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कमल मेला, फुटबॉल मैच और 1 लाख से ज्यादा बैठकें, बंगाल में बीजेपी के 'खेला' की इनसाइड स्टोरी 

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत सिर्फ रैलियों का नतीजा नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर चले बहुस्तरीय अभियान का परिणाम रही. कमल मेला, फुटबॉल मैच और 1.65 लाख घर-घर बैठकों ने मतदाताओं तक सीधा संवाद स्थापित किया. ‘बाचते चाईं, बीजेपी ताई’ जैसे नारों ने माहौल बनाया. पर्दे के पीछे सुनील बंसल और भूपेंद्र यादव की रणनीति ने चुनाव को माइक्रो लेवल तक मैनेज किया.

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पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के पीछे कई फैक्टर काम किए (Photo ITG)
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के पीछे कई फैक्टर काम किए (Photo ITG)

पश्चिम बंगाल की सियासत में इस बार जो हुआ, वह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि  सुनियोजित और बेहद बारीकी से तैयार किए गए अभियान का परिणाम है. लंबे समय तक कठिन मानी जाने वाली जमीन पर भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह बहुमत की राह बनाई, उसके पीछे केवल बड़ी रैलियां नहीं, बल्कि गली-गली, बूथ-बूथ और घर-घर तक पहुंची रणनीति काम कर रही थी. इस पूरी रणनीति के केंद्र में थे संगठन के दो बड़े चेहरे सुनील बंसल और चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव, जिनके साथ सह प्रभारी बिप्लब कुमार देब ने जमीन पर पूरा तंत्र खड़ा किया. बंगाल की इस जीत की कहानी को अगर समझना है, तो इसे केवल राजनीतिक नजरिए से नहीं, बल्कि कैम्पेन इंजीनियरिंग के रूप में देखना होगा. जहां हर कदम योजनाबद्ध था और हर गतिविधि का सीधा लक्ष्य मतदाता तक पहुंचना. 

कमल मेला: राजनीति को उत्सव में बदलने की रणनीति

बंगाल चुनाव में कैंपेन, कंटेंट और नरेटिव इंचार्ज केके उपाध्याय बताते हैं कि कमल मेला के रूप में इस चुनाव में भाजपा ने एक अनोखा प्रयोग किया. यह केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक ऐसा सामाजिक-राजनीतिक उत्सव था, जिसने राजनीति को आम लोगों के जीवन से जोड़ दिया. हर विधानसभा क्षेत्र में आयोजित इन मेलों ने पार्टी को एक अलग पहचान दी. यहां स्थानीय संस्कृति, संगीत, संवाद और राजनीतिक संदेश सब एक साथ जुड़े. इस पहल का मकसद साफ था राजनीति को मंच से उतारकर समाज के बीच लाना. और यही हुआ. जहां पारंपरिक रैलियां सीमित असर छोड़ती हैं, वहीं कमल मेला ने लोगों को भागीदार बना दिया.

फुटबॉल मैच: बंगाल की नब्ज पकड़ने की कोशिश

बंगाल में फुटबॉल केवल खेल नहीं, भावना है. भाजपा ने इस भावना को समझा और उसे अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया. राज्यभर में फुटबॉल मैच आयोजित कराए गए, जिनके जरिए युवाओं को सीधे जोड़ा गया. यह सिर्फ खेल आयोजन नहीं था, बल्कि एक एंट्री पॉइंट था. जहां से पार्टी युवाओं के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराती गई. इन मैचों के दौरान संवाद, संपर्क और संदेश तीनों एक साथ चलते रहे. इससे पार्टी को उन इलाकों में भी पहुंच मिली, जहां पारंपरिक राजनीतिक गतिविधियां सीमित थीं.

