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DUSU Elections 2026: हॉस्टल या फीस के वादे दरकिनार, डूसू चुनाव में हावी हुआ 'डिजिटल वार'!

कैंपस की असली बहसों को दरकिनार कर उम्मीदवारों के निजी अकादमिक बैकग्राउंड, वायरल मार्कशीट और आरोप-प्रत्यारोप के जरिए वोट साधने की होड़ लगी है.  छात्र संगठन प्रत्याश‍ियों पर न‍िजी हमले कर रहे हैं, जिसे आम छात्र कतई पसंद नहीं कर रहा है. 

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DUSU Election Trends: वादों पर भारी पड़ा सोशल मीडिया! डूसू चुनाव में मुद्दों से भटकी बहस (Photo by Vikram Sharma)
DUSU Election Trends: वादों पर भारी पड़ा सोशल मीडिया! डूसू चुनाव में मुद्दों से भटकी बहस (Photo by Vikram Sharma)

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) यानी डूसू चुनाव की तारीख जैसे-जैसे करीब आ रही है, नॉर्थ से लेकर साउथ कैंपस तक चुनावी सरगर्मियां अपने चरम पर हैं. लेकिन इस बार का चुनाव सिर्फ हॉस्टल की किल्लत, रियायती बस पास या सुरक्षा के वादों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका एक बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया पर 'डिजिटल वार' के रूप में भी लड़ा जा रहा है.  

कैंपस की असली बहसों को दरकिनार कर उम्मीदवारों के निजी अकादमिक बैकग्राउंड, वायरल मार्कशीट और आरोप-प्रत्यारोप के जरिए वोट साधने की होड़ लगी है.  छात्र संगठन प्रत्याश‍ियों पर न‍िजी हमले कर रहे हैं, जिसे आम छात्र कतई पसंद नहीं कर रहा है. 

कैंपस में नारों की जगह 'सोशल मीडिया वायरल कैंपेन'

हर बार की तरह इस बार भी डूसू चुनाव में छात्र संगठनों के बीच कड़ा मुकाबला है. लेकिन पोस्टरों और सभाओं के बीच इस बार प्रतिद्वंद्वी पक्षों द्वारा एक-दूसरे के उम्मीदवारों को घेरने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया जा रहा है. उम्मीदवारों की कथ‍ित फर्जी या असली मार्कशीट, पुराने नतीजों और योग्यता पर सवाल उठाकर एक-दूसरे की छवि को धूमिल करने का खेल जारी है.  

जहां एक तरफ विपक्षी खेमे इन कथित दावों के जरिए छात्रों को 'जागरूक' करने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इसे प्रतिद्वंद्वी की लोकप्रियता से बौखलाहट और सोची-समझी साजिश करार दिया जा रहा है.  

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मुद्दों से भटकता चुनावी नैरेटिव  

दिल्ली विश्वविद्यालय में दूर-दराज से आने वाले छात्रों के लिए कई ऐसे बुनियादी सवाल हैं, जो इस 'डिजिटल वार' के शोर में दबते नजर आ रहे हैं. डीयू के हजारों बाहरी छात्रों के लिए सुरक्षित और किफायती हॉस्टल की व्यवस्था आज भी सबसे बड़ी चुनौती है.  कई कॉलेजों में बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर, लाइब्रेरी टाइमिंग्स और वेंडिंग मशीनों की मांग अधर में लटकी है. लगातार बढ़ती फीस और री-इवैल्यूएशन की पारदर्शी प्रणाली को लेकर छात्र सवाल पूछ रहे हैं.

'हमें ट्रोलिंग नहीं, समाधान चाहिए': छात्रों की राय

कैंपस में पढ़ाई कर रहे आम छात्रों का मानना है कि चुनाव व्यक्तिगत छींटाकशी के बजाय विश्वविद्यालय की बेहतरी के रोडमैप पर लड़ा जाना चाहिए. प्रथम वर्ष के छात्र कहते हैं कि उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि सोशल मीडिया पर कौन सी पोस्ट वायरल हो रही है, उन्हें ऐसा नेतृत्व चाहिए जो फीस वृद्धि और कैंपस सुरक्षा पर वाइस चांसलर के दफ्तर के बाहर उनकी आवाज बुलंद कर सके.

अब देखना यह होगा कि वोटिंग के दिन दिल्ली यूनिवर्सिटी का आम छात्र सोशल मीडिया के इस शोर से प्रभावित होता है या फिर अपने दैनिक कैंपस मुद्दों को ध्यान में रखकर अपने मताधिकार का इस्तेमाल करता है.

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