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'दाढ़ी देखी और थमा दिया आतंकी का रोल...', 9/11 के बाद मुस्लिम एक्टर्स ने क्या झेला?

9/11 से पहले भी हॉलीवुड में अरब और मुस्लिम किरदारों को लेकर स्टीरियोटाइप मौजूद था. लेकिन हमले के बाद आतंकवाद अमेरिकी समाज के सबसे बड़े डर में बदल गया और पर्दे पर भी उसका एक चेहरा तैयार हो गया. उस चेहरे की दाढ़ी थी, अरबी लहजा था, कभी सिर पर टोपी या पगड़ी थी और अक्सर हाथ में बंदूक.

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9/11 अटैक के बाद मुस्लिम एक्टर्स की आपबीती. (Photo ITG)
9/11 अटैक के बाद मुस्लिम एक्टर्स की आपबीती. (Photo ITG)

11 सितंबर 2001 की सुबह अमेरिका में जो हुआ, उसने सिर्फ हजारों जिंदगियां नहीं छीनीं, बल्कि आने वाले कई वर्षों के लिए हॉलीवुड के किरदारों की कहानियां और किरदारों की दुनिया भी बदल दी. न्यूयॉर्क के आसमान में खड़े ट्विन टावर्स पहले फिल्मों, टीवी शो और विज्ञापनों में शहर की पहचान के तौर पर इस्तेमाल होते थे. लेकिन इस हमले के बाद वही इमारतें स्क्रीन पर एक ऐसे हादसे के जख्म में तब्दील हो गई, जिसे देखकर लोगों का दर्द रह-रहकर ताजा होता रहा. इस हादसे ने हॉलीवुड को हमेशा के लिए बदल दिया. लेकिन इसकी सबसे ज्यादा कीमत चुकाई मुस्लिम कलाकारों ने. 

9/11 से पहले भी हॉलीवुड में अरब और मुस्लिम किरदारों को लेकर स्टीरियोटाइप मौजूद था. लेकिन हमले के बाद आतंकवाद अमेरिकी समाज के सबसे बड़े डर में बदल गया और पर्दे पर भी उसका एक चेहरा तैयार हो गया. उस चेहरे की दाढ़ी थी, अरबी लहजा था, कभी सिर पर टोपी या पगड़ी थी और अक्सर हाथ में बंदूक. नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम और अरब मूल के कलाकारों के लिए कास्टिंग की दुनिया सिमटने लगी. उन्हें एक्टर के तौर पर नहीं, एक खास तरह के लुक के तौर पर देखा जाने लगा. 9/11 के बाद अरब किरदारों की संख्या बढ़ी, लेकिन इससे अरब-अमेरिकी कलाकारों को जरूरी नहीं कि बेहतर अवसर मिले. कई बार उन्हें उन्हीं स्टीरियोटाइप भूमिकाओं में सीमित कर दिया गया. 

2001 हमले के समय एक्टर अली मोमेन की उम्र 20 साल थी. वह बताते हैं कि 9/11 अटैक के बाद उनके पास उनकी एजेंट का फोन आया और उन्होंने बताया कि मेरे पास तुम्हारे लिए एक बेहतरीन रोल है. मैंने उत्सुकता से पूछा कि क्या? तो उसने कहा, सुसाइड बॉम्बर 3. मैं यह सुनकर एकदम से ठहर गया. उस समय मैं जवान था. कॉलेज कंपलीट ही किया था और इस इंडस्ट्री में करियर बनाना था तो मैंने इस रोल के लिए हामी भर दी. फिल्म का नाम था- ट्रेटर और मैं था, सुसाइड बॉम्बर 3. मैं आज तक इसे भूल नहीं पाया हूं. 

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मेसा होरी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. वह कहती हैं कि मैं हमेशा से एक्टर बनना चाहती थी. मैंने पहली बेटी को जन्म देने के बाद हॉलीवुड में डेब्यू किया. 9/11 हमले से पहले मैं ज्यादातर ऐसी भूमिकाएं करती थी, जिसमें मैं या तो किसी बच्चे की मां हूं या कोई हताश महिला. लेकिन इस घटना के बाद मुझे रिफ्यूजी महिला के किरदार ज्यादा मिलने लगे. मैंने अपने निजी जीवन में कभी हिजाब नहीं पहना लेकिन मुझे हिजाब पहनने के रोल मिलने लगे.

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फिल्म सेट पर मेसा होरी.

अली मोमेन एक वाकया याद करते हुए कहते हैं कि एक फिल्म के ऑडिशन के दौरान मुझे अरबी बोलने को कहा गया क्योंकि फिल्म में उन्हें अरबी बोलने वाले कलाकार चाहिए थे. मैं ईरान से हूं, हम फारसी बोलते हैं. जब मैं ऑडिशन देने गया तो कास्टिंग डायरेक्टर ने मुझसे कहा कि आपको ये लाइनें अरबी में बोलनी हैं. मैंने कहा कि मैं अरबी नहीं जानता. तो उन्होंने कहा कि फिर आप कौन सी भाषा बोलते हैं. मैंने कहा, मैं ईरानी हूं और हम फारसी बोलते हैं तो उन्होंने कहा कि हां तो फारसी बोलो, फारसी और अरबी एक ही तो हैं. मैं बड़ी शालीनता से उनसे कहा कि नहीं, दोनों एक नहीं हैं. 

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एक्टर माज जॉब्रानी (Maz Jobrani) का अनुभव इस बदलाव को समझने के लिए बेहद अहम है. उनके दिमाग में हॉलीवुड की जो तस्वीर थी, उसमें वह एक अभिनेता थे जो किसी भी तरह का किरदार निभा सकते थे. बचपन और स्कूल के दिनों में उन्होंने अलग-अलग तरह के किरदार किए थे लेकिन हॉलीवुड पहुंचने के बाद उन्हें जल्दी ही समझ आ गया कि यहां उनके लिए कहानी कुछ और है.
 
