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शिवसेना सिंबल विवाद पर SC में सुनवाई टली, EC के फैसले पर कल फिर होगी बहस

सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के चुनाव चिह्न (तीर-कमान) विवाद पर सुनवाई हुई. इस दौरान चुनाव आयोग के फैसले का समर्थन करते हुए सीनियर एडवोकेट एन. के. कौल ने पार्टी के संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर कानूनी दलीलें पेश कीं. कोर्ट ने मामले की सुनवाई कल दोपहर 2 बजे तक के लिए टाल दी.

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शिवसेना सिंबल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में अब 8 अक्टूबर को सुनवाई होगी. (File Photo- PTI)
शिवसेना सिंबल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में अब 8 अक्टूबर को सुनवाई होगी. (File Photo- PTI)

सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न (तीर-कमान) विवाद पर बुधवार को सुनवाई हुई. कोर्ट में आज सीनियर एडवोकेट एन. के. कौल ने चुनाव आयोग के फैसले के समर्थन में कई कानूनी दलीलें पेश कीं. अब इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई कल दोपहर 2 बजे तक के लिए टाल दी गई है.

सुनवाई के दौरान सीनियर वकील एन.के. कौल ने 'अर्जुन सिंह' मामले के फैसले का हवाला दिया. इसके जरिए उन्होंने राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की अहमियत की बात कही. 

उन्होंने कोर्ट को बताया कि 1990 के दशक से ही चुनाव आयोग का ये नियम और अभ्यास रहा है कि वो सभी राजनीतिक दलों से ये तय करने को कहता है कि उनका पार्टी संविधान लोकतांत्रिक मूल्यों के मुताबिक हो.

कौल ने दलील दी कि साल 2011 में शिवसेना ने खुद लोकतांत्रिक सिद्धांतों के तहत अपने संविधान में बदलाव किए थे. इसके बाद 2018 में भी पार्टी संविधान में संशोधन कर 'अवांस होसिम' जैसी व्यवस्थाएं लाई गईं. हालांकि, चुनाव आयोग के दस्तावेजों के मुताबिक, पार्टी ने 2018 के संशोधित संविधान की कॉपी आयोग को कभी सौंपी ही नहीं थी.

कौल ने बताया कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि 2011 के संविधान के बाद का कोई भी दस्तावेज चुनाव आयोग के पास जमा कराया गया था.

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चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर जोर

याचिकाकर्ताओं की तरफ से उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए वरिष्ठ वकील ने कहा कि चुनाव आयोग एक पूरी तरह से निष्पक्ष और वैध संवैधानिक प्राधिकरण है, जिस पर देश की आम जनता अटूट विश्वास करती है. उन्होंने ये भी कहा कि ये आरोप पूरी तरह बेबुनियाद है कि आयोग का फैसला किसी पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू होता है, जबकि सच्चाई ये है कि आयोग का ये फैसला पूरी तरह से प्रत्याशित है.

कौल ने कहा कि अगर चुनाव आयोग का कोई फैसला पूरी तरह से तर्कहीन हो, तभी अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है. लेकिन इस मामले में चुनाव आयोग ने अपनी समझ और सभी पहलुओं का गंभीरता से अध्ययन करने के बाद ही अपना फैसला लिया है.

सुनवाई के दौरान बेंच के जस्टिस जे. बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कई पुराने फैसले 10वीं अनुसूची (एंटी-डिफेक्शन लॉ) के संशोधन से पहले के हैं. उन्होंने 'सुभाष देसाई' फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि उस आदेश में भी इस बात का रिकॉर्ड है कि पुराने फैसले 10वीं अनुसूची के प्रावधानों के आने से पहले के थे.

बेंच ने सवाल उठाया कि क्या चुनाव आयोग को दूसरे विकल्पों को तरजीह देनी चाहिए थी या विधायी बहुमत परीक्षण ही एकमात्र रास्ता था.

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अदालत ने ये भी माना कि वो सीधे तौर पर चुनाव आयोग के फैसले के 'गुण-दोष' पर दखल नहीं दे सकती, लेकिन फैसले तक पहुंचने की प्रक्रिया की समीक्षा जरूर की जा सकती है. पार्टी के चुनाव चिह्न के साथ जुड़ी ऐतिहासिक भावनाओं और करोड़ों कार्यकर्ताओं की निष्ठा को देखते हुए कोर्ट ये परख रहा है कि क्या आयोग ने सभी परिणामों और पहलुओं पर ठीक से विचार किया था या नहीं.

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