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डिलीवरी पार्टनर या राइड ड्राइवर, किसमें ज्यादा फायदा? कहां आसानी से होती है कमाई?

डिलीवरी पार्टनर और राइड ड्राइवर के अपने-अपने जोखिम हैं. लेकिन साथ ही अपने-अपने फायदे भी हैं. कई लोग दोनों काम भी कर रहे हैं, लेकिन आप अपनी सहूलियत, ज़रूरत के हिसाब से चीज़ों को तय कर सकते हैं. यहां समझिए कि दोनों में आपके लिए क्या ज्यादा आसान और फायदेमंद है.

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मेट्रो सिटीज़ में इन दिनों दोनों ही तरह की जॉब का ट्रेंड है.
मेट्रो सिटीज़ में इन दिनों दोनों ही तरह की जॉब का ट्रेंड है.

भारत में गिग इकोनॉमी तेजी से बढ़ रही है. युवाओं के पास अपनी टू-व्हीलर से पैसे कमाने के दो मेन ऑप्शन आए हैं. एक, स्विगी और जेप्टो जैसी कंपनियों में डिलीवरी पार्टनर बनना. दूसरा, उबर और रैपिडो जैसे ऐप्स पर राइड-शेयरिंग ड्राइवर के रूप में काम करना.

पहली नजर में दोनों काम एक जैसे लगते हैं, लेकिन कमाई, रिस्क और सहूलियत के मामले में दोनों में बड़ा अंतर है. व्हीकल, डॉक्यूमेंट्स, पे-आउट, शुरुआती खर्च और काम के माहौल को देखें तो दोनों के नियम और फायदे अलग हैं. अगर आप भी कन्फ्यूज़ हैं, तो हम यहां थोड़ी आसानी से आपको समझाने की कोशिश करते हैं.

व्हीकल और डॉक्यूमेंट्स की बात करें तो डिलीवरी पार्टनर बनने में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी है. अगर आपके पास बाइक या ड्राइविंग लाइसेंस नहीं है, तब भी आप साइकिल, ई-साइकिल या रेंटल ई-बाइक से जेप्टो या स्विगी में डिलीवरी पार्टनर बन सकते हैं. इसके लिए डीएल या आरसी जैसे डॉक्यूमेंट्स अनिवार्य नहीं होते. 

वहीं राइड-शेयरिंग में सवारी को बैठाने के लिए कमर्शियल या वैलिड ड्राइविंग लाइसेंस, व्हीकल आरसी, इंश्योरेंस और बैकग्राउंड वेरिफिकेशन जरूरी है.

क्लिक करें: बिना बाइक-स्कूटी के भी बन सकते हैं डिलीवरी पार्टनर? बस करना होगा ये काम

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कमाई और पे-आउट का भी अलग है तरीका

कमाई और पे-आउट के तरीके में भी बड़ा फर्क है. स्विगी और जेप्टो में पे-आउट दूरी, समय, रोड ट्रैफिक, मौसम और कस्टमर रेटिंग के आधार पर तय होता है. इसके अलावा 15 ऑर्डर पर इंसेंटिव या खराब मौसम में एक्स्ट्रा पे-आउट जैसी स्कीम्स मिलती हैं. 

लेकिन राइड शेयरिंग वाले मामले में ऐसा नहीं होता है. उबर और रैपिडो में प्रति किलोमीटर बेस फेयर और पिक-अप या ड्रॉप दूरी के हिसाब से मार्जिन मिलता है. पीक आवर्स या बारिश में सर्ज प्राइसिंग का सीधा फायदा ड्राइवर्स को मिलता है. और अगर कोई टिप मिलती है, तो वो भी सीधा ड्राइवर की.

कहां लगती है जॉइनिंग फीस?

ऑन-बोर्डिंग फीस और किट के खर्च में भी दोनों अलग हैं. डिलीवरी में जॉइनिंग के समय बैग, टी-शर्ट और जैकेट की ऑन-बोर्डिंग फीस, लगभग ₹1500, देनी होती है. यह रकम काम शुरू करने के बाद वीकली कमाई से किस्तों में कटती है. वहीं राइड-शेयरिंग में कैप्टन बनने के लिए दो हेलमेट, एक अपने लिए और एक सवारी के लिए का इंतजाम खुद करना पड़ता है या ऑन-बोर्डिंग सेंटर से लेना होता है.

काम के माहौल और सुरक्षा के लिहाज से भी अंतर है. डिलीवरी में सिर्फ सामान या पार्सल पहुंचाना होता है, जिससे कस्टमर से सीधे विवाद की गुंजाइश कम होती है. राइड-शेयरिंग में राइडर के व्यवहार, लो-रेटिंग और रात की शिफ्ट में सुरक्षा रिस्क थोड़ा ज्यादा रहता है. हालांकि उबर में इमरजेंसी एसओएस और ट्रिप इंश्योरेंस जैसी सुविधाएं मिलती हैं.

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तो ऑप्शन दोनों खुले हैं, अगर आपके पास ड्राइविंग लाइसेंस या बाइक नहीं है, तो डिलीवरी पार्टनर बनना आसान और सुरक्षित विकल्प है. लेकिन अगर आपके पास अपनी बाइक, ड्राइविंग लाइसेंस और ट्रैफिक में सवारी ले जाने का अनुभव है, तो उबर या रैपिडो में सर्ज प्राइसिंग और इंसेंटिव्स के जरिए दैनिक कमाई का मार्जिन बेहतर मिल सकता है.

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