गुजरात के वडोदरा की मांजलपुर विधानसभा सीट पर बीजेपी ने एक बार फिर अपना दबदबा कायम रखा है. सोमवार को घोषित हुए उपचुनाव के नतीजों में पार्टी के उम्मीदवार सतेंद्रभाई पटेल ने कांग्रेस के भीखाभाई रबारी को 30,630 वोटों से हरा दिया. इसके साथ ही 2012 से इस सीट पर चला आ रहा बीजेपी का जीत का सिलसिला भी कायम रहा. यह सीट योगेश पटेल के निधन के बाद खाली हुई थी. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने एक लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी.
देश के तीन उपचुनावों में बिहार और मध्य प्रदेश में बीजेपी को झटका लगा, लेकिन मांजलपुर में पार्टी अपनी सीट बचाने में कामयाब रही. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कम मतदान के बावजूद बीजेपी ने यहां इतनी बड़ी जीत कैसे दर्ज की? आइए जानते हैं वे पांच बड़ी वजहें, जिन्होंने मांजलपुर में बीजेपी का किला बचाए रखा.
1. स्वर्गीय विधायक योगेश पटेल के साथ जनता का जुड़ाव
भाजपा के स्वर्गीय विधायक योगेश पटेल इस इलाके से 8 बार विधायक रहे थे. मांजलपुर सीट अस्तित्व में आने के बाद हुए तीनों चुनाव भी उन्होंने ही जीते थे. साल 2022 में इस सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार की डिपोजिट भी जब्त हो गई थी. इस बार कांग्रेस के प्रत्याशी को ज्यादा वोट मिले, इसलिए वह अपनी डिपोजिट तो बचा पाए, लेकिन जीत नहीं सके. योगेश पटेल के निधन के बाद उनके परिवार से किसी ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया. इसके बाद भाजपा ने अपने पुराने कार्यकर्ता सतीश पटेल को टिकट दिया. योगेश पटेल के काम और नाम का लाभ भी सतीश पटेल को मिला.
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2. भाजपा के मजबूत संगठन
गुजरात को भाजपा का गढ़ ऐसे ही नहीं कहा जाता, क्योंकि राज्य की लगभग हर विधानसभा सीट और बूथ पर भाजपा का मजबूत संगठन है. यही संगठन भाजपा की सबसे बड़ी ताकत है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही गुजरात में हर चुनाव लड़ा जाता है और इसका लाभ भाजपा को हमेशा मिलता है. वडोदरा में भी भाजपा का संगठन हर बूथ पर मजबूत है. यही वजह रही कि कम मतदान के बावजूद भाजपा को 69 प्रतिशत वोट मिले.
3. शहरी इलाकों में भाजपा का दबदबा
गुजरात पूरे देश में सबसे ज्यादा शहरीकरण वाला राज्य है और बड़ी आबादी शहरों में रहती है. ये सभी शहर भाजपा के मजबूत गढ़ हैं. वडोदरा की मांजलपुर सीट भी ऐसी ही शहरी सीट है, जहां शहरी मतदाता ज्यादा हैं. इन्हें भाजपा का कोर वोटर माना जाता है. इसलिए भाजपा पहले से इस सीट को लेकर आश्वस्त थी. इसलिए भाजपा पहले से इस सीट को लेकर आश्वस्त थी और माना जा रहा था कि एकतरफा चुनाव रहेगा और जब नतीजे आए तो यह बात साफ हो गई और सभी 19 राउंड में भाजपा ने अपनी लीड बनाकर चुनाव जीत लिया.
4. राज्य सरकार-संगठन का पूरा जोर
उपचुनाव घोषित होते ही भाजपा ने इस सीट पर पूरी ताकत लगा दी थी. सरकार की ओर से मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल, उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी और प्रदेश अध्यक्ष जगदीश विश्वकर्मा ने प्रचार की कमान संभाली. सरकार की ओर से दो मंत्रियों को भी चुनाव की जिम्मेदारी दी गई, ताकि कहीं कोई चूक न हो. सरकार को पता था कि मतदान कम होगा. ऐसे में भाजपा के कोर वोटर मतदान के लिए बाहर निकलें, इस पर खास ध्यान दिया गया.
5. कमजोर कांग्रेस
गुजरात के शहरी इलाकों में विपक्ष कमजोर है, जिसका सीधा फायदा भाजपा को मिलता है. मांजलपुर सीट से कांग्रेस ने अपने पुराने चेहरे को चुनाव मैदान में उतारा. वह 1985 से 1989 तक कांग्रेस सरकार में राज्यमंत्री रहे थे. इसके बाद अब सीधे 2026 में कांग्रेस ने उन्हें फिर चुनाव मैदान में उतारा. शहरी इलाकों में कांग्रेस का संगठन न के बराबर है. यही वजह रही कि कम मतदान के बावजूद कांग्रेस भाजपा को कड़ी टक्कर नहीं दे पाई.
भाजपा ने यह उपचुनाव तो जीत लिया, लेकिन कम मतदान के पीछे की वजह भी तलाशनी पड़ेगी. गुजरात में हुए पिछले 8 उपचुनावों में 40 प्रतिशत से कम मतदान कभी नहीं हुआ था, जबकि इस बार मांजलपुर में ऐसा हुआ. इसकी वजह ढूंढ़ने से भाजपा अपनी बढ़त और मजबूत कर पाएगी. साल 2022 में स्वर्गीय योगेश पटेल 1 लाख से ज्यादा वोटों से जीते थे, जबकि इस उपचुनाव में सिर्फ 80 हजार से ज्यादा मतदान हुआ. यह भाजपा के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा.