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जहां से चली थी लेफ्ट की सत्ता की ट्रेन, उसी केरल में लगा ब्रेक

केरल में पिनराई विजयन के नेतृत्व वाली वामपंथी सरकार का जाना केवल एक चुनावी हार नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के एक बड़े युग का अंत होगा. साल 2016 से सत्ता में रही यह सरकार देश में कम्युनिस्टों का आखिरी मजबूत गढ़ थी, जो अब ढह चुका है. साल 1977 के बाद यह भारतीय इतिहास में पहली बार हो रहा है जब देश के किसी भी राज्य में कोई कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री नहीं होगा.

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केरल में हार से लेफ्ट को लगेगा बड़ा झटका (Photo-ITG)
केरल में हार से लेफ्ट को लगेगा बड़ा झटका (Photo-ITG)

केरल की धरती, जिसे लेफ्ट का सबसे सुरक्षित और आखिरी गढ़ माना जाता था, आज अपने अस्तिव की लड़ाई की लड़ रहा है. विधानसभा चुनाव के रुझानों ने साफ कर दिया है कि केरल की जनता अब बदलाव चाहती है. लेकिन इस बार का प्रहार इतना गहरा है कि इसने लेफ्ट के अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं.

रुझानों में यूडीएफ 100 सीटों के आंकड़े को छूती नजर आ रही है. कांग्रेस ने न केवल अपने पारंपरिक क्षेत्रों में वापसी की है, बल्कि लेफ्ट के गढ़ माने जाने वाले कन्नूर और पलक्कड़ जैसे जिलों में भी सेंध लगा दी है. खुद मुख्यमंत्री पिनराई विजयन अपनी पारंपरिक सीट धर्मदम से संघर्ष करते दिखे.

यह केवल एक राज्य की हार नहीं है, बल्कि एक लेफ्ट के अस्तित्व का संकट होगा. अगर केरल से लेफ्ट की सरकार जाती है, तो करीब 70 सालों के चुनावी इतिहास में यह पहली बार होगा, जब भारत के किसी भी राज्य में वामपंथ की सरकार नहीं होगी. पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा पहले ही हाथ से निकल चुके हैं. केरल आखिरी उम्मीद थी, लेकिन यहां की अगर हार होती है, तो जिस राज्य से लेफ्ट की जड़ें मजबूत हुई थीं, वहीं आज इसका 'सूर्य अस्त' होता दिख रहा है.

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लगातार दूसरी बार सत्ता में रहने के बाद, एलडीएफ (LDF) सरकार के खिलाफ भारी सत्ता-विरोधी लहर देखी गई, पिनाराई विजयन से लगातार दो बार से मुख्यमंत्री हैं, लेकिन 2026 के नतीजे उनके खिलाफ जा रहे हैं उनके कई मंत्री रुझानों में पीछे चल रहे हैं. पिछले कुछ सालों में लगे आरोपों और प्रशासनिक सुस्ती ने जनता के बीच अविश्वास पैदा किया. शिक्षित युवाओं का पलायन और रोजगार के मुद्दों पर यूडीएफ का आक्रामक प्रचार रंग लाया.

भारतीय राजनीति में वामपंथी आंदोलनों के इतिहास को देखें तो पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल इसके सबसे मजबूत आधार रहे हैं, लेकिन बीते कुछ सालों में यह परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है.

पश्चिम बंगाल एक ऐतिहासिक युग का अंत

पश्चिम बंगाल में वामपंथियों ने 1977 से लेकर 2011 तक लगातार 34 सालों तक शासन किया, जो अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड था. हालांकि, 2011 में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रे स (TMC) ने वाम मोर्चे के इस अजेय किले को ध्वस्त कर इतिहास रच दिया. बंगाल में हालत ऐसी हो गई कि उनकी पार्टी का एक भी विधायक नहीं रहा. 

त्रिपुरा में भी लेफ्ट का दबदबा काफी पुराना था, यहां 1993 से 2018 तक करीब 25 सालों तक वामपंथी सरकार सत्ता में रही, लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने सबको चौंकाते हुए वामपंथ का सफाया कर दिया. भाजपा ने अपनी इस जीत को 2023 में भी दोहराया और लेफ्ट को सत्ता से दूर रखा.

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यह भी पढ़ें: Kerala Election Result 2026 Live: केरल में कांग्रेस को रुझानों में बहुमत, लेफ्ट की हवा टाइट

केरल की राजनीति हमेशा से 'एक बार यूडीएफ और एक बार एलडीएफ' के ढर्रे पर चलती रही थी. लेफ्ट ने 2021 में लगातार दूसरी बार चुनाव जीतकर दशकों पुरानी इस परंपरा को तोड़कर अपनी पकड़ मजबूत दिखाई थी, लेकिन वर्तमान 2026 के रुझान संकेत दे रहे हैं कि अब केरल में भी वामपंथ के पैर उखड़ने लगे हैं. केरल के नतीजे लेफ्ट की सियासत का भविष्य तय करेंगे.

2021 में विधानसभा चुनाव में एलडीएफ ने 140 में 99 सीटें जीतकर इतिहास बनाया था. 50 सालों में पहली बार ऐसा हुआ था जब केरल में  कोई सत्ताधारी पार्टी की दूसरी बार लगातार सरकार बनी थी, लेकिन लेफ्ट इस बार हैट्रिक बनाने से चूक गई और इस बार केरल से लेफ्ट की विदाई तय है. देश में एक ऐसा पहला राज्य था जहां लेफ्ट का दुर्ग बचा हुआ था लेकिन 2026 के चुनावी नतीजे उसके लिए एक बुरे सपने की तरह है.  

इस हार का सबसे बुरा असर लेफ्ट पार्टियों की राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा. अब तक सीपीएम और सीपीआई जैसे दल अपनी कम सीटों के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा प्रभाव रखते थे, क्योंकि उनके पास बंगाल, त्रिपुरा और केरल जैसे राज्यों की ताकत थी, लेकिन आज स्थिति यह है कि इन तीनों राज्यों को मिलाकर उनके पास सिर्फ एक सांसद बचा है. केरल की सत्ता हाथ से निकलने के साथ ही अब दिल्ली के गलियारों में वामपंथियों की वह पुरानी धमक और दखल देने की क्षमता पूरी तरह खत्म होती नजर आ रही है.

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