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Chabua–Lahowal Vidhan Sabha Chunav Result: चाबुआ-लाहोवाल सीट पर Binod Hazarika ने लहराया जीत का परचम
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चबुआ-लाहोवल, ऊपरी असम के डिब्रूगढ़ जिले में एक आम अनारक्षित विधानसभा सीट है. यह 2023 के डिलिमिटेशन के बाद चबुआ और लाहोवल विधानसभा सीटों को मिलाकर बनाया गया एक नया चुनाव क्षेत्र है. अलग-अलग, दोनों पारंपरिक रूप से कांग्रेस के गढ़ थे, हालांकि BJP ने 2016 और 2021 में लाहोवल सीट जीतकर कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया था. चबुआ लखीमपुर लोकसभा सीट का हिस्सा था, जबकि लाहोवाल डिब्रूगढ़ संसदीय सीट के अंदर आता था. 2024 से एक हुआ चबुआ-लाहोवाल अब डिब्रूगढ़ लोकसभा सीट के 10 हिस्सों में से एक है.
1978 में बनी चबुआ विधानसभा सीट ने 10 विधानसभा चुनाव देखे. कांग्रेस ने पांच बार, AGP ने दो बार, जनता पार्टी, एक निर्दलीय और BJP ने एक-एक बार जीत हासिल की. लोकसभा चुनाव में चबुआ असेंबली एरिया में BJP लगातार दो बार आगे रही, जबकि 2009 में कांग्रेस आगे थी. यहां अनुसूचित जाति के 6.70 परसेंट और अनुसूचित जनजाति के 4.67 परसेंट वोटर थे, जबकि चबुआ सीट पर मुसलमानों की मौजूदगी बहुत कम थी. यहां 91.96 परसेंट ग्रामीण और 8.04 परसेंट शहरी वोटर थे.
1957 में बनी लाहोवल असेंबली सीट पर 14 विधानसभा चुनाव हुए. कांग्रेस ने यह सीट 11 बार, BJP ने दो बार और एक बार निर्दलीय ने जीती. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 2009 में एक बार और BJP ने 2014 और 2019 में दो बार बढ़त हासिल की. यहां अनुसूचित जाति के 3.49 परसेंट, अनुसूचित जनजाति के 5.98 परसेंट और मुसलमानों के 7.20 परसेंट वोटर थे. यह पूरी तरह से ग्रामीण सीट थी और यहां कोई शहरी वोटर नहीं था.
चबुआ और लाहोवल दोनों जगहों पर अच्छा खासा वोटिंग हुई. 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए फाइनल रोल में चबुआ-लाहोवल में 177,238 योग्य वोटर थे, जो 2024 में 173,877 थे. 2023 में दोनों चुनाव क्षेत्रों के मिलने से पहले, 2021 में चबुआ में 159,383 वोटर थे, और लाहोवल में 152,562 वोटर थे. 2019 में, चबुआ में 149,460 और लाहोवल में 139,208 वोटर थे, 2016 में चबुआ में 134,848 और लाहोवल में 126,297 वोटर थे, और 2011 में चबुआ में 132,976 और लाहोवल में 118,123 वोटर थे. 2024 में, चबुआ-लाहोवाल विधानसभा क्षेत्र में 81.87 प्रतिशत वोटिंग हुई. BJP ने कांग्रेस पार्टी को 33,939 वोटों से आगे रखा.
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान एलाइड फोर्स के लिए एक अहम एयरबेस के तौर पर चाबुआ का एक शानदार इतिहास रहा है और चीन के पास होने की वजह से यह इंडियन एयर फोर्स के लिए एक स्ट्रेटेजिक बेस के तौर पर काम करता है. यह शहर चाय के बागानों से घिरा हुआ है और एक जरूरी मिलिट्री और एविएशन सेंटर बना हुआ है. लाहोवल एक सेमी-अर्बन इलाका है जहां खेती और व्यापार होता है. दोनों शहर सड़क से लगभग 18 km अलग हैं और डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया शहरों के पास हैं.
यह चुनाव क्षेत्र डिब्रूगढ़ जिले के कुछ हिस्सों को कवर करता है, जहां ब्रह्मपुत्र घाटी के खास समतल जलोढ़ मैदान हैं. यह इलाका चाय के बागानों, धान की खेती और छोटे व्यापार के लिए अच्छा है, लेकिन यहां मौसमी बाढ़ का खतरा रहता है. मुख्य नदियों में उत्तर में पास में बहने वाली ब्रह्मपुत्र और छोटी सहायक नदियां शामिल हैं जो स्थानीय पानी की जरूरतों पर असर डालती हैं.
