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दिल्ली के आंदोलन की तपिश लखनऊ तक ले जाने की तैयारी में सपा-कांग्रेस?

दिल्ली के जंतर मंतर पर शुरू ही पेपर लीक की लड़ाई को कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री के दरवाजे तक पहुंचा दिया है. अब दिल्ली से शुरू हुए आंदोलन की तपिश से यूपी की सियासत गर्मा गई है, लेकिन क्या बीजेपी के कठघरे में खड़ा कर पाएंगे?

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सड़क से संसद तक राहुल गांधी और अखिलेश यादव की केमिस्ट्री (Photo-PTI)
सड़क से संसद तक राहुल गांधी और अखिलेश यादव की केमिस्ट्री (Photo-PTI)

राजनीति में समय और माहौल सबसे बड़े हथियार होते हैं. दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट (NEET) पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार के खिलाफ उपजे छात्रों के आंदोलन से जो राजनीतिक तपिश पैदा हुआ है, उसे समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश तक ले जाने में जुटी है.  कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के द्वारा शुरू हुए आंदोलन की सियासी नब्ज को पहचानकर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पहले अपनी पत्नि डिंपल यादव को फ्रंटफुट पर उतारा और अब खुद भी सड़क पर उतरकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. 

नीट पेपर लीक,  शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के मुद्दों को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने छात्र और युवाओं का आंदोलन खड़ा किया. सीजेपी के अगुवाई में लाखों छात्रों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपनी आवाज बुलंद की और मॉनसून सत्र के शुरू होते ही आंदोलन ने आक्रामक तेवर अपना लिया है. 

संसद भवन से लेकर पीएम आवास तक राहुल गांधी और अखिलेश यादव सहित विपक्ष के दिग्गजों की इस अचानक एंट्री ने न सिर्फ दिल्ली पुलिस के हाथ-पांव फुला दिए, बल्कि देश की राजधानी से लेकर उत्तर प्रदेश तक के सियासी माहौल को चरम पर पहुंचा दिया है. अब सवाल यह उठता है कि है कि क्या यह सियासी उबाल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक बना रहेगा? क्या अखिलेश यादव सहित विपक्षी दल इसे वोटों की फसल में तब्दील कर पाएंगे?

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दिल्ली के जंतर-मंतर से यूपी की सड़कों तक संग्राम
नीट पेपर लीक मामले को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब देश की राजधानी से निकलकर उत्तर प्रदेश के सियासी तपिश बढ़ा दी है. डिंपल यादव समेत सपा के वरिष्ठ सांसदों ने दिल्ली में छात्रों के साथ मार्च किया और पुलिस कार्रवाई के विरोध में मोर्चा संभाला. सोमवार को दिल्ली में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज और पुलिस कार्रवाई होते ही सपा कार्यकर्ताओं ने लखनऊ के हजरतगंज चौराहा और इको गार्डन में जोरदार प्रदर्शन शुरू कर दिया. 

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पहले संसद भवन में मीडिया से बात करते हुए इस मुद्दे को आक्रामक रूप से उठाकर केंद्र और राज्य सरकार को सियासी कठघरे में खड़े करने की कवायद की. जंतर-मंतर पर सीजेपी के 'चलो संसद' मार्च के दौरान छात्रों पर हुए लाठीचार्ज और वॉटर कैनन के इस्तेमाल के बाद माहौल पहले से ही तनावपूर्ण था, लेकिन राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को सीधे प्रधानमंत्री के दरवाजे तक लेकर पहुंच गए.

सपा प्रमुख अखिलेश यादव

प्रधानमंत्री आवास के बाहर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने धरने पर बैठकर मोदी सरकार का खिलाफ बिगुल फूंक दिया तो साथ में अखिलेश यादव भी पहुंचकर हुंकार भर दी. ऐसे में राहुल और अखिलेश को पुलिस ने हिरासत में लिए जाने खिलाफ सपा-कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं का गुस्सा फूट पड़ा. इस एक्शन के खिलाफ कांग्रेस- सपा के तमाम बड़े नेता और भारी संख्या में कार्यकर्ता विरोध प्रदर्शन करने के लिए सीधे उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंच गए.

