scorecardresearch
 

मैं गोल्ड मेडल‍िस्ट हूं, पर ड‍िप्रेशन-पैन‍िक अटैक झेल रही... पेपर लीक पर बोली रांची प्रोटेस्ट में बैठी छात्रा

अभ्यर्थी प्रतीक्षा बताती हैं कि इस अनिश्चितता ने उनकी मेंटल हेल्थ को पूरी तरह तबाह कर दिया है. प्रतीक्षा कहती हैं कि मैं इस समय खुद डिप्रेशन से जूझ रही हूं. कई बार पैनिक अटैक आते हैं. पढ़ाई छोड़कर घर लौटने का मन करता है, खुद को परिवार पर बोझ महसूस करने लगी हूं.

Advertisement
X
प्रतीक्षा को अब न्याय की 'प्रतीक्षा'
प्रतीक्षा को अब न्याय की 'प्रतीक्षा'

'बचपन से हर क्लास में अव्वल रही. पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) में यूनिवर्सिटी टॉप करके गोल्ड मेडल हासिल किया, B.Ed पूरा किया... लेकिन आज अपनी ही दुर्दशा देखी नहीं जाती. रिश्तेदारों के ताने, शादी का दबाव और परीक्षा रद्द होने का डर, इस सिस्टम ने मुझे डिप्रेशन और पैनिक अटैक की मरीज बना दिया है.' 

यह दर्द है 26 साल की प्रतीक्षा कुमारी श्रीवास्तव का. जामताड़ा (मिहिजाम) की रहने वाली प्रतीक्षा कोई सामान्य अभ्यर्थी नहीं हैं. वे मेधावी हैं, गोल्ड मेडलिस्ट हैं, लेकिन आज वे रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में JPSC और JSSC धांधली के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं. तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी प्रतीक्षा पिछले कई सालों से रांची में रहकर प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं. परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं है, फिर भी माता-पिता पेट काटकर उनकी पढ़ाई का खर्च उठा रहे हैं.

प्रतीक्षा ने aajtak.in से बातचीत करते हुए अपने हालातों पर भी चर्चा की. उन्होंने बताया कि कैसे हर महीने रूम रेंट, राशन और किताबों का खर्च देना पड़ता है. माता-पिता को सहारा देने की उम्र में मैं आज भी उन पर आश्रित हूं. जब गांव जाती हूं, तो लोग पूछते हैं, 'नौकरी कब लगेगी?' और 'शादी कब करोगी?' ऐसे सवाल मानसिक रूप से तोड़ देते हैं.

Advertisement

'गोल्ड मेडल' से 'पैनिक अटैक' तक का सफर
जब सालों की मेहनत के बाद खबर आती है कि 'पेपर लीक हो गया' या 'परीक्षा रद्द हो गई', तो मेहनत पर पानी फिर जाता है. प्रतीक्षा बताती हैं कि इस अनिश्चितता ने उनकी मेंटल हेल्थ को पूरी तरह तबाह कर दिया है. प्रतीक्षा कहती हैं कि मैं इस समय खुद डिप्रेशन से जूझ रही हूं. कई बार पैनिक अटैक आते हैं. पढ़ाई छोड़कर घर लौटने का मन करता है, खुद को परिवार पर बोझ महसूस करने लगी हूं. मेरे कई दोस्तों ने निराश होकर पढ़ाई छोड़ दी और डिप्रेशन में चले गए. जो लड़की हमेशा टॉप करती आई हो, उसके लिए आज अपनी यह स्थिति स्वीकार करना बेहद दर्दनाक है.

सड़कों पर उतरने की मजबूरी 
जब हमने पूछा कि एक होनहार छात्रा को सड़कों पर आंदोलन करने और लाठीचार्ज के डर के बीच क्यों आना पड़ा? तो उनका जवाब था कि जब लोकतांत्रिक तरीके से मांगें नहीं सुनी जातीं, तो सड़क ही आखिरी रास्ता बचता है. प्रतीक्षा ने बताया कि घर वालों को पता है कि मैं आंदोलन में शामिल हूं. वे मेरी सुरक्षा को लेकर डरते हैं, लेकिन मेरे संघर्ष को समझते हैं. हमारी मांग सिर्फ इतनी है कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता हो, कट-ऑफ क्लियर हो और CID की लीपापोती के बजाय पूरे मामले की CBI जांच कराई जाए.

Advertisement

तमाम दबावों, ताने और मानसिक तनाव के बावजूद 26 साल की यह गोल्ड मेडलिस्ट मैदान छोड़ने को तैयार नहीं है. प्रतीक्षा का कहना है कि अगर समय पर पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और परीक्षा कैलेंडर लागू हो जाए, तो झारखंड के लाखों युवाओं का भविष्य बच सकता है.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement