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उमर खालिद की जमानत याचिका पर दिल्ली पुलिस को नोटिस, कोर्ट का दो हफ्ते में जवाब देने का निर्देश

दिल्ली हाई कोर्ट ने उमर खालिद की जमानत याचिका पर आज सुनवाई की. इस दौरान कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से दो दिन के अंदर जवाब देने के लिए कहा है.

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उमर खालिद की जमानत याचिका पर हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है. (फोटो-ITG)
उमर खालिद की जमानत याचिका पर हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है. (फोटो-ITG)

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के मामले में उमर खालिद और शारजील इमाम की नई जमानत याचिकाओं पर दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है. शुक्रवार को अदालत ने इस मामले पर सुनवाई की. कोर्ट ने अगली सुनवाई 27 अगस्त, 2026 को तय की है.

दरअसल, जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस विकास महाजन की बेंच ने आज सुनवाई की. उन्होंने इस मामले में दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से कहा कि वे उमर खालिद की नियमित और अंतरिम जमानत याचिकाओं पर दो हफ्ते के अंदर अपना जवाब दाखिल करें.
इसके अलावा अदालत ने उमर खालिद के मामले को सह-आरोपी शारजील इमाम की जमानत याचिका के साथ जोड़ दिया है. अब इन दोनों मामलों पर 27 अगस्त को एक साथ सुनवाई होगी.

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दरअसल, यह नई अपील कड़कड़डूमा ट्रायल कोर्ट के 4 जुलाई, 2026 के फैसले के खिलाफ दायर की गई है. ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों की जमानत खारिज कर दी थी. ट्रायल कोर्ट का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी, 2026 के पुराने आदेश के मुताबिक, आरोपी सिर्फ तभी नई जमानत मांग सकते हैं जब सुरक्षित गवाहों के बयान दर्ज हो जाएं या फिर उस आदेश को आए हुए एक साल बीत चुका हो.

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हालांकि, उमर खालिद के वकीलों ने हाईकोर्ट के सामने दो मुख्य दलीलें रखी हैं. बचाव पक्ष का कहना है कि आरोपी लगभग छह साल से जेल में बंद हैं. लेकिन मुकदमे में कोई खास प्रगति नहीं हुई है. यहां तक कि अभी तक आरोपों को तय करने पर भी बहस पूरी नहीं हो सकी है. बिना मुकदमे के इतने लंबे समय तक जेल में रखना सही नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अपने ही 5 जनवरी के सख्त आदेश पर कुछ गंभीर आपत्तियां जताई हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इस बड़े सवाल को एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया है कि यूएपीए जैसे कड़े कानून के तहत लंबे समय तक जेल में रखने और जमानत के अधिकारों के बीच कैसे संतुलन बनाया जाए. वकीलों का तर्क है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट से अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक आरोपियों को अंतरिम राहत मिलनी चाहिए.

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