई थी. वहां से यह फिर बीड के पाटोदा इलाके में लौट आया.
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अक्टूबर के बीच में बाघ एक बार फिर पाटोदा तहसील के आसपास दिखाई दिया. अधिकारियों के मुताबिक, 17 अक्टूबर को इसने सगलेवाड़ी और जरेवाड़ी में दो मवेशियों का शिकार किया था. इसके बाद नायगांव मयूर यानी पीकॉक अभयारण्य के एक जलस्रोत पर पानी पीते हुए भी इसकी तस्वीर सामने आई. अब नवंबर की शुरुआत में इसकी तस्वीर आष्टी वन क्षेत्र के भुरेवाड़ी के पास मिली है. यानी दो महीने से कुछ ज्यादा समय के भीतर वन विभाग ने इस बाघ की मौजूदगी दूसरी बार दर्ज की है.
करीब 100 साल बाद बीड में दिखा बाघ
वन क्षेत्र अधिकारी अमोल मुंडे ने बताया कि आमतौर पर बाघ साल में तीन-चार बार ही इस इलाके से गुजरते हैं, लेकिन यह बाघ पिछले दो महीनों से कुछ अधिक समय के भीतर ही दो बार देखा गया है. इसकी मौजूदगी को देखते हुए किसानों और ग्रामीणों को सलाह दी गई है कि वे जंगल के बाहरी इलाकों में न जाएं. इससे पहले, अधिकारियों ने बताया था कि लगभग एक सदी बाद बीड में कोई बाघ देखा गया है. पिछले महीने मुंडे ने कहा था कि यवतमाल से निकला यह बाघ चंद्रपुर, धाराशिव, लातूर और अहिल्यानगर जिलों से होते हुए बीड पहुंचा है.
बीड जिले में बाघ की मौजूदगी को खास इसलिए माना जा रहा है, क्योंकि अधिकारियों के मुताबिक यहां करीब एक सदी बाद बाघ देखा गया है. पिछले महीने भी वन विभाग ने इसकी मौजूदगी की जानकारी दी थी. तब बताया गया था कि यवतमाल से निकलकर यह बाघ कई जिलों की सीमाएं पार करता हुआ बीड पहुंचा है. बाघ की मौजूदगी को देखते हुए वन विभाग ने किसानों और गांव वालों से जंगल के आसपास के इलाकों में जाने से बचने की अपील की है.
अगर खेत या किसी जरूरी काम से जंगल के किनारे जाना पड़े तो अकेले जाने से बचें और आसपास की गतिविधियों पर ध्यान रखें. अगर कहीं बाघ दिखाई दे तो उसके करीब जाने, उसे घेरने, भगाने या उसकी तस्वीर लेने के लिए भीड़ लगाने की कोशिश न करें. इसकी सूचना तुरंत वन विभाग को दें. बाघ को छेड़ने या उसके रास्ते में आने से खतरा बढ़ सकता है.
फिलहाल वन विभाग कैमरा ट्रैप के जरिए बाघ की आवाजाही पर नजर रख रहा है. अभी यह साफ नहीं है कि वह आगे किस दिशा में जाएगा या बीड के जंगलों में ही अपना नया ठिकाना बनाएगा. इतना जरूर है कि यवतमाल से शुरू हुआ इसका सफर कई जिलों से गुजर चुका है और अब बीड के गांवों के आसपास रहने वाले लोगों को सतर्क रहने की जरूरत है.