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टाटा ने बस्तर से की अपनी वापसी, नक्सलियों ने नहीं करने दिया भूमि अधिग्रहण

टाटा ने अपने प्लांट के लिए बंडाजी , बड़ेपरौदा , बेलर , बेलियापाल , छिंदगांव , दापपाल , घुरगांव , कमली , सिरीषगुडा और टाकरागुड़ा गांव की पांच हजार पांच सौ एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर भूमि मालिकों को उसका मुआवजा भी दे दिया. 1707 आदिवासियों में से 1163 ने बैंको के जरिए मुआवजे की रकम को अपने खाते में ले लिया, लेकिन बाकी लगभग साढ़े पांच सौ आदिवासियों ने अधिग्रहण को लेकर बगावत शुरू कर दी.

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अपनी जमीन वापस मांग रहे हैं आदिवासी
अपनी जमीन वापस मांग रहे हैं आदिवासी

पश्चिम बंगाल के सिंगुर में टाटा के साथ जो हुआ उसे एक बार फिर दोहराया गया है. इस बार टाटा को छत्तीसगढ़ के बस्तर से अपनी वापसी करनी पड़ी है. बस्तर में लोहण्डीगुड़ा इलाके में टाटा ने साढ़े पांच मिलियन टन सालाना क्षमता वाले स्टील प्लांट को स्थापित करने की कवायत शुरू की. इसके लिए 200 करोड़ से ज्यादा की रकम खर्च किए. टाटा ने पांच हजार पांच सौ एकड़ की जमीन भी अधिग्रहित की. प्लांट के विस्तार के लिए और जमीन मुहैया नहीं हो पाई क्योंकि नक्सलियों ने इस प्लांट का विरोध शुरू कर दिया. यहां तक की नक्सलियों ने टाटा को आयरन ओर की खदानों में काम तक शुरू नहीं करने दिया. आखिरकार लंबे इंतजार के बाद टाटा ने छत्तीसगढ़ को विधिवत रूप से बाय-बाय कह दिया है.

बस्तर में भरपूर मात्रा में आयरन ओर की खदानें
के बस्तर से टाटा स्टील की विदाई हो गई है. सन 2005 में टाटा ने लोहंडीगुड़ा इलाके में साढ़े पांच टन सालाना क्षमता वाले स्टील प्लांट की स्थापना के लिए छत्तीसगढ़ सरकार से बाकायदा MOU किया था क्योंकि बस्तर में भरपूर मात्रा में आयरन ओर की खदानें हैं. लिहाजा राज्य सरकार ने भी फुर्ती दिखाई और टाटा को आयरन ओर की खदाने भी आवंटित कर दी. इसके साथ ही प्लांट के लिए भूमि अधिग्रहण की कवायत शुरू हो गई.

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लोहंडीगुड़ा और उसके आसपास के दस गांव की पांच हजार पांच सौ एकड़ जमीन स्टाइल प्लांट की स्थापना के लिए चिन्हित की गई. इसका बाकायदा अधिग्रहण भी हो गया. इलाके के लोगों को टाटा ने राज्य सरकार के माध्यम से मुआवजे की रकम भी बांट दी. इसके बाद टाटा के लिए मुसीबत की घड़ी उस समय आ खड़ी हुई जब जमीन अधिग्रहण और आयरन ओर की खदानों को लेकर नक्सलियों ने मोर्चा खोल दिया. इसके बाद प्लांट के विस्तार के लिए ना तो टाटा को जमीन मुहैया हो पाई और ना ही नक्सलियों ने आयरन ओर खदानों को शुरू नहीं होने दिया. नतीजतन टाटा ने इस प्लांट की स्थापना से अपने हाथ खींच लिए हैं.

टाटा ने की काफी मशक्कत
इन दस सालों में टाटा ने स्टील प्लांट की स्थापना को लेकर दो दर्जन गांव में जमकर पापड़ बेले. स्थानीय लोगों के कल्याण से लेकर उन्हें बेहतर भविष्य के बारे में जमकर पाठ पढ़ाया. इलाके के कायाकल्प से लेकर विकास का वादा भी किया, लेकिन माहौल टाटा के पक्ष में नहीं हो पाया. मुआवजा लेने के बाद ज्यादातर ग्रामीणों ने नक्सलियों के इशारे पर जमीन देने से इनकार कर दिया. नतीजतन अधिग्रहित की गई जमीन टाटा को नहीं मिल पाई. राज्य सरकार की ओर से भी अधिग्रहित जमीन से बेजा कब्जा हटाने का दावा किया गया, लेकिन टाटा को संतोषजनक सहायता नहीं मिल पाई.

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अपनी जमीन वापस मांग रहे हैं आदिवासी
टाटा ने अपने प्लांट के लिए बंडाजी , बड़ेपरौदा , बेलर , बेलियापाल , छिंदगांव , दापपाल , घुरगांव , कमली , सिरीषगुडा और टाकरागुड़ा गांव की पांच हजार पांच सौ एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर भूमि मालिकों को उसका मुआवजा भी दे दिया. 1707 आदिवासियों में से 1163 ने बैंको के जरिए मुआवजे की रकम को अपने खाते में ले लिया, लेकिन बाकी लगभग साढ़े पांच सौ आदिवासियों ने अधिग्रहण को लेकर बगावत शुरू कर दी. नक्सली भी इस अभियान में जुट गए और उन्होंने टाटा स्टील प्लांट के कर्मियों और समर्थकों को इलाके से खदेड़ना शुरू कर दिया. बंदूक की नोक पर हुई नक्सली कार्यवाही के चलते स्टील प्लांट की स्थापना का काम ठप्प पड़ गया. अब इस इलाके के लोग अपनी जमीन की वापसी की मांग कर रहे हैं. इलाके के लोगों का आरोप है कि राज्य सरकार की कमजोरी के चलते टाटा जा रही है. इसमें उनका कोई दोष नहीं है. लिहाजा उनकी जमीन वापस होनी चाहिए.

नक्सलियों के कारण हुई टाटा की विदाई
उधर जिस वक्त टाटा की विदाई हो रही थी, उस वक्त राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह रायपुर में उद्योगपतियों के साथ बैठक में मशगूल थे. उनका एजेंडा राज्य में सुरक्षित निवेश और औद्योगीकरण के लिए सरकारी प्रयास था. टाटा की विदाई को लेकर सरकार का अपना तर्क है. रमन सिंह के मुताबिक टाटा को उस इलाके में विरोध की वजह से खदानें नहीं खोल पाने के कारण जाना पड़ा, लेकिन इस इलाके में और भी कई औद्योगिक इकाइयां स्थापित हो रही हैं. टाटा के जाने के बाद नगरनार में दूसरा स्टील प्लांट आ गया है. इसमें 20 हजार करोड़ का निवेश होना है.

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लैंड बैंक में शामिल हुई अधिग्रहित जमीनें
उधर ग्रामीण अब अपनी जमीन की वापसी की मांग करने लगे हैं. तर्क दिया जा रहा है कि सिंगुर में टाटा की नैनो परियोजना के लिए वहां की तत्कालीन सरकार के भूमि अधिग्रहण को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था. इससे अधिग्रहित जमीन की वापसी भी तय हो गई, लेकिन ने टाटा के लिए अधिग्रहित जमीन को लैंड बैंक में शामिल किए जाने का फैसला किया है. इसके लिए बाकायदा कैबिनेट में प्रस्ताव भी पारित कर दिया गया है. सरकार ने यह भी ऐलान किया है कि इस जमीन को उन औद्योगिक घरानों को आवंटित किया जाएगा, जो बस्तर में निवेश करेंगे.

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