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क्या BJP ने लिया यू-टर्न, 2027 की जनगणना में जातियों की गिनती पर कांग्रेस ने जताई चिंता

कांग्रेस ने BJP के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर हमला करते हुए आरोप लगाया है कि वह OBC आबादी की संख्या को कम करके दिखाने की कोशिश कर रही है. पार्टी, 2011 की जाति आधारित जनगणना की वैधता पर NDA सरकार के ही तर्क का इस्तेमाल करके उसे घेरने की कोशिश कर रही है.

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2027 जनगणना में 'जाति' पर कांग्रेस का हल्ला बोल (Photo-ITG)
2027 जनगणना में 'जाति' पर कांग्रेस का हल्ला बोल (Photo-ITG)

भारत में दशकों बाद एक बार फिर पूरे देश में जनगणना के दौरान जातियों की गिनती करने की तैयारी चल रही है, लेकिन इस प्रक्रिया को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है. कांग्रेस का कहना है कि जनगणना 2027 में जातियों का नाम दर्ज करने के लिए पूर्व-निर्धारित सूची या 'ड्रॉप-डाउन मेनू' का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, और सरकार द्वारा लोगों से सीधे खुला सवाल पूछकर जाति लिखने के फैसले का विरोध किया जा रहा है.
 
कांग्रेस का आरोप है कि इस खुले तरीके से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की सही संख्या सामने नहीं आ पाएगी और यह ओबीसी आबादी को कम दिखाने की एक "गहरी साजिश" है. अपने दावों को सही साबित करने के लिए कांग्रेस ने केंद्र सरकार के ही 2011 के सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC 2011) से जुड़े पुराने बयानों का सहारा लिया है, इसके अलावा, पार्टी का यह भी आरोप है कि जनगणना 2027 के फॉर्म से ओबीसी श्रेणी का विकल्प जानबूझकर हटाया गया है ताकि समुदाय की असली आबादी का पता न चल सके. 

2021 में सुप्रीम कोर्ट में दिए गए एक हलफनामे में केंद्र ने कहा था कि एक कास्ट रजिस्ट्री और ड्रॉप-डाउन मेनू से आंकड़े अधिक सुसंगत हो सकते थे. राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने अब सवाल पूछा है कि जनगणना 2027 में उस प्रणाली का उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा है जिसे सरकार ने खुद "आदर्श" बताया था. उन्होंने बिहार और तेलंगाना का भी हवाला दिया, जहां पूर्व-निर्धारित जाति सूचियों और कोड्स का उपयोग किया गया था, और चेतावनी दी कि एक खुला प्रश्न फिर से अविश्वसनीय जातिगत आंकड़े पैदा कर सकता है. बिहार और तेलंगाना ने गिनती को अधिक सटीक बनाने के लिए अपने जाति सर्वेक्षणों में पूर्व-निर्धारित जाति सूचियों और कोड्स का उपयोग किया था. इसके अलावा, जातिगत आंकड़ों की सटीकता को लेकर चिंता सिर्फ कांग्रेस तक ही सीमित नहीं है.

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ऑल इंडिया OBC स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AIOBCSA) ने भी ओपन-एंडेड जाति कॉलम रखने की आलोचना की है. इस बीच, मंडल आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिरुद्ध सिंह विद्रोही ने एक राष्ट्रीय जाति मास्टर रजिस्ट्री, स्टैंडर्ड कोड और एक ही जाति की अलग-अलग स्पेलिंग और स्थानीय नामों को मैप करने के लिए एक सिस्टम बनाने की मांग की है. एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव ने भी SECC 2011 में इस्तेमाल किए गए ओपन-एंडेड तरीके को दोहराने के खिलाफ चेतावनी दी थी.

यह बहस ऐसे महत्वपूर्ण वक्त में सामने आई है, जब जनगणना 2027 स्वतंत्र भारत में पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) से इतर अन्य जातियों की गिनती करने के लिए तैयार है. जाति का यह सवाल ऐसे समय में भी सामने आया है, जब जाति और आरक्षण को लेकर प्रतिस्पर्धी नैरेटिव सड़कों और सोशल मीडिया पर वापस लौट आए हैं. यह विवाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले सामने आया है, जिसके लिए सभी राजनीतिक दल पहले से ही लामबंदी में जुट गए हैं.

