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थलपति से जन नेता तक... पिता ने ऐसे तैयार किया विजय की जीत का ब्लूप्रिंट!

थलपति विजय की राजनीतिक सफलता के पीछे सिर्फ उनका स्टारडम ही नहीं, उनके पिता एस ए चंद्रशेखर की शानदार प्लानिंग भी है. बेटे के लिए फिल्में बनाने से लेकर, उसका फैन क्लब शुरू करने तक चंद्रशेखर ने सालों पहले जो प्लान बनाया, उसका नतीजा तमिलनाडु चुनाव में विजय की दमदार जीत है.

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पिता ने कैसे लिखा विजय की चुनावी जीत का स्क्रीनप्ले! (Photo: ITGD)
पिता ने कैसे लिखा विजय की चुनावी जीत का स्क्रीनप्ले! (Photo: ITGD)

तमिलनाडु चुनाव के नतीजों में विजय का प्रदर्शन इस समय देश की सबसे बड़ी खबर है. राजनीति के खेल में अंडररेटेड माने जा रहे विजय, अब तमिलनाडु की सियासत पर राज करने के लिए तैयार हैं. फैन्स के फेवरेट थलपति से, राजनीति का जन नेता बनने तक विजय की कहानी को लोग सरप्राइज और शॉक के साथ देख रहे हैं. मगर इस शानदार कहानी की स्क्रिप्ट जिस फिल्म डायरेक्टर ने लिखी थी, वो रुझानों में ही विजय की पार्टी को दमदार तरीके से लीड करते देखकर मंदिर जा पहुंचा.

ये हैं विजय के पिता, तमिल इंडस्ट्री के नामी डायरेक्टर और प्रोड्यूसर— एस ए चंद्रशेखर. विजय आज जो सपना जीने जा रहे हैं, फिल्मों से लेकर पॉलिटिक्स तक उसका ब्लू प्रिंट उनके पिता ने सालोंसाल की कड़ी मेहनत से तैयार किया है. उनकी इस मेहनत में विजय को राजनीति के लिए राजी करना भी शामिल है.

विजय ने पिता की फिल्म से किया था डेब्यू
70 से ज्यादा फिल्में डायरेक्ट कर चुके फिल्ममेकर चंद्रशेखर ने 10 साल की उम्र में ही फिल्म वेट्री (1984) से अपने बेटे विजय को स्क्रीन पर डेब्यू करवा दिया था. करीब आधा दर्जन फिल्मों में विजय ने बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम किया. चंद्रशेखर ने जिन फिल्मों में अपने बेटे को लिया उनके हीरो रजनीकांत और विजयकांत जैसे टॉप तमिल सुपरस्टार थे.

चंद्रशेखर की इन फिल्मों ने शुरुआत में ही फैन्स को विजय का चेहरा याद करवा दिया. फिर अपनी ही फिल्म नालैय्या थीरपु (Naalaiya Theerpu) से 1992 में बतौर हीरो लॉन्च किया, जब विजय की उम्र 18 साल थी. लेकिन विजय का डेब्यू फ्लॉप साबित हुआ. उनके लुक्स और परफॉरमेंस की बहुत आलोचना हुई. मगर चंद्रशेखर अभी हार मानने वाले नहीं थे. उन्होंने विजय को लेकर फिर फिल्म बनाई सेंथूरापंडी (Senthoorapandi) और इस बार अपने साथ काफी काम करने वाले सुपरस्टार विजयकांत को विजय के बड़े भाई का रोल दिया. पब्लिक विजयकांत को देखने आती थी और उनके छोटे भाई बने विजय से इंप्रेस होकर जाती थी. 

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ये फिल्म विजय की पहली हिट बनी और उनका करियर फर्राटे भरने लगा. करियर के पहले दो सालों में विजय ने जो आधा दर्जन फिल्में कीं, उनमें से आधी के डायरेक्टर उनके पिता चंद्रशेखर थे. इनमें से कुछ फिल्में सौ-सौ दिनों तक चलने वाली बड़ी हिट साबित हुईं. पिता-पुत्र की इस जोड़ी ने कुल 15 फिल्में साथ में की हैं, जिनमें से ज्यादातर विजय के लिए बॉक्स ऑफिस पर बड़ी कामयाबी लेकर आईं. मगर चंद्रशेखर ने सिर्फ विजय को अपनी फिल्मों में हीरो नहीं बना रहे थे, उन्हें फिल्में चुनने और करियर की दिशा तय करने में भी हेल्प कर रहे थे. और फिल्मों से आगे बढ़कर उनका फैनडम भी डायरेक्ट करने लगे.