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कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और सपा के प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल के अगुवाई में कार्यकर्ताओं ने लखनऊ में बीजेपी के खिलाफ जमकर नारेबाजी की. यूपी के अलग-अलग जिलों में भीदोनों ही पार्टी के नेता और कार्यकर्ता सड़क पर उतरकर प्रदर्शन शुरू कर दिया. इस तरह उत्तर प्रदेश का सियासी माहौल काफी गरमा गया है. 

राहुल गांधी और अखिलेश यादव की सियासी केमिस्ट्री
दिल्ली में भड़की छात्र आंदोलन की चिंगारी ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक माहौल में सियासी तपिश पैदा कर दी है. राहुल गांधी और कांग्रेस ने छात्र आंदोलन को लेकर सड़क पर उतर गई है. राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस सांसदों ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर पीएम आवास 7 लोक कल्याण मार्ग के बाहर धरना प्रदर्शन शुरू किया तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी पहुंचकर सरकार का खिलाफ बिगुल फूंक दिया. इस तरह से दोनों नेताओं के सड़क पर उतरने से सियासी माहौल गर्म गया. 

छात्र संगठनों द्वारा शुरू किए गए इस आंदोलन को जब राहुल गांधी और अखिलेश जैसे कद्दावर नेताओं का चेहरा मिला, तो यह अब सिर्फ एक छात्र प्रदर्शन न रहकर केंद्र सरकार के खिलाफ एक राष्ट्रीय अभियान बन गया है. , अखिलेश और राहुल का पीएम आवास के बाहर एक साथ ज़मीन पर बैठना यह दर्शाता है कि विपक्ष युवा और बेरोजगारी के मुद्दे पर पूरी तरह एकजुट है.

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राहुल गांधी

राहुल गांधी और अखिलेश यादव का कहना था कि दिल्ली में छात्रों पर हमला देश के हर परिवार पर हमला है. विपक्ष ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और संसद में इस मुद्दे पर तत्काल बहस की मांग रख दी. कई घंटों तक संघर्ष के बाद दिल्ली पुलिस ने बलपूर्वक धरने को हटाया. इस दौरान राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव को बस में भरकर डिटेन किया गया.

पुलिस के साथ धक्का-मुक्की की तस्वीरों में राहुल गांधी की नाक से खून बहता और चोट के निशान भी साफ नज़र आए तो अखिलेश यादव के आक्रामक तेवर भी नजर आए.  इस तरह राहुल-अखिलेश की सियासी केमिस्ट्री दिल्ली सड़क से संसद तक दिखी, जिसने यूपी में सपा और कांग्रेस की दोस्ती को मजबूत किया. 

उत्तर प्रदेश की सियासत पर कितना पड़ेगा असर
उत्तर प्रदेश में युवाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों की भारी आबादी है. कांग्रेस और सपा जानती है कि पुलिसिया कार्रवाई और राहुल-अखिलेश की गिरफ्तारी की तस्वीरें युवाओं के गुस्से को वोटों में बदल सकती हैं. विपक्ष के पास इस लहर पर सवार होकर सत्ताधारी गठबंधन को घेरने का एक बेहतरीन मौका है. इसीलिए लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी और कानपुर जैसे छात्र-बहुल शहरों में इस घटना के विरोध में सपा और कांग्रेस के कार्यकर्ता सड़कों पर उतरकर बीजेपी को सियासी कठघरे में खड़े करने में जुट गए हैं. 

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प्रियंका गांधी

उत्तर प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले करोड़ों छात्र हैं. पेपर लीक और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी ने युवाओं के मन में भारी गुस्सा पैदा कर दिया है. सपा अगर इस गुस्से को 'प्रशासनिक विफलता' साबित करने में सफल रहती है, तो यह बीजेपी के कोर युवा वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सकता है. राहुल-अखिलेश की जोड़ी ने इस जन-आक्रोश की नब्ज को पहचानकर इसे उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाने का प्लान बना लिया है.