उत्तर प्रदेश में 8% ब्राह्मण मतदाताओं को साधने में जुटे समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने वादा किया है कि एसपी सरकार बनने के तीन महीने के भीतर राज्य में जातिगत जनगणना कराई जाएगी. समाजवादी पार्टी, कांग्रेस के नेतृत्व वाले INDIA गठबंधन का हिस्सा है, जिसने 2024 के लोकसभा चुनावों में राज्य की 80 सीटों में से 43 पर जीत हासिल की थी, जो कि पिछले चुनाव से 37 सीटों की बड़ी बढ़त थी.

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जनगणना 2027 विवाद के केंद्र में 'जाति' का सवाल

14 अगस्त को केंद्र सरकार ने जनगणना 2027 के दूसरे 'जनसंख्या गणना' (Population Enumeration) चरण के लिए 40 प्रश्नों को अधिसूचित किया, जिसमें जाति सहित प्रत्येक व्यक्ति का विवरण एकत्र किया जाएगा. 'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रश्न संख्या 10 "अनुसूचित जाति (SC)/अनुसूचित जनजाति (ST)/जाति" है, जो कि ओपन-एंडेड होगा. गणना करने वाला व्यक्ति वही जाति या उप-जाति दर्ज करेगा जो जवाब देने वाला व्यक्ति बताएगा.

'द न्यू इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के अनुसार, 16 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जुलाई में आयोजित एक प्री-टेस्ट के बाद इस प्रारूप को बरकरार रखा गया.

प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) के अनुसार, जनगणना के तौर-तरीकों, डिजिटल टूल्स और ट्रेनिंग सिस्टम को परखने के लिए नवंबर 2025 में एक देशव्यापी 'प्री-टेस्ट' आयोजित किया गया था, जिसके तहत लगभग 5,000 जनगणना ब्लॉकों को कवर किया गया.

यह सुनने में तो आसान लगता है, लेकिन भारत में हजारों जातियां और उप-जातियां हैं, जिनके नाम इलाके, भाषा, स्पेलिंग और स्थानीय इस्तेमाल के हिसाब से बदल सकते हैं. इसलिए, चुनौती यह पक्का करने की है कि एक ही सामाजिक समूह के अलग-अलग नामों की पहचान करके उन्हें आखिर में एक साथ कोड किया जाए, ठीक इसी बात पर कांग्रेस ने आपत्ति जताई है.

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कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने आरोप लगाया है कि जनगणना 2027 में जाति पर सवाल पूछने की कार्यप्रणाली जानबूझकर खामियों भरी रखी गई है.

इससे पहले, X पर एक पोस्ट में उन्होंने तर्क दिया था कि यह उम्मीद की जा रही थी कि डेटा जुटाने वाले कर्मचारी राज्यों के हिसाब से बनी जातियों की लिस्ट साथ रखेंगे जैसा कि बिहार और तेलंगाना के जाति सर्वेक्षणों में किया गया था और जवाब के मुताबिक बस सही विकल्प पर टिक लगा देंगे. कर्नाटक से राज्यसभा सांसद रमेश ने कहा कि इस तरह की तैयार लिस्ट न होना सरकार की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

कांग्रेस ने मोदी सरकार पर यह आरोप भी लगाया कि जनगणना के फॉर्म से 'अन्य पिछड़ा वर्ग' (OBC) की कैटेगरी को जानबूझकर हटाया गया है. पार्टी के मुताबिक, यह सब इसलिए किया गया ताकि ओबीसी समुदाय की सही आबादी का आंकड़ा आधिकारिक रिकॉर्ड में न आ सके.

हालांकि, पिछले कुछ चुनावों के रुझान बताते हैं कि बीजेपी ओबीसी वोटरों को अपने पाले में लाने में काफी हद तक कामयाब रही है. भले ही कांग्रेस का यह हमला राजनीतिक हो, लेकिन उन्होंने जो सवाल उठाए हैं वे नए नहीं हैं. खुद केंद्र सरकार भी पहले जातिगत आंकड़ों को जुटाने में आने वाली ऐसी ही व्यावहारिक दिक्कतों का जिक्र कर चुकी है. 