फैन क्लब और स्टार-टाइटल
एक्टर्स का सुपरस्टारडम अपने आप में एक कल्ट की तरह होता है और इस कल्ट को दो चीजों की सख्त जरूरत होती है— कल्ट के अनुयायी यानी फैन क्लब, और अपने हीरो का एक अनोखा स्टार टाइटल. चंद्रशेखर ने अपने बेटे को सिर्फ हिट फिल्में ही नहीं दीं, उनका पहला ऑफिशियल फैन क्लब भी दिया.

1993 में चंद्रशेखर ने विजय रसिगर मंद्रम यानी विजय फैन क्लब की शुरुआत की. फैन क्लब के साथ आया विजय का स्टार-टाइटल. तमिल सिनेमा फैन्स के लिए रजनीकांत 'थलाइवा' यानी लीडर थे. कमल हासन थे 'उलगानायगन' यानी यूनिवर्सल हीरो. ऐसे ही चंद्रशेखर ने अपनी फिल्म रसिगन में विजय को इलयाथलपति टाइटल के साथ इंट्रोड्यूस किया. इस टाइटल का मतलब था- यंग लीडर.

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विजय का फैन क्लब तभी से समाज सेवा के कामों में लग गया. इस समाज सेवा से जिसको फायदा होता, वो भी विजय की जय-जय करने लगता और फैन क्लब के साथ हो लेता. यानी विजय खुद बड़े पर्दे पर चमक रहे थे, लेकिन उनके पिता का शुरू किया हुआ उनका फैन क्लब, उनके नाम को जनता के बीच चमका रहा था.

जब पिता की महत्वाकांक्षा बनी विजय के लिए समस्या
चंद्रशेखर कई बार सार्वजनिक बयानों में बोल चुके हैं कि वो विजय से अपने स्टारडम को पॉलिटिकल पावर में बदलने की उम्मीद रखते हैं. शायद इसी इरादे के साथ उन्होंने अपनी फिल्म थलाइवा (2013) में विजय को ऐसे हीरो के रोल में पेश किया, जो पॉलिटिकल सिस्टम से कड़े सवाल पूछ रहा था. कहानी में विजय का हीरो, भ्रष्ट राजनीति पर वार कर रहा था और एक स्टेज पर तो उसने मुख्यमंत्री की हत्या भी कर दी. इस फिल्म के टाइटल थलाइवा का मतलब होता है 'लीडर'. चंद्रशेखर ने फिल्म की टैगलाइन दी थी— टाइम टू लीड.

विजय खुद भी इससे पहले राजनीतिक झुकाव दिखा चुके थे और उन्होंने तमिलनाडु में अपने 85 हजार फैन क्लब्स को एक बड़े संगठन ऑल इंडिया थलपति विजय मक्कल इयक्कम (AITVMI) में बदल दिया था. लोगों में ये संगठन विजय मक्कल इयक्कम के नाम से पॉपुलर है. 2011 में इस संगठन ने AIADMK की नेता जे जयललिता का सपोर्ट किया था, जिन्हें चुनाव में तगड़ी जीत मिली. VMI के लोगों ने ही नहीं, न्यूट्रल लोगों ने भी इसे राजनीतिक आजमाइश में विजय की मजबूत परफॉरमेंस की तरह देखा था.

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इसलिए कहा जाता है कि थलाइवा और इसकी टैगलाइन की वजह से जयललिता को ये फिल्म खटक गई. 9 अगस्त 2013 को थलाइवा रिलीज होनी थी, लेकिन जयललिता की तमिलनाडु सरकार ने विजय की फिल्म को रिलीज की इजाजत नहीं दी. वजह बताई गई कि इससे सार्वजनिक शांति और सुरक्षा व्यवस्था गड़बड़ हो सकती है. विजय की फिल्म तयशुदा तारीख पर पूरे देश में रिलीज हुई, लेकिन तमिलनाडु में नहीं.

