भारतीय राजनीति में 'युवा तुर्क' कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ऐसे कद्दावर नेता थे, जिनकी सियासी तूती बोलती थी. वे अपने बेबाक अंदाज, निर्भीक स्वभाव और समाजवादी विचारधारा के लिए जाने जाते थे. चंद्रशेखर के बाद उनकी सियासी विरासत को उनके बेटे नीरज शेखर ने आगे बढ़ाया. इस तरह शेखर परिवार का चार दशकों से देश की संसद में दबदबा रहा और लोकसभा तथा राज्यसभा में लगातार उपस्थिति बनी रही.
पूर्व पीएम चंद्रशेखर के छोटे बेटे नीरज शेखर का राज्यसभा कार्यकाल खत्म होने जा रहा है. बीजेपी ने उन्हें दोबारा राज्यसभा का प्रत्याशी नहीं बनाया है. नीरज शेखर सपा को त्याग कर बीजेपी में शामिल हुए थे, ऐसे में दोबारा मौका न मिलना उनके और समर्थकों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. इसके साथ ही 'शेखर परिवार' की संसद में उपस्थिति का सिलसिला फिलहाल थम गया है.
बीजेपी ने दो बार के लोकसभा और तीन बार के राज्यसभा सांसद रहे नीरज शेखर को इस बार टिकट नहीं दिया. इसके साथ ही 37 साल में पहली बार ऐसी स्थिति आई है जब उत्तर प्रदेश के बलिया का यह चर्चित राजनीतिक घराना संसद के किसी भी सदन में मौजूद नहीं होगा. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चंद्रशेखर परिवार की बीजेपी को अब जरूरत नहीं रह गई है?
कैसे बिगड़ा नीरज शेखर का राजनीतिक खेल?
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर यूपी की सियासत में एक बड़ा मुकाम रखते हैं. खासकर पूर्वांचल के ठाकुर समुदाय के बीच उनकी मजबूत सियासी पैठ रही है. चंद्रशेखर के निधन के बाद नीरज शेखर उनके सियासी वारिस बनकर उभरे और संसद पहुंचे. वे सपा से राज्यसभा सांसद रहे, लेकिन बाद में उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया. बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा भेजा, लेकिन वक्त के साथ उनका सियासी गणित भी बिगड़ गया. नीरज शेखर को राज्यसभा उम्मीदवार न बनाए जाने के कई अहम कारण माने जा रहे हैं.
नीरज शेखर 2019 में समाजवादी पार्टी और राज्यसभा सीट छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे. बीजेपी ने उस समय उन्हें राज्यसभा भेजकर सम्मानित किया, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी अपने सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को नए सिरे से साध रही है. ऐसे में बीजेपी ने उच्च सदन के लिए पार्टी के नए कार्यकर्ताओं और अन्य सामाजिक समीकरणों को तरजीह दी.
चंद्रशेखर परिवार का कम होता सियासी दबदबा
चंद्रशेखर और उनके परिवार का बलिया में जो व्यक्तिगत प्रभाव था, नीरज शेखर उसे पूरी तरह चुनावी रूप में अपने पक्ष में बनाए रखने में सफल नहीं रहे. नीरज शेखर को साध लेने का सीधा चुनावी लाभ बीजेपी को व्यापक स्तर पर नहीं मिला. 2022 के विधानसभा चुनाव में बलिया की 7 विधानसभा सीटों में से सपा गठबंधन को 4, बीजेपी को 2 और बसपा को एक सीट मिली थी. इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने नीरज शेखर को बलिया से अपना उम्मीदवार बनाया, लेकिन सपा के सनातन पांडे ने उन्हें शिकस्त दी.
बलिया के वरिष्ठ पत्रकार हरिनारायण मिश्रा बताते हैं कि पूर्वांचल में पिछले विधानसभा चुनावों में बीजेपी को कम सीटो के मिलने के कारण पार्टी ने इस बार नीरज शेखर का टिकट काटा दिया है, क्योंकि बलिया में भी वो खुद भी चुनाव नहीं जीत सके.
