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महिलाएं अब क्यों कराना चाहती हैं सिजेरियन डिलीवरी, कब नहीं है इसकी जरूरत? डॉक्टरों ने बताया 

भारत में सिजेरियन डिलीवरी की संख्या 2016 से 2021 के बीच 17.2% से बढ़कर 21.5% हो गई है. डॉक्टरों का कहना है कि डिलीवरी का तरीका केवल सुविधा के आधार पर नहीं, बल्कि मेडिकल जरूरत के अनुसार तय होना चाहिए. लेकिन कई महिलाएं अब खुद ही सर्जरी कराना चाहती हैं.

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प्रेग्नेंट महिला
प्रेग्नेंट महिला

भारत में बच्चों की डिलीवरी का तरीका तेजी से बदल रहा है. NFHS 2023-2024 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में अब लगभग 27 प्रतिशत बच्चों का जन्म सिजेरियन यानी ऑपरेशन से होता है, जबकि 2015-2016 में ये 17.2 % था. प्राइवेट और सरकारी अस्पतालों के बीच यह अंतर और भी अधिक है. प्राइवेट अस्पतालों में आधे से ज्यादा बच्चों का जन्म सिजेरियन से ही होता है, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह करीब 17 % है. 

यह आंकड़े बताते हैं कि भारत में सी- सेक्शन डिलीवरी कितना अधिक होने लगी हैं. एक्सपर्ट्स का कहना है कि कुछ मामलों में ऐसे हालात बन जाते हैं जब बच्चे के जन्म के लिए ऑपरेशन करना जरूरी हो जाता है, वहीं, अब कुछ महिलाएं खुद से ही सी सेक्शन कराना चाहती हैं. 

डॉक्टर बताते हैं कि कई मेडिकल कंडीशन ऐसी होती है जिसमें सिजेरियन डिलीवरी मां और बच्चे दोनों की जान बचाने के लिए जरूरी होती है. प्रेग्नेंसी में मां की उम्र, पिछली डिलीवरी की हिस्ट्री, कोई गंभीर बीमारी, बच्चे में ऑक्सीजन की कमी, एम्नियोटिक फ्लूइड का कम होना ये सब ऐसे कारण हैं जिनमें डॉक्टर को सी- सेक्शन करना पड़ता है.पिछले कुछ सालों में खराब खानपान और बिगड़े हुए लाइफस्टाइल की वजह से महिलाओं को थायरॉइड, पीसीओडी और मोटापा जैसी बीमारियां भी हो रही हैं. इन बीमारियों वाली महिलाओं में भी ऑपरेशन की जरूरत पड़ सकती है, हालांकि अब कुछ महिलाएं खुद ही डॉक्टरों को सी- सेक्शन करने को कहती हैं.

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महिलाएं खुद से ही सी -सेक्शन कराना चाहती हैं? 

मेट्रो ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स में प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग में सीनियर कंसल्टेंट डॉ. (प्रो.) अंजू सूर्यपानी बताती हैं कि अब कई महिलाएं डिलीवरी की तारीख अपनी सुविधा के हिसाब से चुनने लगी हैं. महिलाएं अब लेबर पेन में नहीं रहना चाहती हैं. उनका मानना है कि सी सेक्शन उनके और बच्चे दोनों के लिए ठीक है. लेकिन  मेडिकल जरूरत के इसे चुनना हमेशा बेहतर नहीं माना जाता है.

ऐसा इसलिए क्योंकि नॉर्मल डिलिवरी की तुलना में सिजेरियन एक बड़ी सर्जरी है, जिसमें इंफेक्शन, ज्यादा ब्लड लॉस, एनेस्थीसिया से जुड़ी दिक्कत और रिकवरी में ज्यादा समय लगने का खतरा रहता है, कुछ मामलों में अगले प्रेग्नेंसी में प्लेसेंटा से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ जाती हैं. जन्म महिला दूसरा बच्चा प्लान करती हैं तो उसमें भी सी सेक्शन की जरूरत का रिस्क रहता है. 

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तो नॉर्मल या सिजेरियन क्या है बेहतर?

नॉर्मल डिलीवरी में अस्पताल में कम दिन रहना पड़ता है. जन्म के समय नॉर्मल प्रक्रिया से गुजरने पर बच्चे का इम्यून सिस्टम मजबूत रहता है, लेकिन ये तभी ठीक है जब मां और बच्चा दोनों पूरी तरह स्वस्थ हों और प्रेग्नेंसी से जुड़ी कोई बड़ी समस्या न हो. अगर बच्चे की बच्चे की पोजीशन उल्टीया आड़ी हो, प्लेसेंटा नीचे की तरफ हो, हाई बीपी और डायबिटीज जैसी कंडीशन हो तो सी- सेक्शन ज्यादा बेहतर है. 
डॉ. अंजू कहती हैं कि डिलीवरी का तरीका केवल दर्द या अपनी  सुविधा के आधार पर तय नहीं होना चाहिए. बल्कि समय की जरूरत क्या है उस आधार पर होना होना बेहतर है. 
 

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