मनोज बाजपेयी की फिल्म गवर्नर आजकल खूब चर्चा में है. कुछ दिन पहले फिल्म का ट्रेलर आया था, जिसकी कहानी ने दर्शकों की जिज्ञासा बढ़ा दी है. दो साल बाद मनोज के लीड रोल वाली फिल्म थिएटर्स में पहुंच रही है. गवर्नर की कहानी भारत के पूर्व गवर्नर एस वेंकटरामनन पर बेस्ड है जिन्होंने 1991 के बैलेंस ऑफ पेमेंट क्राइसिस से उबरने में बड़ा रोल निभाया था.
फिल्म में मनोज बाजपेयी उनका रोल निभा रहे हैं. लेकिन गवर्नर में जनता की दिलचस्पी की एक और बड़ी वजह है— ट्रेलर में नजर आ रही कहानी और आज भारत की आर्थिक सिचुएशन में समानताएं. रुपये के गिरने, क्रूड ऑयल के बढ़ते दाम और भारत पर आर्थिक संकट की चिंता गवर्नर की कहानी में दिख रही है. दरअसल, फिल्म में भारत पर आए आर्थिक संकट की एक ऐसी कहानी है, जो कभी बड़े पर्दे पर नहीं उतरी.
बैलेंस ऑफ पेमेंट को एकदम साधारण तरीके से ऐसे समझ सकते हैं— भारत की करेंसी रुपया है लेकिन विदेशों से आयात-निर्यात डॉलर में होता है. भारत जब विदेश में प्रोडक्ट या सेवाएं बेचता है (निर्यात) तो डॉलर कमाता है. और जब क्रूड ऑयल और सोना वगैरह खरीदता है तो डॉलर खर्च करता है (आयात).
निर्यात कम होने और रुपये की कीमत गिरने पर भी विदेशी खरीद की पेमेंट न रुके, ये बैलेंस बनाने के लिए एक खजाना (फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व) मेंटेन किया जाता है. इसलिए जब डॉलर्स आते कम हैं और खर्च ज्यादा होते हैं, तो खजाने पर लोड बढ़ने लगता है. और पेट्रोलियम या सोने जैसी चीजें तो हर हाल में खरीदनी ही हैं, इसलिए लोड बढ़ता चला जाता है. इसी को बैलेंस ऑफ पेमेंट क्राइसिस बोलते हैं. इस क्राइसिस का तगड़ा असर भारत ने 1991 में झेला था.
भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर सोवियत संघ टूट रहा था, जिससे रुपये की वैल्यू कमजोर होने लगी. उधर खाड़ी में युद्ध छिड़ गया था. अमेरिका के नेतृत्व में 42 देशों ने इराक पर हमला बोल दिया. भारत क्रूड ऑयल के लिए इराक और कुवैत पर निर्भर था. इन दोनों के भिड़ जाने से क्रूड ऑयल के दाम बढ़ते ही चले गए. बैलेंस ऑफ पेमेंट क्राइसिस इतना बढ़ गया कि बताते हैं भारत के पास एक समय तीन हफ्ते भर का आयात करने के लिए भी फंड्स नहीं बचे थे.
पिछले दिनों खाड़ी में ईरान से शुरू हुए युद्ध के चलते पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स और बहुत सारी चीजों के दाम बढ़े हैं, जिससे ये बैलेंस बिगड़ने की स्थिति बनने का खतरा है. ऐसा न हो इसलिए प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ दिनों पहले फ्यूल बचाने, सोना कम खरीदने और विदेश यात्राएं कम करने की अपील की थी. लेकिन सवाल ये है कि इसका कनेक्शन मनोज बाजपेयी की फिल्म गवर्नर से कैसे है?
एस वेंकटरामनन ने 1989 में ही फाइनेंस सेक्रेटरी रहते हुए, वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री कार्यालय को एक नोट लिखकर आगाह किया था कि देश की अर्थव्यवस्था खतरे में है. तब केंद्र में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार थी. वेंकटरामनन ने अपने नोट में बैलेंस ऑफ पेमेंट सिस्टम पर पड़ रहे लोड का अलर्ट दिया था. उनकी सलाह थी कि भारत को IMF (इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड) और दूसरे चैनलों से मदद लेनी चाहिए. तब प्रधानमंत्री राजीव गांधी के ऑफिस से जवाब मिला कि अभी इसकी जरूरत नहीं है.
1991 में जब प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार थी तब अप्रैल-मई में क्राइसिस और ज्यादा बड़ा हो गया. कांग्रेस पार्टी चंद्रशेखर सरकार को समर्थन दे रही थी, इसलिए राजीव गांधी के कहने पर वेंकटरामनन को दिसंबर 1990 में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का गवर्नर बनाया गया.
दिल्ली में वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और उनकी टीम बैलेंस ऑफ पेमेंट क्राइसिस मैनेज करने में जुटे थे और मुंबई में आरबीआई गवर्नर वेंकटरामनन काम पर लगे थे. मदद के दरवाजे खटखटाने का दौर शुरू हुआ, लेकिन क्राइसिस के दौर में लोग भारत का चेहरा देखकर वापस दरवाजा बंद कर देते. सारे सेंट्रल बैंकों के बैंक, बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स (BIS) ने भी मना कर दिया. मगर ऐसे में वेंकटरामनन बैंक ऑफ जापान और बैंक ऑफ लंदन को मनाने में कामयाब हुए.
जब इन बैंकों ने भारत की मदद के बदले सिक्योरिटी में सोना रखने को कहा, तो एक नई समस्या खड़ी हुई. भारतीय जनता के लिए सोना केवल धातु नहीं, इमोशन भी है. देश का सोना 'गिरवी' रखे जाने की खबर फैलने पर बड़ा बवाल होने का डर था, लेकिन देश के सामने आर्थिक मदद का यही रास्ता बचा था.
वेंकटरामनन ने सबकुछ खुद मैनेज किया. कस्टम के अधिकारियों को बिना लाइसेंस या क्लीयरेंस सोने के बॉक्सेज निकलवाने के लिए राजी किया. पहली खेप में 20 टन और दूसरी में 67 टन सोना सिक्योरिटी के रूप में विदेश गया. बदले में भारत को 600 मिलियन डॉलर की मदद मिली. इस तरह 1991 का क्राइसिस मैनेज हुआ और भारत ने दोबारा ऐसी किसी स्थिति से बचने के लिए बड़े आर्थिक बदलाव शुरू कर दिए.
वेंकटरामनन 1990 से 1992 तक गवर्नर रहे और ये वक्त भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा. इसलिए कई लोग उन्हें बेहतरीन क्राइसिस मैनेजर मानते हैं. मगर बाद में 1992 के स्टॉक मार्केट स्कैम (हर्षद मेहता स्कैम) के लिए उन्हें आलोचनाएं भी झेलनी पड़ीं. वेंकटरामनन की जिंदगी के ये दो साल भारत के इतिहास के बहुत दिलचस्प चैप्टर हैं और गवर्नर में जनता इन्हीं को देखने के लिए एक्साइटेड है. देखना है कि 12 जून को आ रही गवर्नर इन उम्मीदों पर कितनी खरी उतरती है.