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कौन थीं सुब्बुलक्ष्मी...जिनसे नेहरू ने कहा था- आपके सामने मैं मामूली PM, फैन थे गांधी! अब रश्मिका निभाएंगी किरदार

एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की आवाज के महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू भी फैन थे. जानिए नेहरू ने उनकी तारीफ में क्या कहा था और गांधी उनसे कौन सा भजन सुनते थे.

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इस गायिका के फैन थे नेहरू-गांधी (Photo: ITGD)
इस गायिका के फैन थे नेहरू-गांधी (Photo: ITGD)

लेजेंड्री गायिका एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी की जिंदगी अब बड़े पर्दे पर दिखाई जाएगी. उनकी 110वीं जयंती के मौके पर 16 सितंबर 2026 को चेन्नई के द म्यूजिक एकेडमी में बायोपिक का आधिकारिक लॉन्च किया गया. फिल्म में रश्मिका मंदाना एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी का किरदार निभाती नजर आएंगी.

भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी का नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है. उनकी आवाज में ऐसा जादू था कि आम श्रोता से लेकर देश के बड़े नेता तक उनके मुरीद थे. महात्मा गांधी और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी उनकी गायिकी के प्रशंसकों में शामिल थे. यही वजह है कि उनकी जिंदगी पर बनने वाली फिल्म को लेकर अभी से काफी उत्सुकता है.

फिल्म का निर्देशन गौतम तिन्ननुरी कर रहे हैं, जिन्होंने ‘जर्सी’ और ‘किंगडम’ जैसी फिल्में बनाई हैं. रश्मिका से पहले इस किरदार के लिए साई पल्लवी का नाम भी सामने आया था. यह पहली बार होगा जब रश्मिका किसी ऐसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शख्सियत का किरदार निभाएंगी, जिनकी पहचान मुख्य रूप से कर्नाटक संगीत से जुड़ी रही है.

मिट्टी का घर बना रही थीं, तभी सीधे मंच पर पहुंच गईं

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एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी का असली नाम कुंजम्मा था. उनका जन्म 16 सितंबर 1916 को मदुरै, तमिलनाडु में हुआ था. उनकी मां शानमुकावादिर अम्माल वीणा बजाती थीं, जबकि पिता सुब्रमण्यम अय्यर गायक थे. संगीत उनके घर के माहौल का हिस्सा था. बताया जाता है कि महज 10 साल की उम्र में सुब्बुलक्ष्मी ने अपनी पहली रिकॉर्डिंग की थी. बचपन में वह अपनी मां की स्टेज परफॉर्मेंस के दौरान उनके साथ भजन गाया करती थीं.

एक दिलचस्प किस्सा उनकी शुरुआती जिंदगी से जुड़ा है. एक बार वह घर के बाहर बैठकर मिट्टी का घर बना रही थीं. तभी किसी ने उन्हें उठाकर मां के पास मंच पर पहुंचा दिया. मां करीब 50-100 लोगों के सामने कार्यक्रम कर रही थीं और चाहती थीं कि बेटी भी कुछ गाने सुनाए. सुब्बुलक्ष्मी ने मिट्टी से सने हाथ साफ किए और गाना शुरू कर दिया. इसके बाद तालियों की गड़गड़ाहट ने उनका स्वागत किया.

1929 में महज 13 साल की उम्र में उन्होंने मद्रास म्यूजिक एकेडमी के मंच पर परफॉर्म किया.

एक परफॉर्मेंस ने बदल दी जिंदगी

1936 में उनकी एक परफॉर्मेंस के बाद पत्रकार टी. सदाशिवम ने तमिल वीकली मैगजीन ‘आनंदा विकातम’ में उनके बारे में फ्रंट पेज पर लिखा. इसके बाद उनके कॉन्सर्ट में भीड़ बढ़ने लगी. काम के सिलसिले में हुई मुलाकात के बाद सदाशिवम और सुब्बुलक्ष्मी एक-दूसरे के करीब आए और परिवार की इच्छा के खिलाफ शादी कर ली.