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2011 की जाति जनगणना पर मोदी सरकार का 2021 में रुख

21 सितंबर 2021 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा जमा किया था. यह हलफनामा 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) के आंकड़े सार्वजनिक करने और उनके इस्तेमाल की मांग करने वाली याचिका के खिलाफ था.

समाचार एजेंसी पीटीआई (PTI) की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने माना था कि 2011 की गिनती में कई तकनीकी गलतियां थीं. सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने सफाई दी थी कि इन आंकड़ों को सार्वजनिक न करके भारत के रजिस्ट्रार जनरल (ORGI) दफ्तर में सुरक्षित रखा गया है. इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि बिना प्रोसेसिंग वाले ये आंकड़े तकनीकी कमियों से भरे हुए थे, जिसकी वजह से इनका इस्तेमाल कर पाना मुमकिन नहीं था. 

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने केंद्र सरकार के 2021 वाले हलफनामे के पैराग्राफ 12(d) का हवाला दिया है. इस पैराग्राफ में लिखा था: "2011 की जनगणना से पहले जातियों की कोई आधिकारिक सूची तैयार नहीं की गई थी. जातियों की सूची के लिए सबसे सही तरीका यह होता कि जातियों को चुनने के लिए 'ड्रॉप-डाउन मेनू' दिया जाता, इससे ऐसा डेटा मिल पाता जिस पर भरोसा किया जा सके."

अब कांग्रेस ने सरकार के इसी पुराने जवाब को जनगणना 2027 के खिलाफ अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है. जयराम रमेश ने सवाल उठाया- "अब सवाल यह है कि जब मोदी सरकार ने सितंबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में खुद 'ड्रॉप-डाउन मेनू' की सिफारिश की थी, तो जनगणना 2027 में यह विकल्प क्यों नहीं दिया जा रहा है?"

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वहीं, कांग्रेस के राज्यसभा सांसद सैयद नासिर हुसैन ने सोशल मीडिया (X) पर लिखा कि मोदी सरकार पहले जातिगत जनगणना के खिलाफ थी, फिर देश की जनता के दबाव में आकर उसने यू-टर्न लिया, लेकिन अब सही और विश्वसनीय तरीके से गिनती न करवाकर सरकार अपनी प्रतिबद्धता से पीछे हटती दिख रही है, उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी एक सटीक, पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से जातिगत जनगणना कराने की मांग पर कायम है.

जयराम रमेश ने यह भी ध्यान दिलाया कि बिहार और तेलंगाना के जाति सर्वेक्षणों में पहले से तैयार जाति सूची का इस्तेमाल किया गया था. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी मई 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इसी तरीके को अपनाने का सुझाव दिया था. केंद्र सरकार का 2021 वाला हलफनामा इसलिए अहम है क्योंकि 2011 की जनगणना (SECC) में बिना किसी सीमा या सूची के खुले तरीके से जवाब दर्ज करने में भारी दिक्कतें आई थीं. अलग-अलग स्पेलिंग, उप-जातियां, सरनेम और स्थानीय नामों की वजह से एक ही जाति की सैकड़ों अलग-अलग एंट्रियां बन गईं, जिन्हें बाद में सही श्रेणी में छांटना बेहद मुश्किल हो गया.

मंडल सेना के अनिरुद्ध सिंह विद्रोही ने भी यही मुद्दा उठाते हुए कहा कि जनगणना 2027 में जातियों को रिकॉर्ड और कोड करने का तरीका पारदर्शी नहीं है, उन्होंने सरकार के 2021 वाले हलफनामे से "मापिला" (Mappilas) समुदाय का उदाहरण दिया.

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जनगणना 2027 में 'मापिला' समुदाय से जुड़ी समस्या

मंडल सेना के विद्रोही ने सोशल मीडिया पर बताया कि सरकार ने खुद 2011 के आंकड़ों में कमियां बताते हुए कहा था कि कैसे 'मापिला' जैसे समुदाय का नाम अलग-अलग स्पेलिंग और रूपों में दर्ज हो गया था, इससे एक ही समाज के लोगों का डेटा अलग-अलग हिस्सों में बंट गया. यही इस पूरे विवाद की मुख्य जड़ है. अगर एक ही जाति के लोग अलग-अलग स्पेलिंग, स्थानीय नाम या उप-जाति का नाम लिखवाएंगे, तो एक खुले कॉलम की वजह से हजारों कच्चे आंकड़े बन जाएंगे. जब तक बाद में उन्हें एक सही कोड से जोड़ने की मजबूत व्यवस्था न हो, तब तक इस गिनती से सही आंकड़े नहीं निकाले जा सकते.