बीजेपी अपने राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन में अक्सर चौंकाने वाले फैसले लेती रही है और लगातार एक ही नेता को राज्यसभा में दोहराने से बचती है, जब तक कि कोई बड़ा प्रशासनिक या सांगठनिक कारण न हो. नीरज शेखर को इस नीति का नुकसान उठाना पड़ा. इसके अलावा बलिया में शेखर परिवार की पकड़ ढीली होती देख पार्टी ने उन्हें ड्रॉप कर दिया, जिसके चलते ही 37 साल में पहली बार ऐसा होगा जब शेखर परिवार से कोई भी सदस्य संसद में नहीं होगा.
संसद से 'चंद्रशेखर परिवार' हो गया आउट
उत्तर प्रदेश के किसान परिवार में जन्मे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर 'क्रांतिकारी जोश' और 'युवा तुर्क' के नाम से मशहूर रहे. बलिया के इब्राहिमपट्टी गांव में 17 अप्रैल 1927 को जन्मे चंद्रशेखर अपने छात्र जीवन से ही सामाजिक आंदोलनों का हिस्सा रहे. वे 1951 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुए, लेकिन बाद में कांग्रेस का दामन थाम लिया. 1962 में वे पहली बार राज्यसभा सदस्य चुने गए और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
1975 में आपातकाल लगाए जाने के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और इंदिरा गांधी के 'मुखर विरोधी' के तौर पर उनकी पहचान बनी. चंद्रशेखर 1977 से लेकर 2007 तक 8 बार बलिया संसदीय सीट से चुनाव जीते. हालांकि 1984 में इंदिरा गांधी के निधन के बाद हुए चुनाव में उन्हें एकमात्र हार का सामना करना पड़ा था. इसके बाद 1989 से 2007 तक चंद्रशेखर लगातार लोकसभा सांसद रहे. 1989, 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में वे लगातार चुनाव जीते. 2007 में उनके निधन के बाद उनकी सियासी विरासत को नीरज शेखर ने आगे बढ़ाया.
साल 2007 में बलिया सीट पर हुए लोकसभा उपचुनाव में चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर सपा के टिकट पर जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचे. इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने जीत हासिल की, लेकिन 2014 की मोदी लहर में वे चुनाव हार गए. चुनाव हारने के बाद अखिलेश यादव ने उन्हें सपा के कोटा से राज्यसभा भेज दिया. 2019 में जब सपा ने उन्हें लोकसभा का टिकट नहीं दिया, तो उन्होंने सपा और राज्यसभा सीट दोनों से इस्तीफा देकर बीजेपी का दामन थाम लिया.
सपा से अलग होने के बाद वे बीजेपी के टिकट पर उप-चुनाव जीतकर राज्यसभा पहुंचे और फिर 2020 में बीजेपी ने उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजा. अब उनका कार्यकाल समाप्त होने पर बीजेपी ने उन्हें प्रत्याशी नहीं बनाया है.
भारतीय राजनीति के इतिहास में 37 साल बाद (1987 के बाद) पहली बार ऐसा होगा, जब शेखर परिवार से एक भी शख्स न तो लोकसभा में होगा और न ही राज्यसभा में. संसद के दोनों सदनों में शेखर परिवार की अनुपस्थिति इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारतीय राजनीति अब सिर्फ विरासत के भरोसे नहीं, बल्कि बदलते सांगठनिक हितों और चुनावी गणित पर ज्यादा निर्भर हो चुकी है.
बलिया की राजनीति और परिवार के आगे की राह
नीरज शेखर का संसद से बाहर होना एक बड़ा सियासी झटका माना जा रहा है. यह उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र, खासकर बलिया जिले में एक बड़े सियासी अध्याय के अस्थायी विराम जैसा है. पूर्वांचल में बीजेपी अब नए चेहरों और अन्य क्षेत्रीय नेताओं को आगे बढ़ा रही है.
ऐसे में नीरज शेखर के पास अब संगठन में काम कर अपनी जमीनी पकड़ साबित करने या फिर अगले यूपी विधानसभा चुनाव के जरिए अपनी नई पारी शुरू करने का विकल्प बचा है.
यदि नीरज शेखर विधानसभा चुनाव नहीं लड़ते हैं, तो उन्हें अगले लोकसभा चुनाव का इंतजार करना पड़ेगा. अब उनके सामने धैर्य रखने के अलावा कोई और विकल्प नहीं दिखता. यह अलग बात है कि पार्टी आने वाले समय में उन्हें संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी दे दे या भविष्य के राजनीतिक समीकरणों में कोई नया मौका दे.