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गरीब मोची के बेटे से पद्मश्री तक... जानिए कैसे अशोक खाड़े ने खड़ी की ₹350 करोड़ की कंपनी

महाराष्ट्र के सांगली जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर देश के शीर्ष नागरिक सम्मानों में से एक 'पद्मश्री' तक का सफर तय करना कोई आसान बात नहीं है. अशोक खाड़े की कहानी केवल व्यावसायिक सफलता की गाथा नहीं है, बल्कि यह बेहद कठिन परिस्थितियों, सामाजिक विषमताओं और भुखमरी से लड़कर अपनी तकदीर खुद लिखने वाले एक जुनूनी इंसान की मिसाल है.

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पढ़िए सांगली के एक छोटे से गांव से निकले अशोक खाड़े की पूरी कहानी. (AI-generated image)
पढ़िए सांगली के एक छोटे से गांव से निकले अशोक खाड़े की पूरी कहानी. (AI-generated image)

एक जून 1955 को सांगली के पेड गांव में जन्मे अशोक खाड़े का बचपन भीषण गरीबी और सामाजिक भेदभाव के साये में बीता. परिवार में छह बच्चे थे, पिता मोची का काम करते थे और मां खेतों में मजदूरी करती थीं. ऐसे हालातों से लड़ते और जीतते हुए एक लड़के ने कैसे अपनी अलग सक्सेस स्टोरी ल‍िखी, आइए जानते हैं... 

अशोक खाड़े अपने बचपन का एक दर्दनाक किस्सा याद करते हुए बताते हैं कि एक बार आटा चक्की से घर लौटते समय बारिश के पानी में उनसे पूरे परिवार का आटा गिर गया था. वे खाली हाथ और रोते हुए घर पहुंचे, क्योंकि उस दिन घर में खाने को कुछ और नहीं बचा था. लेकिन इस गरीबी ने उनके हौसलों को तोड़ने के बजाय और मजबूत किया.

90 रुपये की सैलरी से जर्मन तकनीक सीखने तक का सफर

1975 में अशोक खाड़े मुंबई पहुंचे और मजगांव डॉक में बतौर वेल्डिंग अप्रेंटिस काम शुरू किया. तब उनकी मासिक तनख्वाह महज 90 रुपये थी. उन्होंने काम के साथ-साथ मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा पूरा किया और ड्रॉफ्ट्समैन बन गए.

खाड़े के करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट तब आया जब भारत के पनडुब्बी कार्यक्रम के तहत उन्हें वेस्ट जर्मनी भेजा गया. वहां उन्होंने आधुनिक मरीन इंजीनियरिंग और क्वालिटी कंट्रोल की बारीकियां सीखीं. यही अनुभव आगे चलकर उनके खुद के बिजनेस का आधार बना.

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दास ऑफशोर (DAS Offshore) की नींव और पहला बड़ा ब्रेक

मजगांव डॉक में करीब 15 साल सेवा देने के बाद, खाड़े ने नौकरी छोड़ दी और 1992 में अपने भाइयों दत्ता और सुरेश के साथ मिलकर 'दास ऑफशोर' की शुरुआत की.

शुरुआत में कंपनी के पास कोई बड़ा निवेशक नहीं था. पहला बड़ा प्रोजेक्ट 1.82 करोड़ रुपये का था, जो एक ठेकेदार के काम छोड़कर भाग जाने के बाद मजगांव डॉक से ही मिला. अपने पुराने पेशेवर संबंधों और साख के दम पर खाड़े ने कच्चा माल क्रेडिट (उधार) पर जुटाया और काम पूरा करके दिखाया.

आज यह कंपनी ओएनजीसी (ONGC) जैसे दिग्गज संस्थानों के लिए काम करती है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, कंपनी अब तक ओएनजीसी के लिए 270 से अधिक ऑफशोर प्रोजेक्ट्स और 70 से अधिक प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स सफलतापूर्वक पूरे कर चुकी है.

₹350 करोड़ से ज्यादा का कारोबार

एक छोटे से फैब्रिकेशन ठेकेदार से शुरू हुई कंपनी आज देश की प्रमुख इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन कंपनियों में से एक बन चुकी है. CRISIL की रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025 में कंपनी की परिचालन आय ₹357.18 करोड़ दर्ज की गई, जबकि इससे पिछले साल यह ₹185.52 करोड़ थी. FY25 में कंपनी का टैक्स बाद लाभ (PAT) ₹9.04 करोड़ रहा.

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जनवरी 2026 तक कंपनी के पास ₹506 करोड़ के अनएक्जीक्यूटेड ऑर्डर मौजूद थे.

मिला पद्मश्री सम्मान

साल 2026 में भारत सरकार ने डॉ. अशोक खाड़े को व्यापार और उद्योग के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया. यह सम्मान भारत की ऑफशोर इंजीनियरिंग क्षमताओं को मजबूत करने और विदेशी ठेकेदारों पर निर्भरता कम करने में उनके ऐतिहासिक योगदान के लिए दिया गया है.

अशोक खाड़े की यह कहानी साबित करती है कि इंसान की पहचान उसकी विरासत से नहीं, बल्कि उसके हुनर, संघर्ष और बड़े सपने देखने की हिम्मत से तय होती है.

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