चाबुआ-लाहोवल में रोजी-रोटी मुख्य रूप से चाय की खेती, धान की खेती, छोटे व्यापार और खेती से जुड़े कामों पर निर्भर करती है. चाय के बागानों से काफी रोजगार मिलता है, जबकि चावल की खेती ग्रामीण परिवारों के लिए इनकम का मुख्य जरिया बनी हुई है. चाबुआ में, मिलिट्री और एविएशन से जुड़ी नौकरियां आर्थिक विविधता को बढ़ाती हैं. उपजाऊ मिट्टी और भरपूर बारिश इन कामों को बनाए रखती है. इंफ्रास्ट्रक्चर में नेशनल हाईवे 15 के जरिए रोड कनेक्टिविटी और डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया को जोड़ने वाली स्टेट रोड शामिल हैं. आस-पास के स्टेशनों जैसे डिब्रूगढ़ या मोरन से रेल एक्सेस उपलब्ध है, जो लगभग 20-30 km दूर हैं. चाय सेक्टर, ग्रामीण सड़कों और मिलिट्री सुविधाओं में चल रहे डेवलपमेंट के साथ, कस्बों और गांवों में बेसिक सुविधाएं मिलती हैं.
डिब्रूगढ़ का डिस्ट्रिक्ट हेडक्वार्टर, चाबुआ से लगभग 30-35 km और लाहोवल से 45-50 km दूर है. आस-पास के दूसरे कस्बों में चाबुआ से लगभग 40 km उत्तर में तिनसुकिया, लाहोवल से लगभग 20 km दक्षिण में मोरन और पूर्व की ओर नाहरकटिया शामिल हैं. राज्य की राजधानी, दिसपुर, लगभग 450-480 km दक्षिण-पश्चिम में है. अरुणाचल प्रदेश और भी पूर्व में है.
कभी कांग्रेस का गढ़ रहा चाबुआ-लाहोवल, अपनी बहुत ज्यादा बदली हुई वोटर डेमोग्राफी और सीमाओं की वजह से अब एक अनजान जगह बन गया है. इलेक्शन कमीशन ने 2023 के डिलिमिटेशन में दोनों सीटों के मर्जर को सही ठहराया ताकि असम की 126 असेंबली सीटों में वोटर्स का बेहतर बंटवारा हो सके, लेकिन आरोप थे कि ऐसा कांग्रेस के मजबूत गढ़ों की बेसिक पहचान बदलने के लिए किया गया था. वजह जो भी हो, सच तो यह है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में BJP ने कांग्रेस को बड़े मार्जिन से लीड किया, हालांकि BJP ने 2014 और 2019 के आम चुनावों में भी इन दोनों असेंबली एरिया में लीड किया था. यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि 2026 के असेंबली चुनावों में जब यह नई बनी सीट पहली बार वोट डालेगी तो किसका पलड़ा भारी होगा. बस इतना तय है कि इनमें से कोई भी पार्टी फेवरेट पार्टी का टैग नहीं लगाएगी, और आने वाला चुनाव एक करीबी मामला बन सकता है क्योंकि मुकाबला दिलचस्प होने की उम्मीद है.
(अजय झा)
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आज पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजे आए हैं. मुकाबला 3-2 का रहा है. बंगाल, असम में बीजेपी ने अकेले मैदान मार लिया है. पुडुचेरी में बीजेपी गठबंधन की जीत हुई है. केरल में कांग्रेस गठबंधन जीता है, तमिलनाडु में टीवीके के रूप में नये सितारे का उदय हुआ है. अब कांग्रेस उसके साथ शामिल होने की कोशिश में है. लेकिन हम आज बात बंगाल की करेंगे. बंगाल की जीत के साथ ही आज हिंदुस्तान की 78 फीसदी आबादी और 72 फीसदी जमीन पर बीजेपी का राज चल रहा है. क्योंकि बिहार से बहकर गंगाजी बंगाल में पहुंच गई. और बंगाल में कमल खिल गया. बीजेपी बंगाल जीत गई.
देश के पांच राज्यों के चुनावी तस्वीर साफ हो गई है, लेकिन मुस्लिम आधार वाले दलों के लिए चुनाव नतीजे निराश करने वाले हैं. असम में पिछले दो चुनाव से अहम रोल में रहने वाले बदरुद्दीन अजमल पूरी तरह फ्लाप रहे तो बंगाल में हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी बेअसर साबित हुए.
असम के जोरहाट में बीजेपी नेता हितेंद्र नाथ गोस्वामी ने कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई को 23 हजार वोटों से हराकर बड़ी जीत दर्ज की. साढ़े तीन दशक के अनुभव के दम पर गोस्वामी छठी बार विधायक बने. शांत और जमीनी अभियान उनकी जीत की खास वजह रहा. पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रहे सांसद गौरव गोगोई को हार मिली. कुल मिलाकर अनुभव ने युवा चुनौती पर बाजी मार ली.