राहुल और अखिलेश यादव खुद सियासी रणभूमि में उतरे तो साथ ही पार्टी नेताओं और कांग्रेस को भी उतार दिया. दिल्ली के छात्र आंदोलन की तपिश लखनऊ तक पहुंच चुकी है और सपा-कांग्रेस ने इसे भुनाने के लिए अपने सारे मोहरे फिट कर दिए हैं. पहले डिंपल यादव के फ्रंट पर आने से सपा को यह फायदा हुआ है कि छात्र राजनीति का मुद्दा अब सिर्फ पुरुष कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि छात्राओं और उनके अभिभावकों से भी जुड़ गया है. 

अखिलेश-राहुल की हिरासत से मिलेगी सहानुभूति
नीट और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर प्रदर्शनकारी छात्रों के समर्थन में उतरना और पुलिस के हाथों हिरासत में जाना, सपा के लिए एक बड़ी सियासी संजीवनी साबित हो रहा है, इससे पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर युवाओं और बेरोजगारों के सबसे बड़े मुखर विकल्प के रूप में उभरने का मौका मिल रहा है. डिंपल यादव का आमतौर पर शांत और संयमित चेहरा होता है, लेकिन जंतर-मंतर पर सरकार और दिल्ली पुलिस पर तीखे हमले करते दिखीं. 

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जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान उनका आक्रामक तेवर, बैरिकेडिंग पार करने की कोशिश और एक घायल छात्र की मदद करते हुए मानवीय चेहरा सोशल मीडिया पर खासा चर्चा में रहा. जंतर-मंतर की सड़क पर मोर्चा खोलने के बाद अपने सांसदों के साथ डिंपल यादव संसद भवन में भी नीट और पेपर लीक के मुद्दे को उठाकर बीजेपी और मोदी सरकार को कठघऱे में खड़ी करती नजर आ रही हैं.  

उत्तर प्रदेश में सात महीने के बाद विधानसभा चुनाव है, सपा के लिए यह चुनाव अपने सियासी वजूद को बचाए रखने का है. जंतर-मंतर से शुरू हुआ आंदोलन पीएम के आवास तक पहुंचा और अब संसद में सपा और कांग्रेस ने मोर्चा खोल दिया है. दिल्ली से अखिलेश, राहुल, प्रियंका डिंपल यादव ने लखनऊ की सियासत को सियासी संदेश देने का दांव चला है. 

डिंपल और प्रियंका के जरिए दिया सियासी संदेश
सीजेपी के प्रोटेस्ट के जरिए सपा और कांग्रेस ने एम-वाई समीकरण मुस्लिम-यादव नहीं बल्कि महिला और यूथ को साधने का दांव माना जा रहा है. भारतीय राजनीति में महिला वोटर एक स्वतंत्र और निर्णायक वोट बैंक बनकर उभरी हैं, प्रियंका गांधी और डिंपल यादव की आंदोलन में सक्रियता से महिलाओं के मुद्दों पर सपा की छवि एक संवेदनशील और सुरक्षा देने वाली पार्टी के रूप में मजबूत कर सकती है. 

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डिंपल यादव

डिंपल यादव ने जंतर मंतर पर संघर्ष करती नजर आईं तो प्रियंका गांधी ने राहुल के साथ पीएम आवास पर धरना दिया. अब संसद भवन में सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. प्रियंका और डिपंल का आक्रामक और संवेदनशील नेतृत्व का सीधा रणनीतिक लाभ सपा और कांग्रेस को मिल सकता है.

डिंपल यादव का सौम्य लेकिन मजबूत रुख उन्हें सपा के भीतर और उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक प्रमुख महिला नेता के रूप में स्थापित करता है. ऐसे में सीधे महिला वर्ग से जुड़ सकता है. इसके अलावा छात्रों के साथ खड़ी होकर डिंपल-प्रियंका ने युवाओं के समर्थन को हासिल करने की कवायद मानी जा रही है. इस युवा आक्रोश को बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं और ठोस नीतिगत वादों से जोड़ पाए, तो यकीनन यह मुद्दा यूपी चुनाव के चुनावी समीकरणों को बदलने की पूरी ताकत रखता है.
 

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