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Vibe Review: जासूसी के चक्कर में उलझे कुणाल खेमू, कॉमेडी ने बचाई फिल्म की लाज?

कुणाल खेमू अपनी स्पाई-कॉमेडी फिल्म वाइब लेकर थिएटर्स में आ चुके हैं. इसमें प्रीति जिंटा, स्पर्श श्रीवास्तव, यशपाल शर्मा और दिनेश लाल यादव जैसे स्टार्स हैं. मडगांव एक्सप्रेस जैसी सक्सेसफुल फिल्म के बाद, ये कुणाल की दूसरी फिल्म है जिसे उन्होंने डायरेक्ट किया. तो आखिर कैसी है ये 'वाइब'? पढ़िए हमारा रिव्यू...

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कुणाल खेमू की वाइब का रिव्यू (Photo: ITGD)
कुणाल खेमू की वाइब का रिव्यू (Photo: ITGD)
फिल्म:वाइब
3/5
  • कलाकार : कुणाल खेमू, प्रीति जिंटा, स्पर्श श्रीवास्तव, दिनेश लाल यादव (निरहुआ)
  • निर्देशक :कुणाल खेमू

बॉलीवुड एक्टर कुणाल खेमू ने तीन साल पहले मडगांव एक्सप्रेस फिल्म से जनता को काफी इंप्रेस किया था. इसकी कॉमेडी इतनी नेचुरल और मजेदार थी कि इसे लोगों ने बॉक्स ऑफिस पर सफल बना डाला. कुणाल के डायरेक्शन डेब्यू की जमकर तारीफ हुई थी. इसके बाद जब उन्होंने नई फिल्म वाइब अनाउंस की, तब लोग अपने आप ही इसके लिए एक्साइटेड हो गए थे.

फिल्म का ट्रेलर भी बढ़िया था, और फिर से एंटरटेनमेंट का डोज दिलाने का वादा कर रहा था. कुणाल की फिल्म वाइब में प्रीति जिंटा, स्पर्श श्रीवास्तव, यशपाल शर्मा, और दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ भी हैं. आज ये फिल्म थिएटर्स में रिलीज हो गई. ऐसे में अब सवाल ये उठता है कि क्या फिल्म अपने ट्रेलर जितनी मजेदार है? चलिए, विस्तार से इसपर बात करते हैं. 

क्या है ये वाइब का मसला? 

फिल्म की कहानी में हार्दिक (कुणाल खेमू) और बग्स (स्पर्श श्रीवास्तव) हैं. दोनों दोस्त हैं, जिनकी जिंदगी जासूसी की उस दुनिया से बिल्कुल अलग और आम है, जिसमें वो अचानक फंस जाते हैं. हार्दिक थोड़ा जल्दबाज और नासमझ है और अक्सर बिना सोचे-समझे अपने दिल की सुनता है. वहीं, बग्स दोनों में ज्यादा समझदार है, लेकिन हार्दिक के साथ रहने की वजह से उसकी समझदारी भी ज्यादा काम नहीं आ पाती.

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कहानी की शुरुआत प्यार और कुछ गलत फैसलों से होती है, लेकिन धीरे-धीरे दोनों एक बड़े मिशन का हिस्सा बन जाते हैं, जिसका कनेक्शन खुफिया अधिकारी मैडम एच (प्रीति जिंटा) से है. वो दोनों को इस देश के लिए कुछ कर दिखाने का मौका देती है. मगर हार्दिक इसके लिए रेडी नहीं रहता है. ऐसे में क्या हार्दिक-बग्स देश पर आए खतरे को टाल पाएंगे? क्या वो एक बेहतरीन स्पाई बन पाएंगे? यही आपको इस फिल्म में देखकर पता चलेगा, जिसमें कॉमिक सिचुएशन डाले गए हैं. 

अच्छा है कुणाल का आइडिया, लेकिन...

ये सुनने में एक ऐसी फिल्म लगती है, जिसमें दोस्ती वाली कॉमेडी और जासूसी वाली थ्रिलर का मेल है. लेकिन कुणाल खेमू का ध्यान जासूसी की बारीकियों से ज्यादा इस बात पर है कि दो अलग और अजीबोगरीब लोगों को ऐसी दुनिया में डालने पर कितनी कॉमेडी पैदा हो सकती है, जहां हर काम बिल्कुल सटीक तरीके से होना चाहिए. और यहीं वाइब सबसे ज्यादा मजेदार लगती है।

फिल्म का ह्यूमर काफी बेफिक्र और बेतरतीब है, जो कुछ हद तक मडगांव एक्सप्रेस की सहज और रोजमर्रा वाली कॉमेडी की याद दिलाता है, हालांकि इस फिल्म का दायरा काफी बड़ा है. कुणाल खेमू अजीब खामोशियों, मजेदार रिएक्शन्स, बढ़ती गलतफहमियों और ऐसे किरदारों के जरिए कॉमेडी पैदा करते हैं, जो गलत फैसले लेते हुए भी पूरी तरह यकीन के साथ आगे बढ़ते हैं. फिल्म के कुछ सबसे मजेदार सीन इसलिए नहीं हैं कि उनमें बहुत शानदार या जटिल जोक्स हैं, बल्कि इसलिए हैं क्योंकि एक्टर्स ने ये बात बखूबी समझी है कि आसपास हो रही अजीबोगरीब चीजों को उनके किरदारों को कितनी गंभीरता से लेना चाहिए. 

