एक वक्त था जब देश के छोटे शहरों से निकलने वाले युवाओं का सबसे बड़ा सपना होता था, नोएडा, गुरुग्राम या बेंगलुरु के किसी शीशे वाले बड़े ऑफिस में आईटी (IT) या कॉर्पोरेट जॉब पाना. 10 से 12 लाख का सालाना पैकेज, फॉर्मल कपड़े और हाथ में कॉफी का मग... सफलता की यही परिभाषा मानी जाती थी.
लेकिन साल 2026 की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है. आज देश में एक नया और चौंकाने वाला ट्रेंड देखने को मिल रहा है. कई युवा प्रोफेशनल्स कॉर्पोरेट की इस चकाचौंध को लात मारकर वापस अपने राज्यों के स्टेट पीएससी (State PSC), एसएससी (SSC) या बैंक क्लर्क जैसे पदों की तरफ भाग रहे हैं, जहां शुरुआती सैलरी भले ही 40 से 50 हजार रुपये हो. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या युवा अब रिस्क लेने से डर रहे हैं, या कॉर्पोरेट कल्चर का अंदरूनी खोखलापन उन्हें डरा रहा है? आइए संसद के ऑन-रिकॉर्ड डेटा और ग्लोबल रिपोर्ट्स के साथ इस पूरी इनसाइट को समझते हैं.
सरकारी नौकरियों के प्रति ये दीवानगी!
यह महज कोई हवा-हवाई बात नहीं है, बल्कि देश की संसद में पेश किए गए आधिकारिक आंकड़े इस बात पर मुहर लगाते हैं कि युवाओं के सिर पर सरकारी नौकरी का क्रेज किस कदर सवार है.
कार्मिक मंत्रालय ने संसद में दिए गए एक आधिकारिक लिखित जवाब में बताया था कि पिछले कुछ सालों में केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए 22.05 करोड़ से ज्यादा युवाओं ने आवेदन किया. इनमें से केवल 7.22 लाख युवाओं को नौकरी मिल सकी. यानी हर 1 सरकारी नौकरी के लिए औसतन 300 से ज्यादा दावेदार लाइन में खड़े थे. यह डेटा साफ दिखाता है कि मंदी और ले-ऑफ के इस दौर में युवा एक सुरक्षित ठिकाना चाहते हैं.
विकसित देशों से कहीं ज्यादा काम कर रहे हैं भारतीय!
आखिर क्यों 12 लाख रुपये कमाने वाला सॉफ्टवेयर इंजीनियर या डेटा एनालिस्ट अपनी नौकरी छोड़कर 40 हजार की सरकारी नौकरी के लिए दिन-रात एक कर रहा है? इसका जवाब इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) की रिपोर्ट और काम के घंटों के आंकड़ों में छिपा है.
इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन (ILO) के डेटा के मुताबिक, सबसे ज्यादा काम के घंटे के मामले में भारत दुनिया भर में 15वें स्थान पर आता है. औसतन एक भारतीय कर्मचारी हर हफ्ते लगभग 45.8 घंटे काम करता है. हालांकि इससे भारत शीर्ष 10 में शामिल नहीं होता, लेकिन इसके बावजूद भी यह काम के भारी बोझ को दिखाता है.
कहां है हमारा वर्क-लाइफ बैलेंस?
अगर हम भारत की तुलना दुनिया की विकसित अर्थव्यवस्थाओं से करें, तो यह अंतर साफ नजर आता है:
संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): हर हफ्ते औसतन 38 घंटे काम.
यूनाइटेड किंगडम (UK): हर हफ्ते औसतन 35.9 घंटे काम.
जापान: हर हफ्ते औसतन 36.6 घंटे काम.
यह डेटा विकासशील और विकसित अर्थव्यवस्थाओं के बीच का एक बड़ा फर्क दिखाता है. विकसित अर्थव्यवस्थाओं में काम और निजी जिंदगी (Work-Life Balance) के बीच बेहतर संतुलन होता है, जबकि भारत में युवा कॉर्पोरेट कल्चर की चक्की में पीस रहे हैं.
51% भारतीय ओवर-टाइम के शिकार!
भारत में ज्यादा काम एक बड़ी चिंता बन चुका है. रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा यह है कि लगभग 51% भारतीय कर्मचारी हर हफ्ते 49 घंटे से ज्यादा काम करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय मानकों के मुताबिक यह 'काफी ज्यादा काम के घंटों' की श्रेणी में आता है.
यही नहीं भारत के कार्यबल में लैंगिक असमानता भी साफ तौर पर देखी जा सकती है. यहां पुरुष औसतन हर हफ्ते 49.8 घंटे काम करते हैं और महिलाएं लगभग 35.9 घंटे काम करती हैं. इस अंतर के पीछे कार्यबल में भागीदारी की दर और घरेलू व सामाजिक जिम्मेदारियां जैसे कई बड़े कारण शामिल हैं.
क्यों भारी पड़ रही है 40 हजार की सरकारी नौकरी?
जब हमने कॉर्पोरेट छोड़कर सरकारी नौकरी की तैयारी में जुटे कुछ युवाओं से बात की, तो 3 सबसे कड़े कारण सामने आए. लखनऊ के आशुतोष मिश्रा कहते हैं कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के आने और वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते बड़ी-बड़ी टेक कंपनियों ने पलक झपकते ही हजारों युवाओं को नौकरी से निकाल दिया. यह इनसिक्योरिटी हम युवाओं को कचोटती है. सरकारी नौकरी में मिलने वाली 'जॉब... सिक्योरिटी' इस डर को हमेशा के लिए खत्म कर देती है.
सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही साक्षी का कहती हैं कि कॉर्पोरेट कल्चर में काम करना सरकारी नौकरी से बड़ा चैलेंज लगता है. कॉर्पोरेट जॉब कर रहीं मिली चक्रवर्ती का कहना है कि सरकारी नौकरी में सुकून और जॉब सिक्योरिटी होती है, मैंने भी कई साल सरकारी नौकरी की तैयारी की, लेकिन सेलेक्शन नहीं हो सका.