बीते कुछ सालों से वजन घटाने के लिए लोग सेमाग्लूटाइड (ओज़ेमपिक) और तिरज़ेपाटाइड जैसी दवाएं खा रहे हैं. इसका अच्छा असर भी देखने को मिल रहा है. लेकिन हर मरीज में को इनसे एक जैसा फायदा नहीं मिलता है. कुछ लोगों को बेहतरीन परिणाम मिलते हैं, जबकि कुछ में वजन कम होने की रफ्तार काफी धीमी रहती है. ऐसे में लोग सोचते हैं कि ये वजन घटाने वाली दवा उनपर खास असर क्यों नहीं कर रही है? क्या उनको दूसरे ब्रांड की दवा लेनी चाहिए थी? अभी तक इन सवालों का जवाब पता लगाने का कोई तरीका नहीं था, लेकिन अब इटली के शोधकर्ताओं की एक नई स्टडी में जवाब खोज निकाला है.
रिसर्च में वैज्ञानिकों ने दावा किया गया है कि वजन घटाने वाली दवाएं शुरू करने से पहले किया गया एक साधारण ब्लड टेस्ट यह बता सकता है कि कौन-सी दवा ज्यादा असरदार होगी. यह रिसर्च Diagnostics जर्नल में प्रकाशित हुई है.
इस रिसर्च में 90 लोगों को शामिल किया गया था. इन सभी का खाली पेट GLP-1 और GIP का टेस्ट किया गया. यह दोनों हार्मोन शरीर में भूख को कंट्रोल करते हैं. इस टेस्ट से इन लोगों में हार्मोन के लेवल का पता लगाया गया और उसकी जितनी रीडिंग आई उनको नोट करके रख लिया. इसके बाद इन 90 लोगों को दो ग्रुप में बांटा गया. एक ग्रुप को सेमाग्लूटाइड और दूसरे को तिरज़ेपाटाइड दी गई. 6 महीने तक यह दवाएं देने के बाद शोधकर्ताओं ने देखा कि किस मरीज का कौन सी दवा से कितना वजन कम हुआ है.
रिसर्च में क्या आया सामने
रिसर्च में पता चला कि जिन लोगों के शरीर में GLP-1 हार्मोन का लेवल कम था. उनके शरीर में सेमाग्लूटाइड से वजन कम करने में मदद मिली. वहीं, जिन लोगों में GIP हार्मोन का लेवल कम था, उनमें तिरज़ेपाटाइड का बेहतर असर देखा गया. वजन कम करने का असर ज्यादा दिखा. इस रिसर्च से यह साफ हुआ कि वेट लॉस करने वाली इन दवाओं को शुरू करने से पहले अगर इन दोनों हार्मोन के लेवल का पता चल जाए तो यह आसानी से पता लगाया जा सकता है कि किस व्यक्ति पर वजन कम करने के लिए कौन सी दवा ज्यादा असर करेगी.
क्यों है यह रिसर्च अहम
रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि वजन घटाने वाली आधुनिक दवाएं काफी महंगी होती हैं और इनके कुछ साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं. अगर मरीज को शुरुआत में ही सही दवा मिल जाए, तो समय और पैसे दोनों की बचत हो सकती है. ऐसे में यह रिसर्च दवा के असर के बारे में उम्मीद की किरण जगाती है.
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क्या सभी लोग ये टेस्ट करा सकते है?
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह स्टडी केवल 90 मरीजों पर की गई है. इस रिसर्च को अभी बड़े पैमाने पर करने की जरूरत है. अगर तब भी इसमें यही परिणाम मिलते हैं तो उसको सामान्य इलाज का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता. वैज्ञानिकों का कहना है कि किसी भी वेट लॉस दवा का इस्तेमाल केवल डॉक्टर की सलाह पर ही करना चाहिए.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
दिल्ली सरकार के राजीव गांधी अस्पताल में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ अजीत कुमार बताते हैं कि यह रिसर्च अगले बड़े लेवल पर होती है तो आने वाले समय में व्यक्ति के GLP-1 और GIP टेस्ट से पता चल जाएगा कि कौन सी दवा असर करेगी. हालांकि ये टेस्ट हर जगह उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन अगर आने वाले समय में रिसर्च का दायरा बढ़ा और टेस्ट हर जगह हुए तो मरीजों को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है.