वह बताते हैं कि जैसे ही लोगों को पता चलता था कि वह वेस्ट एशिया से हैं, उनसे ऐसे संवाद बोलने को कहा जाता था जिनमें वह अल्लाह के नाम पर किसी को मारने की बात करते थे. उन्होंने सवाल किया कि क्या वह डॉक्टर का किरदार नहीं कर सकते? जवाब मिला, कर सकते हो लेकिन फिर डॉक्टर बनकर अस्पताल को ही हाईजैक कर लेना.

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माज जॉब्रानी

यही वह क्षण था जब जॉब्रानी को समझ आया कि समस्या उनकी एक्टिंग में नहीं, बल्कि उस इमेज में है जो कास्टिंग की दुनिया ने उनके लिए बना दी थी. बाद में उन्होंने ऐसे आतंकवादी वाले किरदारों को स्वीकार करना बंद कर दिया लेकिन ऐसा करना भी आसान नहीं था, क्योंकि जिस काम के लिए अभिनेता इंडस्ट्री में आते हैं, वही काम अगर उनकी पहचान की वजह से उनसे छीन लिया जाए तो विकल्प क्या बचता है? जॉब्रानी ने बाद में कॉमेडी को अपना बड़ा माध्यम बनाया और इस अनुभव को अपने काम में भी इस्तेमाल किया.

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उनके कई साथी इससे भी ज्यादा मुश्किल स्थिति में थे. अभिनेता सैयद बदरेया (Sayed Badreya) ने 2007 के एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके करियर में लंबे समय तक हॉलीवुड ने उन्हें लगभग एक ही तरह की भूमिका दी, एक आतंकी की. उन्होंने कहा कि करीब दस साल तक उनके पास एक ही तरह की लाइन होती थी, जिसमें उनका किरदार अल्लाह का नाम लेकर लोगों को मारने की धमकी देता था.

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सैयद बदरेया

बदरेया के किरदारों की एक और विडंबना थी. उन्हें पर्दे पर मरने के लिए भी खूब बुलाया जाता था. आयरमैन में उनका किरदार मरता है. एग्जिक्यूटिव डिसीजन में वह मारे जाते हैं. थ्री किंग्स में जॉर्ज क्लूनी का किरदार उन्हें मारता है और ट्रू लाइज में अर्नोल्ड श्वार्जनेगर का किरदार उन्हें उड़ा देता है. वह बताते हैं कि दाढ़ी देखकर आतंकी के रोल मिलना बिल्कुल आम बात है. यह उस कास्टिंग पैटर्न की तस्वीर थी जिसमें वेस्ट एशिया का कोई मुस्लिम चेहरा अक्सर कहानी में आते ही खलनायक बन जाता था और फिर उसका अंत गोली, बम या विस्फोट से होता था.

इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात यह थी कि कई कलाकारों को सिर्फ इसलिए संदिग्ध समझा जाता था क्योंकि वे मुस्लिम या वेस्ट एशियन दिखते थे. एक्टर वलीद ज़ुऐटर (Waleed Zuaiter) ने बताया कि 9/11 के बाद उन्हें भी एक स्लीपर-सेल वाले किरदार में कास्ट किया गया था. कहानी में पुलिस उसके घर पहुंचती है, वह बॉक्स कटर उठाता है और फिर पुलिस उसे गोली मार देती है यानी किरदार की पहचान, उसका डर और उसका अपराध सब कुछ पहले से तय था. एक्टर को उस स्टीरियोटाइप के भीतर सिर्फ अभिनय करना था.

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यहां एक बड़ा सवाल पैदा होता है. क्या ये सिर्फ काल्पनिक किरदार थे या इनके असर ने वास्तविक जिंदगी को भी प्रभावित किया? कई कलाकारों के अनुभव बताते हैं कि पर्दे और समाज के बीच की यह दीवार उतनी मजबूत नहीं थी जितनी हम मानना चाहते हैं. सैयद बदरेया ने बताया कि उनके लगातार आतंकवादी किरदार निभाने का असर उनकी बेटी तक पहुंचा. स्कूल में जब टीचर ने बच्चों से पूछा कि उनके पिता क्या करते हैं, तो दूसरे बच्चों ने डॉक्टर, इंजीनियर जैसे जवाब दिए. उनकी बेटी ने कहा कि उसके पिता हवाई जहाज हाईजैक करते हैं क्योंकि उसने अपने पिता को फिल्मों में बार-बार बंदूक और हाईजैकिंग वाले किरदारों में देखा था.

एक स्टडी बताती है कि 2017 से 2019 के बीच बनी 100 में से 1.1 फीसदी फिल्मों में ही किसी मुस्लिम किरदारों को ऐसे रोल दिए गए, जिनमें उनके डायलॉग थे. इसी स्टडी में ये भी बताया गया कि इन फिल्मों में 39 फीसदी मुस्लिम किरदारों को हिंसक दिखाया गया. 

ये किस्से किसी कुछ मुट्ठीभर कलाकारों के नहीं हैं. मुस्लिम एक्टर्स की एक लंबी फेहरिस्त हैं, जिन्होंने अक्सर इस पर खुलकर बात की कि किस तरह 9/11 अटैक के बाद उन्हें स्टीरियोटाइप किया जाने लगा और एक खास धर्म के लोगों को ही पर्दे पर आतंकी या हिंसक दिखाने का सिलसिला बढ़ा. 

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