एक गृहिणी के तौर पर एंटरप्रेन्योर बनने से पहले देवनी देवी का ज्यादातर वक्त रसोई में ही बीतता था, जहां वे 20 से ज्यादा सदस्यों के बड़े परिवार के लिए खाना बनाती थीं.
महज 16 साल की उम्र में शादी के बाद वे बिहार के 25 लोगों के एक संयुक्त परिवार का हिस्सा बन गईं. इतने बड़े परिवार का पेट भरने का मतलब था, रोजाना सुबह से रात तक रसोई संभालना, खाने की प्लानिंग करना और सही मात्रा का ध्यान रखना. उनके पास कोई बिजनेस की डिग्री या फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं थी, लेकिन सालों तक खाना बनाते-बनाते उन्होंने वो हुनर सीख लिया जो आगे चलकर उनके बहुत काम आया: लगातार स्वादिष्ट और बड़े स्तर पर खाना तैयार करना.
साल 2002 में उनके जीवन में नया मोड़ आया, जब वे बच्चों की पढ़ाई के सिलसिले में पटना शिफ्ट हुईं.
पटना में ही उनकी नजर एक मेडिकल स्टूडेंट के टिफिन पर पड़ी. खाना बेहद खराब था और उसमें घर के स्वाद का दूर-दूर तक नामो-निशान नहीं था. देवनी देवी को समस्या बिल्कुल साफ समझ आ गई: घर से दूर रहने वाले छात्रों को ऐसे किफायती खाने की जरूरत थी, जिसमें उन्हें घर का अहसास मिल सके.
फिर क्या था, उन्होंने छात्रों के लिए खाना बनाने का फैसला कर लिया. आइए जानते हैं देवनी देवी की सक्सेस स्टोरी.
20 रुपये की थाली से हुई शुरुआत
देवनी देवी ने घर जैसा सादा खाना बनाना शुरू किया और उसे महज 20 रुपये प्रति थाली के हिसाब से बेचना शुरू कर दिया. उनका पहला कस्टमर सौरभ नाम का एक मेडिकल स्टूडेंट था, जिसने उन्हें यह समझने में मदद की कि टिफिन या मेस सर्विस कैसे काम करती है. शुरुआत में वे सारा काम खुद ही संभालती थीं जैसे खाना बनाना, पैक करना और छात्रों तक डिलीवरी करना. कई बार तो उन्हें खाना पहुंचाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी.
माउथ पब्लिसिटी के जरिए उनके खाने की चर्चा बढ़ने लगी. छात्र बार-बार आने लगे और धीरे-धीरे कई लोग उन्हें प्यार से 'अम्मा' बुलाने लगे.
लेकिन इस सफर की राह इतनी आसान नहीं थी. घर से बाहर काम करने के उनके फैसले पर आसपास के लोगों ने सवाल उठाए और आलोचना की. हद तो तब हो गई जब उनके पति ने करीब छह महीने तक उनसे बात तक नहीं की. इसके बावजूद वे रुकी नहीं. इस छोटे से काम ने उन्हें कमाई से बढ़कर एक बड़ी चीज़ दी थी, वित्तीय आत्मनिर्भरता.
80 हजार रुपये की बचत से खरीदे 8 रिक्शा
कमाई बढ़ी तो देवनी देवी ने पैसे यूं ही खर्च नहीं किए. उन्होंने 80,000 रुपये बचाए और उससे 8 रिक्शा खरीद लिए, जिससे उनके पास कमाई का एक और जरिया बन गया. साल 2009 में वे एक कदम और आगे बढ़ीं और अपनी पोती के नाम पर 'समृद्धि गर्ल्स हॉस्टल' की शुरुआत की. उनके टिफिन सर्विस के पुराने छात्र ही इस हॉस्टल के पहले निवासी बने.
इसके बाद महामारी (कोविड-19) का दौर आया. कोविड के दौरान जब छात्र घर लौट गए और हॉस्टल बंद हो गए, तो उनका बिजनेस लगभग ठप सा हो गया. लेकिन देवनी देवी ने खाना बनाना बंद नहीं किया. उन्होंने ऐसे वक्त में डॉक्टरों के हॉस्टल तक खाना पहुंचाया जब स्वास्थ्यकर्मियों को सबसे ज्यादा भरोसेमंद भोजन की जरूरत थी. जब वे खुद कोविड की चपेट में आईं, तो जिन छात्रों को उन्होंने सालों तक खाना खिलाया था, उन्हीं छात्रों ने पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (PMCH) में उनकी देखभाल की.
जब ऑनलाइन हुआ 'अम्मा किचन'
बिजनेस में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब उनके बेटे ने इसे ऑनलाइन ले जाने का सुझाव दिया. साल 2022 में 'अम्मा किचन' डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर शिफ्ट हो गया. इस एक कदम ने नए ग्राहकों के दरवाजे खोल दिए और ऑर्डर तेजी से बढ़ने लगे. धीरे-धीरे बिजनेस का विस्तार हुआ और डाइन-इन आउटलेट्स खुले, जहां थाली की कीमत 100 से 300 रुपये के बीच रखी गई.
जो कभी 20 रुपये का टिफिन था, वह अब एक पूरा फूड ब्रांड बन चुका है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आज पटना में अम्मा किचन के दो डाइन-इन आउटलेट्स हैं और 30 से ज्यादा लोग उनके यहां काम करते हैं. बिजनेस का सालाना टर्नओवर करीब 2.5 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. रोजाना मिलने वाले करीब 350 ऑनलाइन ऑर्डर्स यह बताने के लिए काफी हैं कि एक छोटे से होम किचन ने कितनी लंबी दूरी तय की है.
शुरुआत में उनके इस काम को लेकर संशय में रहने वाले उनके बड़े बेटे जयशंकर ने भी बाद में अपनी नौकरी छोड़ दी और इस बढ़ते बिजनेस को संभालने में जुट गए.
सिर्फ बेहतरीन स्वाद से बनाई पहचान
देवनी देवी के इस सफर की सबसे खास बात यह है कि उनके पास किसी तरह की फॉर्मल बिजनेस एजुकेशन, मार्केटिंग स्ट्रैटेजी या ट्रेडिशनल स्टार्टअप बैकग्राउंड नहीं था. उन्होंने बस उस हुनर से शुरुआत की, जिसका अभ्यास वे सालों से घर पर कर रही थीं, और अपने आसपास की एक असली समस्या को पहचाना. आज 65 साल की उम्र में उन्होंने अपने इसी रोजाना के हुनर के दम पर न सिर्फ करोड़ों का कारोबार खड़ा किया है, बल्कि कई लोगों को रोजगार भी दिया है.