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हालांकि, फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी कहानी और स्क्रीनप्ले है. वाइब में कई ऐसे मजेदार आइडिया हैं, जिनसे कई सीन बनाए जा सकते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वो सभी एक ही फिल्म में होने चाहिए. फिल्म में बार-बार एक के बाद एक मजाक, ट्विस्ट और नई उलझनें जोड़ दी जाती हैं. इससे ऐसा लगता है कि कहानी लगातार खुद को पहले से ज्यादा बड़ा और मजेदार दिखाने की कोशिश कर रही है. किसी मजेदार स्थिति को थोड़ी देर स्वाभाविक तरीके से आगे बढ़ाने के बजाय, फिल्म अक्सर उसे और ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने लगती है. इसका असर फिल्म के इमोशनल हिस्से पर भी पड़ता है. 

कमजोर है मगर कॉमेडी करती है असर

विडंबना ये है कि वाइब को चलने के लिए इतनी ज्यादा कहानी की जरूरत ही नहीं थी. फिल्म के सबसे अच्छे पल तब आते हैं, जब हार्दिक और बग्स बस साथ में नजर आते हैं और अपनी केमिस्ट्री दिखाते हैं. जब भी फिल्म थोड़ी धीमी होती है और दोनों की केमिस्ट्री को खुलकर सामने आने का मौका देती है, तब ये ज्यादा गर्मजोशी भरी और मजेदार लगती है. लेकिन जब फिल्म जासूसी वाली कहानी को ज्यादा बड़ा, शोरगुल वाला या उलझा हुआ बनाने की कोशिश करती है, तो उसका आकर्षण कम होने लगता है. 

फिर भी, इस फिल्म की एक बात ताजगी भरी लगती है कि यह जासूसी की दुनिया को बहुत गंभीरता से लेने की कोशिश नहीं करती. वाइब थोड़ी बिखरी हुई है, कई जगह जरूरत से ज्यादा चीजें ठूंस दी गई हैं और फिल्म अपने अंदाज में काफी बेफिक्र भी है. लेकिन इसके बावजूद इसकी कॉमेडी का अपना एक अलग अंदाज है. फिल्म समझती है कि इसकी सबसे बड़ी ताकत मिशन, ट्विस्ट या बड़े-बड़े एक्शन सीन नहीं हैं. असली मजा तो इन दो ऐसे दोस्तों को देखने में है, जिन्हें कुछ भी ठीक से नहीं आता, फिर भी वो ऐसी दुनिया में टिके रहने की कोशिश कर रहे हैं, जहां हर कोई उनसे उम्मीद करता है कि उन्हें पता होगा कि वो क्या कर रहे हैं.

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कैसी है सबकी एक्टिंग?

कुणाल खेमू को हार्दिक के किरदार में खास तौर पर देखा जाए तो वो एक ऐसे शख्स का रोल बखूबी निभाते हैं, जो प्यारा होने के साथ-साथ थोड़ा परेशान करने वाला भी है. वो अपने किरदार को जरूरत से ज्यादा समझदार या हीरो बनाने की कोशिश नहीं करते और यही बात फिल्म की कॉमेडी को स्वाभाविक बनाए रखती है. वहीं, स्पर्श श्रीवास्तव उनके किरदार के बिल्कुल उलट नजर आते हैं. बग्स का शांत और संयमित अंदाज फिल्म को तब भी थोड़ा वास्तविक बनाए रखता है, जब उसके आसपास सब कुछ पूरी तरह अफरा-तफरी में बदल जाता है. दोनों की दोस्ती फिल्म की जासूसी वाली कहानी से ज्यादा दिलचस्प लगती है, क्योंकि यही फिल्म का इमोशनल पॉइंट बन जाती है.

प्रीति जिंटा यहां एक अलग तरह के मजेदार किरदार में नजर आती हैं. मैडम एच के रूप में वो एक ऐसा रौब और गंभीरता लेकर आती हैं, जो उन दोनों पुरुष किरदारों से बिल्कुल अलग है, जिनसे उन्हें निपटना पड़ता है. एक बेहद अनुशासित खुफिया अधिकारी को ऐसे दो लोगों से काम करवाते देखना अपने आप में मजेदार है, जो शायद ही कभी ठीक से अपना काम कर पाते हैं. प्रीति जिंटा इन दोनों की अराजकता के बीच गंभीर और संयमित किरदार निभाती हैं, लेकिन उनका रोल सिर्फ कहानी को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं रह जाता. 

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फिल्म के बाकी कलाकार भी इसकी अनिश्चित और मजेदार दुनिया को और दिलचस्प बनाते हैं. शर्मिला टैगोर, यशपाल शर्मा और दिनेश लाल यादव ऐसे माहौल को बनाने में योगदान देते हैं, जो कई बार कहानी की जरूरत से भी ज्यादा बड़ा और अजीब लगता है. वंशिका धीर भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में कामयाब रहती हैं. अगर आप एक अच्छी कॉमेडी फिल्म देखने का मन बना रहे हैं, तो कुणाल की फिल्म को एक मौका दे सकते हैं.

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