
क्या दफ्तर का मतलब सिर्फ सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक अपनी कुर्सी पर बैठकर घड़ी देखना है? क्या आठ घंटे की मौजूदगी साबित करने से ही यह तय होता है कि आपने काम किया है या नहीं?
बेंगलुरु के एक उभरते हुए स्टार्टअप ने कॉर्पोरेट जगत के इस सालों पुराने दकियानूसी मिथक को पूरी तरह से तोड़ दिया है. IIT कानपुर के दो पूर्व छात्रों द्वारा साल 2019 में शुरू किए गए ऑडियो सोशल प्लेटफॉर्म FRND ने अपने कर्मचारियों को समय की पूरी आजादी दे दी है. यहाँ न तो बायोमेट्रिक पंच-इन का झंझट है और न ही छुट्टियों की गिनती का हिसाब.
आइए जानते हैं कि बिना वॉचमैन और अटेंडेंस शीट के चलने वाला यह अनूठा वर्क मॉडल क्या है और क्या यह भारतीय कॉर्पोरेट कल्चर का भविष्य बन सकता है:
बॉस जब घड़ी देखना बंद कर दे!
IIT कानपुर के एलुमनाई भानु प्रताप सिंह तंवर (CEO, इंटरएक्ट ग्रुप) और हर्षवर्धन छंगाणी (को-फाउंडर व CPO) ने इस कल्चर की नींव रखी. तंवर का मानना है कि काबिल प्रोफेशन्स को कड़े नियमों के पिंजरे में कैद करने की जगह उन्हें खुद फैसले लेने की आजादी देनी चाहिए.
नेटफ्लिक्स की प्रसिद्ध किताब 'No Rules Rules' से प्रेरित होकर तंवर कहते हैं कि हमारा दर्शन हमेशा अपनी टीम को हाई एजेंसी देना रहा है. एक ऐसा माहौल बनाना जहां बेवजह की बंदिशें न हों और लोग अपना सबसे बेहतरीन प्रदर्शन कर सकें, बजाए इसके कि उन्हें तय घंटों में बांध दिया जाए.

अटेंडेंस शीट नहीं, तो काम का हिसाब कैसे?
अब सवाल उठता है कि जब कोई लॉग-इन टाइम या छुट्टियां ट्रैक ही नहीं कर रहा, तो कंपनी को कैसे पता चलता है कि काम हो रहा है? इस कंपनी में जवाब बेहद सीधा है कि सिर्फ और सिर्फ रिजल्ट्स! तंवर बताते हैं कि हम एक संस्था के रूप में केवल जीत को नापते हैं, और जब यूजर एंगेजमेंट पर प्रभाव पड़ता है तो वह नतीजा साफ दिखाई देता है.
हालांकि, वे यह भी स्वीकार करते हैं कि कुछ लोग इस भरोसे का गलत फायदा भी उठा सकते हैं. लेकिन सबके लिए नियम कड़े करने के बजाय कंपनी केवल उन व्यक्तियों के आउटपुट का आकलन करती है जो लगातार सिस्टम का दुरुपयोग करते हैं, और उन्हें धीरे-धीरे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है.
क्या फ्लेक्सिबल वर्किंग से सच में बढ़ती है उत्पादकता?
एक्सपर्ट्स और रिसर्च दोनों ही इस मॉडल के पक्ष में बड़े तर्क देते हैं. उनका कहना है कि ब्रिटिश जर्नल ऑफ इंडस्ट्रियल रिलेशंस में प्रकाशित एक फील्ड एक्सपेरिमेंट के अनुसार, जब कर्मचारियों को अपना काम शुरू और खत्म करने का समय खुद चुनने की आजादी दी गई, तो उनकी उत्पादकता में 50% तक का इजाफा देखा गया.
बेहतर जॉब सैटिस्फैक्शन
साल 2025 में जर्नल ऑफ ऑर्गनाइजेशनल बिहेवियर में 88,000 से अधिक प्रतिभागियों पर हुई 113 स्टडीज के मेटा-एनालिसिस में पाया गया कि वर्किंग टाइम की फ्लेक्सिबिलिटी से कर्मचारियों का जॉब सैटिस्फैक्शन और वर्क-लाइफ बैलेंस बहुत बेहतर होता है.
HR और रिक्रूटमेंट प्लेटफॉर्म InCruiter के को-फाउंडर और CEO अनिल अग्रवाल कहते हैं कि हर इंसान के काम करने का तरीका अलग होता है. सबको एक ही घड़ी से हांकने का मतलब यह नहीं कि सब बराबर काम कर रहे हैं.

लेकिन... आजादी के साथ जवाबदेही भी जरूरी!
अनिल अग्रवाल चेतावनी भी देते हैं कि फ्लेक्सिबिलिटी का मतलब अराजकता नहीं होना चाहिए. अगर लक्ष्य और डेडलाइन्स साफ न हों, तो यह आजादी कई बार लंबे कामकाजी घंटों और सहकर्मियों के काम में देरी की वजह बन सकती है. यह मॉडल उन टेक या क्रिएटिव कंपनियों में तो सुपर-हिट हो सकता है जहां सेल्फ-ड्रिवन टैलेंट हो, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग, रिटेल या फिक्स्ड शिफ्ट वाली नौकरियों में इसे लागू करना मुश्किल है.
क्या यही है 'फ्यूचर ऑफ वर्क'?
भविष्य का दफ्तर सारे नियमों को खत्म करने के बारे में नहीं है, बल्कि यह पहचानने के बारे में है कि कौन से नियम लोगों को बेहतर काम करने में मदद करते हैं और कौन से नियम सिर्फ उनकी 'सशरीर मौजूदगी' को नापते हैं.
बेंगलुरु के इस स्टार्टअप ने साबित कर दिया है कि अगर कर्मचारियों पर भरोसा किया जाए, तो दफ्तर का माहौल न सिर्फ तनावमुक्त होता है बल्कि नतीजे भी शानदार आते हैं!