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11वीं पास, उम्र 18 साल और 64 करोड़ का फ्रॉड, AI से फर्जी APK बनाकर जामताड़ा के ठगों को बेचता था कानपुर का मास्टरमाइंड

सूरत साइबर क्राइम सेल ने 18 वर्षीय रोहित शाक्य को गिरफ्तार किया है, जो AI और Telegram की मदद से फर्जी APK फाइलें बनाकर साइबर अपराधियों को बेचता था. पुलिस के अनुसार, उसने 121 नकली ऐप तैयार किए, जो 21,672 मोबाइल में इंस्टॉल हुए. इनसे 54 हजार से अधिक बैंक ट्रांजेक्शन के जरिए करीब 64.38 करोड़ रुपये की ठगी की गई.

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साइबर ठगी के आरोप में 18 साल का युवक अरेस्ट. (Photo: Screengrab)
साइबर ठगी के आरोप में 18 साल का युवक अरेस्ट. (Photo: Screengrab)

देशभर में साइबर ठगी के बढ़ते मामलों के बीच सूरत साइबर क्राइम सेल ने एक ऐसे मास्टरमाइंड को गिरफ्तार किया है, जिसकी उम्र महज 18 साल 6 महीने है. पुलिस के अनुसार, उत्तर प्रदेश के कानपुर से गिरफ्तार रोहित वीरेंद्रसिंह शाक्य सिर्फ 11वीं पास है, लेकिन वह AI और Telegram की मदद से फर्जी और वायरस वाली APK फाइलें तैयार करने में माहिर था. आरोप है कि वह झारखंड के जामताड़ा, हरियाणा और राजस्थान में सक्रिय साइबर अपराधियों को ये APK फाइलें बेचता था. पुलिस का दावा है कि उसके बनाए ऐप्स के जरिए देशभर में करीब 64.38 करोड़ रुपये की साइबर ठगी की गई.

पूरे मामले की जांच सूरत के एक शख्स के साइबर ठगी की शिकायत से हुई. पिछले साल 15 से 18 मई के बीच पीड़ित को व्हाट्सएप पर पंजाब नेशनल बैंक की असली ऐप जैसी दिखने वाली नकली PNB One APK भेजी गई. पीड़ित ने उसे असली समझकर अपने मोबाइल में इंस्टॉल कर लिया. ऐप इंस्टॉल होते ही फोन हैक हो गया और कुछ ही मिनटों में प्राइम को-ऑपरेटिव बैंक के खाते से यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के खाते में पांच लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए गए. पीड़ित ने तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई. इसके बाद सूरत साइबर क्राइम सेल ने जांच शुरू की.

AI और Telegram से बनाता था फर्जी APK

जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि रोहित शाक्य महज 16 साल की उम्र से AI और Telegram की मदद से फर्जी APK तैयार कर रहा था. वह किसी भी बैंक, सरकारी विभाग या निजी कंपनी के नाम से हूबहू दिखने वाली नकली एप्लीकेशन तैयार कर देता था. पुलिस के अनुसार, वह पंजाब नेशनल बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, एक्सिस बैंक, यूको बैंक, यूनियन बैंक, ICICI बैंक, इंडसइंड बैंक, HSBC, बंधन बैंक, फेडरल बैंक, अमेरिकन एक्सप्रेस, बिग बास्केट, डीमार्ट, आधार, पीएम किसान, अस्पताल, कस्टमर केयर और RTO चालान के नाम से भी नकली APK तैयार करता था.

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जॉइंट पुलिस कमिश्नर करणराज वाघेला ने बताया कि आरोपी ने साइबर ठगी को पूरी तरह बिजनेस मॉडल में बदल दिया था. वह दो तरह की एप्लीकेशन तैयार करता था. पहली 'विक्टिम एप्लीकेशन', जिसे लोगों के मोबाइल में इंस्टॉल कराया जाता था. दूसरी एडमिन एप्लीकेशन, जिसके जरिए साइबर अपराधी पीड़ित के मोबाइल में आने वाले OTP, बैंक डिटेल्स और दूसरी संवेदनशील जानकारी अपने मोबाइल पर लाइव देख सकते थे.

15 हजार रुपये महीने में बेचता था साइबर हथियार

इस सॉफ्टवेयर के लिए वह पहले महीने 15 हजार रुपये लेता था. इसके बाद एप्लीकेशन को सक्रिय रखने के लिए हर महीने 15 हजार रुपये का सब्सक्रिप्शन भी वसूलता था. जरूरत के मुताबिक वह कस्टमाइज्ड APK भी तैयार कर देता था. पुलिस की डिजिटल जांच में सामने आया कि आरोपी अब तक कुल 121 फर्जी APK तैयार कर चुका था. ये ऐप देशभर में 21,672 मोबाइल फोन में इंस्टॉल किए गए. इनमें से 2,928 मोबाइल पूरी तरह हैक हो गए. पुलिस के मुताबिक, इन हैक किए गए मोबाइल के जरिए 54,094 बैंक ट्रांजेक्शन किए गए और कुल 64,38,48,837.60 रुपये यानी करीब 64.38 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की गई.

जांच में यह भी सामने आया कि सबसे ज्यादा ठगी RTO चालान के नाम पर बनाए गए APK के जरिए हुई. इसके बाद SBI और PNB के नाम से तैयार नकली एप्लीकेशन का सबसे अधिक इस्तेमाल किया गया. पुलिस के अनुसार, गिरोह सबसे पहले व्हाट्सएप, टेलीग्राम या दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए लोगों को नकली APK भेजता था. फाइल पर बैंक, KYC अपडेट, RTO चालान, सरकारी योजना, कस्टमर केयर या ग्रॉसरी ऐप का नाम लिखा होता था. भरोसा होने पर लोग उसे अपने फोन में इंस्टॉल कर लेते थे. इसके बाद साइबर अपराधी मोबाइल और बैंकिंग से जुड़ी जानकारी तक पहुंच बना लेते थे और खाते से पैसे निकाल लेते थे.

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पुलिस मामले की गहराई से जांच में जुटी

सूरत साइबर क्राइम सेल ने आरोपी के पास से दो मोबाइल फोन और एक लैपटॉप जब्त किया है. सभी उपकरणों की डिजिटल फोरेंसिक जांच कराई जा रही है. पुलिस का मानना है कि जांच के दौरान देशभर में सक्रिय अन्य साइबर गिरोहों और उनके सदस्यों के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है. फिलहाल, सूरत साइबर क्राइम सेल की इस कार्रवाई ने देशभर में फैले साइबर अपराध के बड़े नेटवर्क का खुलासा किया है. महज 18 साल की उम्र में AI और Telegram का इस्तेमाल कर इतने बड़े साइबर नेटवर्क को तकनीकी मदद देने का मामला सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी गंभीर चुनौती बनकर सामने आया है.
 

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