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घर-घर बैठकें: चुनाव का असली गेमचेंजर

अगर इस पूरे अभियान का सबसे प्रभावी हिस्सा कोई रहा, तो वह था आंगन बैठक मॉडल. फरवरी महीने में जब परीक्षाओं के कारण माइक से प्रचार सीमित हो गया, तब पार्टी ने इस चुनौती को अवसर में बदल दिया. सिर्फ एक महीने में 1 लाख 65 हजार से अधिक घर-घर बैठकों का आयोजन किया गया. यह बैठकों का नेटवर्क इतना गहरा था कि हर बूथ पर लोगों के छोटे-छोटे समूह बने. इन बैठकों में शामिल लोगों को जोड़ने के लिए व्हाट्सएप ग्रुप बनाए गए, जिससे संवाद लगातार बना रहा. यही वह स्तर था, जहां चुनाव मैक्रो से माइक्रो में बदल गया और यहीं से असली बढ़त बननी शुरू हुई.

‘बाचते चाईं, बीजेपी ताई’: नारे से बना नैरेटिव

हर चुनाव में एक नारा होता है, लेकिन बंगाल में यह नारा एक भावना  बन गया 'बाचते चाईं, बीजेपी ताई'. यह संदेश जो लोगों के बीच तेजी से फैल गया. बताया जा रहा है कि बच्चे-बच्चे की जुबान पर चढ़ा यह नारा चुनावी माहौल को बदलने में अहम साबित हुआ. नैरेटिव सेट करने में यह नारा उतना ही असरदार रहा, जितना कोई बड़ा चुनावी वादा.

12 हजार नुक्कड़ सभाएं: हर गली तक पहुंच

जनवरी से 27 अप्रैल के बीच 12 हजार से ज्यादा नुक्कड़ सभाओं का आयोजन किया गया. इन छोटी-छोटी सभाओं ने बड़े मंचों की कमी को पूरा किया. यहां सीधे संवाद हुआ, स्थानीय मुद्दे उठे और पार्टी का संदेश बिना किसी दूरी के लोगों तक पहुंचा. यह वही मॉडल था, जिसने चुनाव को जन आंदोलन का रूप दिया.

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चार्जशीट अभियान: विपक्ष पर सीधा हमला

15 जनवरी से 27 फरवरी तक चलाए गए चार्जशीट आधारित जनजागरण अभियान ने चुनावी बहस की दिशा तय की. 220 विधानसभा क्षेत्रों में चले इस अभियान में 150 से अधिक नेताओं ने भाग लिया और 80 से ज्यादा प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए राज्य सरकार के खिलाफ मुद्दों को सामने रखा गया. इस अभियान ने विपक्ष को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया और भाजपा को आक्रामक बढ़त दी.

प्रत्याशी चयन: स्थानीय चेहरों पर भरोसा

इस बार उम्मीदवारों के चयन में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला. डॉक्टर, वकील, खिलाड़ी, कलाकार और स्थानीय प्रतिष्ठित चेहरों को प्राथमिकता दी गई. बाहरी चेहरों की जगह स्थानीय नेतृत्व को आगे लाया गया. इस रणनीति ने बाहरी बनाम स्थानीय की बहस को काफी हद तक खत्म कर दिया.

युवा और महिला वोटर्स पर फोकस

युवाओं और महिलाओं को जोड़ने के लिए युवाशक्ति भरोसा कार्ड और मातृशक्ति भरोसा कार्ड अभियान चलाए गए. इन अभियानों के जरिए सीधे संवाद स्थापित किया गया और एक भरोसे का माहौल बनाया गया. 

पर्दे के पीछे की जोड़ी: बंसल-यादव का माइक्रो मैनेजमेंट

इस पूरी रणनीति की असली ताकत थी पर्दे के पीछे काम कर रही टीम. सुनील बंसल ने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर फोकस किया, जबकि भूपेंद्र यादव ने चुनावी रणनीति को व्यापक दिशा दी. इन दोनों के बीच तालमेल ने अभियान को एक मशीन की तरह चलाया. जहां हर स्तर पर स्पष्ट योजना और जिम्मेदारी तय थी. सह प्रभारी बिप्लब कुमार देब ने नॉर्थ-ईस्ट के अनुभव को बंगाल में लागू किया, जिससे जमीनी स्तर पर तेजी से विस्तार संभव हुआ.

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