दिल्ली में लगातार हो रहे इमारत गिरने के हादसों ने प्रशासनिक कार्रवाई और सुरक्षा मानकों की पोल खोलकर रख दी है. दिल्ली में हादसे के वक्त तो विभाग हरकत में आता है, लेकिन मीडिया की कवरेज शांत होते ही जांच और सख्त कार्रवाई ठंडे बस्ते में चली जाती है.
ताजा मामला सीमापुरी इलाके का है, जहां 7 अक्टूबर को एक इमारत गिर गई, जिसमें 5 लोगों की जान चली गई. ठीक एक महीने पहले, 6 सितंबर को सत्य निकेतन में भी इसी तरह का दर्दनाक हादसा हुआ था, जहां 7 लोगों की मौत हो गई थी. इससे पहले 30 मई को दक्षिणी दिल्ली के सैदुल्लाजाब में इमारत गिरने से 6 लोगों की मौत हुई थी.
लगातार हो रहे इन हादसों के बीच प्रशासन और संबंधित विभागों की कार्रवाई पर भी सवाल उठ रहे हैं. आरोप है कि किसी हादसे के बाद कुछ दिनों तक कार्रवाई तेज रहती है, लेकिन मामला मीडिया से दूर होते ही विभागीय कार्रवाई भी धीमी पड़ जाती है.
सत्य निकेतन में एक महीने बाद भी कार्रवाई अधूरी
7 अक्टूबर को सीमापुरी में हुए हादसे के बाद 8 अक्टूबर को आजतक की टीम एक बार फिर सत्य निकेतन पहुंची. यहां 6 सितंबर को बिल्डिंग गिरने की घटना हुई थी. हादसे के बाद एमसीडी की ओर से आसपास की कुछ इमारतों को नोटिस देकर कार्रवाई की बात कही गई थी. हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि समय बीतने के साथ यह कार्रवाई भी धीमी पड़ गई.
स्थानीय युवाओं ने बताया कि कई ऐसी इमारतें हैं, जहां हादसे के बाद एमसीडी ने नोटिस तो चस्पा किया, लेकिन करीब एक महीने बाद भी स्थिति में खास बदलाव नहीं दिखा. उनका दावा है कि कुछ इमारतें पहले जैसी ही खड़ी हैं और उनमें लोग रह भी रहे हैं.
'मीडिया का कैमरा हटते ही कार्रवाई धीमी'
स्थानीय लोगों का कहना है कि हादसे के बाद जब मीडिया की मौजूदगी रहती है तो प्रशासन और एमसीडी की कार्रवाई दिखाई देती है, लेकिन कुछ दिन बाद हालात फिर वैसे ही नजर आने लगते हैं. उनका आरोप है कि नोटिस लगाने और कार्रवाई शुरू करने के बाद भी उसका लगातार पालन नहीं कराया जाता.
युवाओं ने कहा कि अगर जर्जर और खतरनाक इमारतों पर समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो ऐसे हादसों को रोकना मुश्किल होगा. उनका कहना है कि लोगों की सुरक्षा सिर्फ नोटिस और कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं रहनी चाहिए.