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रणथंभौर में लेपर्ड पर रहेगी नजर, आबादी की तरफ बढ़ते ही बजेगा अलार्म, इंसानों को पहले मिलेगा अलर्ट

रणथंभौर के जंगल में लेपर्ड निकला और अबकी बार गांव वालों को पहले ही अलर्ट मिल जाएगा. वन विभाग ऐसी तकनीक लगाने जा रहा है, जो लेपर्ड के आबादी की तरफ बढ़ते ही अलर्ट देगी. इसके लिए साइलेंट डिवाइस और हाई ट्रैक सेंसर लगाए जाएंगे. पहले लेपर्ड की खबर मिलने के बाद लोग सतर्क होते थे, अब कोशिश है कि खबर लेपर्ड के पहुंचने से पहले ही मिल जाए.

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अब चीतों की मॉनीटरिंग के लिए लाई जा रही डिवाइस. (Photo: Screengrab)
अब चीतों की मॉनीटरिंग के लिए लाई जा रही डिवाइस. (Photo: Screengrab)

रणथंभौर में अब सिर्फ बाघों की दहाड़ पर ही नजर नहीं रहेगी, बल्कि जंगल में घूम रहे लेपर्ड की हर हलचल को भी तकनीक के जरिए ट्रैक किया जाएगा. सवाई माधोपुर स्थित रणथंभौर टाइगर रिजर्व में इंसानों और वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए वन विभाग एक नई तकनीक का ट्रायल करने जा रहा है. इसके तहत लेपर्ड की निगरानी के लिए साइलेंट डिवाइस और हाई ट्रैक सेंसर लगाए जाएंगे.

इस तकनीक की खास बात यह होगी कि अगर कोई लेपर्ड जंगल से निकलकर आबादी वाले इलाके की ओर बढ़ता है, तो सिस्टम के जरिए अलर्ट जारी किया जा सकेगा. तेज अलार्म की आवाज सुनकर ग्रामीणों को समय रहते सतर्क होने का मौका मिलेगा. साथ ही वन विभाग को भी वन्यजीव की गतिविधि का पता चल सकेगा.

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वन विभाग के मुताबिक, रणथंभौर में साइलेंट डिवाइस और हाई ट्रैक सेंसर का इस्तेमाल राजस्थान के किसी टाइगर रिजर्व में पहली बार किया जा रहा है. देश में केरल में इस तरह की तकनीक का इस्तेमाल वन्यजीवों की निगरानी और ग्रामीणों को अलर्ट करने के लिए किया जा रहा है. इसी मॉडल को देखते हुए रणथंभौर में इसका ट्रायल शुरू करने की तैयारी है.

Sawai Madhopur Ranthambhore Leopard Monitoring Install Silent Devices High Track Sensors

दरअसल, रणथंभौर टाइगर रिजर्व के आसपास बड़ी संख्या में गांव और आबादी वाले क्षेत्र हैं. जंगल की सीमा से सटे इलाकों में वन्यजीवों की आवाजाही कोई नई बात नहीं है. कई बार लेपर्ड जंगल की सीमा से बाहर निकलकर आबादी वाले इलाकों तक पहुंच जाते हैं. ऐसे में इंसानों और वन्यजीवों के आमने-सामने आने का खतरा बढ़ जाता है. अब कोशिश है कि खतरा सामने आने से पहले ही अलर्ट मिल जाए.

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यह भी पढ़ें: तीन महीने बाद खुले रणथंभौर के दरवाजे, तिलक-माला से हुआ स्वागत... पहले दिन ही जंगल सफारी के लिए उमड़े पर्यटक

वन विभाग ने उन इलाकों की पहचान शुरू कर दी है, जहां लेपर्ड की आवाजाही ज्यादा रहती है. सवाई माधोपुर के पुराने शहर के आसपास के इलाकों के अलावा फलोदी रेंज के दूमोंदा, हिंदवाड़ और टोडरा को प्राथमिकता में रखा गया है. इन इलाकों में जंगल से आबादी की ओर आने वाली मुख्य पगडंडियों और कच्चे रास्तों को भी चिह्नित किया गया है. इन्हीं रास्तों पर साइलेंट डिवाइस और हाई ट्रैक सेंसर लगाए जाने की तैयारी है. यानी लेपर्ड को आबादी तक पहुंचने के लिए जिस रास्ते का इस्तेमाल करने की संभावना है, वन विभाग उसी रास्ते पर पहले से निगरानी का इंतजाम करना चाहता है.

Sawai Madhopur Ranthambhore Leopard Monitoring Install Silent Devices High Track Sensors

वन विभाग के मुताबिक, सेंसर किसी वन्यजीव के बारे में पता लगाकर अलर्ट सिस्टम को एक्टिव कर सकता है. इसके बाद बजने वाला अलार्म इतनी दूरी तक सुनाई देने वाला होगा कि आसपास के ग्रामीणों को संभलने का वक्त मिल सके. इसका एक और फायदा बताया जा रहा है. अलार्म की आवाज से लेपर्ड भी डरकर वापस जंगल की ओर लौट सकता है. यानी तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ इंसानों को चेतावनी देने के लिए नहीं, बल्कि वन्यजीव और इंसान के बीच सीधा सामना टालने के लिए भी किया जाएगा.

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रणथंभौर में 170 से ज्यादा लेपर्ड

रणथंभौर टाइगर रिजर्व में करीब 170 से अधिक लेपर्ड होने की बात वन विभाग की ओर से कही गई है. इतनी बड़ी संख्या में लेपर्ड होने के कारण रिजर्व की सीमा और आसपास के इलाकों में उनकी गतिविधियां लगातार बनी रहती हैं. यही वजह है कि वन विभाग अब लेपर्ड की मॉनिटरिंग के लिए तकनीक का सहारा लेने जा रहा है. मकसद साफ है, लेपर्ड आबादी तक पहुंचे, उससे पहले ग्रामीणों को उसकी मौजूदगी की जानकारी मिल जाए.

Sawai Madhopur Ranthambhore Leopard Monitoring Install Silent Devices High Track Sensors

रणथंभौर के डीएफओ मानस सिंह ने बताया कि वन विभाग केरल की तर्ज पर इस अत्याधुनिक तकनीक को यहां अपनाने जा रहा है. उनके मुताबिक, केरल में हाथियों की निगरानी और ग्रामीणों को समय रहते अलर्ट करने के लिए इस तकनीक का सफल इस्तेमाल किया जा रहा है. अब रणथंभौर में इसका ट्रायल लेपर्ड की मॉनिटरिंग के लिए किया जाएगा. अगर यह प्रयोग सफल रहता है तो आने वाले समय में रणथंभौर के दूसरे पैराफेरी और आबादी से सटे इलाकों में भी इसे लगाया जा सकता है.

यानी आने वाले दिनों में जंगल के किनारे रहने वाले लोगों के लिए खतरे का पता लेपर्ड के सामने आने के बाद नहीं, बल्कि उसके आबादी की ओर बढ़ते ही चल सकेगा. वन विभाग को उम्मीद है कि समय पर मिलने वाला यह अलर्ट इंसान और लेपर्ड के बीच होने वाले टकराव को रोकने में मदद करेगा.

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