विजय को जयललिता से मुलाकात करनी पड़ी, तब जाकर 20 अगस्त को, बिना टैगलाइन के थलाइवा तमिलनाडु में रिलीज हुई. इस घटना के बाद विजय ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को कुछ सालों के लिए किनारे रख दिया और VMI सोशल सर्विस में ही लगी रही.

जब पॉलिटिक्स को लेकर आमने-सामने आ गए बाप-बेटे
आज मुड़कर देखा जाए तो लगता है कि चंद्रशेखर अपने बेटे के पॉलिटिकल डेब्यू के लिए ज्यादा उत्सुक थे. जबकि विजय को थोड़ा समय और चाहिए था. 2016 में जयललिता के निधन के बाद तमिल सिनेमा के कई एक्टर पॉलिटिक्स में ज्यादा एक्टिव नजर आने लगे.

कमल हासन और रजनीकांत जैसे तमिल सुपरस्टार्स की पॉलिटिक्स में एंट्री की चर्चा को भी तभी से दोबारा जोर मिला. लेकिन विजय का फोकस अपने फिल्म करियर तक ही रहा. हालांकि, इस बीच पिता के दिए टाइटल 'इलयाथलपति' को बदलकर ही विजय को अब फैन्स ने 'थलपति' का नया टाइटल दे दिया था. जिसे डायरेक्टर एटली ने अपनी फिल्म मर्सल (2017) से ऑफिशियली विजय के नाम के साथ जोड़ दिया.

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इस बीच 2020 में अचानक खबर आई कि चंद्रशेखर ने विजय के फैन क्लब AITVMI उर्फ VMI को बतौर पॉलिटिकल पार्टी रजिस्टर करने के लिए चुनाव आयोग को एप्लीकेशन दी है. इस खबर के पीछे-पीछे विजय का अपने फैन्स के नाम संदेश आया कि उनके नाम से शुरू हो रही किसी पार्टी का हिस्सा न बनें. ये एक दुर्लभ मौका था जब विजय और उनके पिता आमने-सामने नजर आए. हालांकि, चंद्रशेखर ने बाद में यही कहा कि वो अपने बेटे का ही भला सोच रहे थे.

पुथिया थलाइमुराई चैनल को दिए एक इंटरव्यू में चंद्रशेखर ने बताया उन्होंने 1993 में अपने बेटे के लिए ये फैन क्लब शुरू किया था जो वक्त के साथ बदलता चला गया. इसे पॉलिटिकल पार्टी के रूप में रजिस्टर करवाकर वो उन युवाओं को पहचान दिलाना चाहते थे जो विजय के नाम से सोशल वर्क करते आ रहे हैं.

उन्होंने बताया, 'मैंने ये (फैन क्लब) उनसे पूछकर नहीं शुरू किया था. मैं चाहता था कि मेरा बेटा शिखर पर पहुंचे. मैं चाहता था कि मेरा बेटा ग्रेट एक्टर बने और ये मैंने अपनी इच्छा से किया. कुछ समय बाद ये एक वेलफेयर संस्था बन गई. फिर मैंने इसे लोगों के लिए एक संगठन का रूप दिया. इतने सालों तक मैं ही इसका फाउंडर था. मैंने न इसे शुरू करने के लिए विजय से पूछा था, और न इसे वक्त के साथ बदलते रहने के लिए. मैं ये सब उनकी ही भलाई के लिए कर रहा था.'

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इस मामले में शायद विजय अपने पिता से नाराज थे. लेकिन बाद में शायद उन्हें भी समझ आया कि तमिलनाडु की राजनीति एक नया चेहरा तलाश कर रही है और यही उनके मैदान में उतरने का सही समय है. 2024 में उन्होंने अपने पिता के ही शुरू किए फैन क्लब को अपनी पार्टी TVK (तमिलगा वेट्री कड़गम) में बदला और इसी के दम पर चुनाव लड़कर आज तमिलनाडु के मुख्यमंत्री की कुर्सी की तरफ देख रहे हैं.

तमिलनाडु में वोटों की गिनती शुरू होते ही बेटे की जीत के लिए प्रार्थना करने चंद्रशेखर तिरुतानि मुरूगन मंदिर पहुंचे नजर आए. क्योंकि तमिलनाडु में TVK की शानदार जीत सिर्फ विजय ही नहीं, उन चंद्रशेखर का भी सपना थी जिन्होंने अपने बेटे को हीरो बनाकर जनता के सामने बड़े पर्दे पर पेश किया था.

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