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सदाशिवम समझते थे कि सुब्बुलक्ष्मी की आवाज सिर्फ कॉन्सर्ट तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. उनकी कोशिश से सुब्बुलक्ष्मी को 1938 की फिल्म ‘सेवासदन’ में लीड रोल मिला. फिल्म सफल रही और वह दक्षिण भारत में बड़ा नाम बन गईं.

इसके बाद सुब्बुलक्ष्मी ने 1945 में ‘मीरा’ में मीराबाई का किरदार निभाया. फिल्म में उनके करीब 20 गाने थे. फिल्म की सफलता के बाद 1947 में इसका हिंदी वर्जन ‘मीराबाई’ नाम से रिलीज हुआ और सुब्बुलक्ष्मी की पहचान देशभर में बन गई.

नेहरू ने कहा था- ‘आपके सामने मैं मामूली प्रधानमंत्री हूं’

सुब्बुलक्ष्मी की आवाज का जादू देश के राजनीतिक गलियारों तक पहुंच चुका था. 1953 में दिल्ली में हुए एक कर्नाटक संगीत समारोह में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के सामने परफॉर्म किया था. ‘द प्रिंट’ के हवाले से सामने आए किस्से के मुताबिक, कार्यक्रम के बाद नेहरू ने उनकी तारीफ करते हुए कहा था कि उनकी आवाज दिलों के तार छूने की ताकत रखती है और उनके सामने वह खुद को एक मामूली प्रधानमंत्री मानते हैं.

महात्मा गांधी भी उनकी आवाज के फैंस थे. गांधी जी उनसे खास तौर पर ‘रघुपति राघव राजा राम’ सुनने की फरमाइश करते थे. 2 अक्टूबर 1947 को गांधी जी ने सुब्बुलक्ष्मी के लिए एक कार्यक्रम भी आयोजित करवाया था, जिसमें वह उनकी आवाज में ‘हरि तुम हरो’ सुनना चाहते थे.

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सुब्बुलक्ष्मी कार्यक्रम में नहीं पहुंच सकीं, लेकिन उन्होंने आधी रात तक मेहनत करके भजन रिकॉर्ड किया और अगले दिन सुबह की फ्लाइट से रिकॉर्डिंग गांधी जी तक पहुंचाई.

एमएस सुब्बुलक्ष्मी की फाइल फोटो

गांधी की हत्या के बाद महीनों नहीं गाया ‘हरि तुम हरो’

30 जनवरी 1948 को गांधी जी की हत्या की खबर सुनकर सुब्बुलक्ष्मी को गहरा सदमा लगा. बताया जाता है कि इसके बाद उन्होंने कई महीनों तक ‘हरि तुम हरो’ नहीं गाया.

सुब्बुलक्ष्मी कांजीवरम साड़ियों की शौकीन थीं. एक बुनकर मुथु चेट्टियार ने उनके लिए मिडिल सी ब्लू रंग की साड़ी डिजाइन की थी. उन्हें यह रंग इतना पसंद आया कि वह अक्सर इसी रंग की साड़ी पहनकर मंच पर नजर आती थीं. बाद में यही रंग उनके नाम से ‘MS Blue’ के तौर पर पहचाना जाने लगा.

भारत रत्न से लेकर UN तक पहुंची आवाज

सुब्बुलक्ष्मी को पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, रेमन मैग्सेसे पुरस्कार और पद्म विभूषण जैसे सम्मान मिले. 1998 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया. वह यह सम्मान पाने वाली पहली संगीतकार थीं. 1966 में उन्होंने न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए परफॉर्म किया. इसके बाद लंदन, कनाडा और दूसरे देशों में भी उनकी प्रस्तुतियां हुईं.

1997 में पति कल्कि सदाशिवम के निधन के बाद उन्होंने गायिकी से दूरी बना ली. 11 दिसंबर 2004 को चेन्नई में एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी का निधन हो गया. अब उनकी यही असाधारण जिंदगी रश्मिका मंदाना के जरिए बड़े पर्दे पर दिखाई जाएगी.

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