इसीलिए विद्रोही का तर्क है कि सिर्फ जाति गिनना काफी नहीं है, उन्होंने सवाल किया, "जाति जनगणना तो हो रही है, लेकिन मुख्य सवाल यह है कि जातियों को सही-सही कैसे गिना जाएगा?

तेलंगाना और बिहार का ज़िक्र बार-बार क्यों हो रहा है?

कांग्रेस देशव्यापी जातिगत जनगणना के लिए जिस वैकल्पिक मॉडल की वकालत कर रही है, वह सिर्फ एक सैद्धांतिक विचार नहीं है, कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने लगातार बिहार और तेलंगाना के मॉडल का हवाला दिया है, जहां जाति की गिनती के लिए खुले सवालों पर निर्भर रहने के बजाय पहले से तैयार जातियों की सूची का इस्तेमाल किया गया था. कांग्रेस का मानना है कि केंद्र सरकार को तेलंगाना के सर्वेक्षण प्रारूप और प्रक्रिया से सीख लेनी चाहिए.

मंडल सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिरुद्ध सिंह विद्रोही का कहना है कि बिहार के जाति सर्वेक्षण में पूर्व-निर्धारित जाति सूची और कोड का उपयोग किया गया था.  वहीं, तेलंगाना में 2024 में मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा कराए गए सामाजिक-आर्थिक और जाति सर्वेक्षण में जाति सूचियों, कोड, वैकल्पिक नामों और डेटा सत्यापन के तरीकों का इस्तेमाल हुआ था, जिसके नतीजे फरवरी 2025 में जारी किए गए.

विद्रोही ने सवाल उठाया, "जब हमारे पास सफल उदाहरण मौजूद हैं, तो हम राष्ट्रीय स्तर पर सबसे मजबूत और वैज्ञानिक प्रणाली क्यों नहीं अपना सकते?"

ओपन-एंडेड' कॉलम पर OBC संगठनों की तीखी आपत्ति

ऑल इंडिया OBC स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AIOBCSA) ने सोशल मीडिया पर बयान जारी कर 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) में खुले जाति कॉलम से आई समस्याओं को रेखांकित किया. संगठन ने जनगणना 2027 के लिए भी इसी खुले कॉलम की व्यवस्था को बनाए रखने पर एनडीए (NDA) सरकार की आलोचना की.

एआईओबीसीएसए का आरोप है कि यूपीए सरकार के समय प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों के कुछ तत्वों ने जानबूझकर जाति कॉलम को खुला रखकर 2011 के आंकड़ों में कमियां पैदा की थीं, और अब वही तरीका अपनाकर जनगणना 2027 में भी रुकावटें डालने की कोशिश की जा रही है.

सरकार का पक्ष और कोडिंग की पारदर्शिता पर सवाल

दूसरी तरफ, सरकार का तर्क है कि जनगणना 2027 के तहत एक 'कोड डायरेक्टरी' और डेटा सत्यापन (Validation checks) की व्यवस्था रखी जाएगी. हालांकि, अनिरुद्ध सिंह विद्रोही ने सवाल खड़ा किया कि जाति की मैपिंग, कोडिंग और सत्यापन की यह प्रणाली कितनी पारदर्शी और भरोसेमंद होगी? मुख्य बहस इस बात पर टिकी है कि क्या जातियों का मानकीकरण आंकड़े जुटाते समय ही होना चाहिए या फिर बाद में मिले खुले जवाबों को कोड किया जाना चाहिए.

सटीक आंकड़ों की अहमियत और सामाजिक प्रभाव

सभी पक्षों का मानना है कि "जनगणना की प्रश्नावली का डिजाइन बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण है, क्योंकि जातिगत डेटा ही भविष्य में प्रतिनिधित्व, जनकल्याणकारी योजनाओं और आरक्षण नीति का आधार बनता है. विशेषज्ञों का कहना है कि जहां एक तरफ पारदर्शी गिनती बेहद जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ जातिगत डेटा से राजनीतिक और सामाजिक हलचल तेज होने की आशंका भी बनी रहती है.
 

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