मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर है. यदि ईरान और अमेरिका के बीच फुल स्केल वॉर छिड़ता है, तो यह दुनिया का सबसे खतरनाक सैन्य टकराव हो सकता है. हालांकि, लंबे समय से जारी संघर्षों, आर्थिक प्रतिबंधों और हालिया सैन्य कार्रवाइयों के कारण ईरान की सैन्य क्षमता पर काफी असर पड़ा है.
रणनीतिक विश्लेषकों और कुछ खुफिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान का पारंपरिक हथियारों का जखीरा काफी हद तक कम हो चुका है. उसके पास अब मूल क्षमता का करीब 22 फीसदी हिस्सा ही बचा है. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अपने सीमित हथियारों के साथ ईरान दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका का सामना कैसे करेगा? दोनों युद्ध रणनीतियां क्या होंगी. इस जंग में कौन-कौन से आधुनिक हथियार देखने को मिल सकते हैं.
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ईरान की रणनीति: 'एसिमेट्रिक वॉरफेयर' और 'प्रॉक्सी नेटवर्क' का सहारा
जब किसी देश के पास पारंपरिक हथियार (Fighter Jets, Tanks) कम होते हैं, तो वह 'एसिमेट्रिक वॉरफेयर' (Asymmetric Warfare या विषम युद्ध) की रणनीति अपनाता है. ईरान अच्छी तरह जानता है कि वह आमने-सामने की जंग में अमेरिकी वायुसेना और नौसेना का मुकाबला नहीं कर सकता.
इसलिए, ईरान की मुख्य रणनीति अमेरिका को 'हजारों घाव देकर कमजोर करने' की होगी. ईरान अपने बचे हुए 22 फीसदी हथियारों को बेहद सोच-समझकर और रणनीतिक ठिकानों पर इस्तेमाल करेगा. ईरान अपने 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' यानी प्रॉक्सी संगठनों (जैसे हिजबुल्लाह, हूती और इराकी मिलिशिया) को सक्रिय कर देगा, जिससे अमेरिका और उसके सहयोगियों (जैसे इजरायल) पर चौतरफा हमले किए जा सकें. ईरान का मकसद अमेरिका को एक लंबी और थका देने वाली गुरिल्ला जंग में उलझाना होगा.
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ईरान के वो हथियार जो अमेरिकी सेना के लिए बनेंगे चुनौती
भले ही ईरान के पास हथियारों की संख्या कम हो गई हो, लेकिन उसके पास मौजूद बचे हुए हथियार बेहद घातक हैं. इस युद्ध में ईरान इन हथियारों का इस्तेमाल मुख्य रूप से करेगा...
बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें (खैबर और हज कासिम): ईरान के पास सबसे बड़ा मिसाइल नेटवर्क है. यदि उसके पास 22% स्टॉक बचा है, तो भी वह सैकड़ों की संख्या में 'खैबर' और 'हज कासिम' बैलिस्टिक मिसाइलें दाग सकता है, जो इजरायल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाने में सक्षम हैं.
आत्मघाती ड्रोन (शाहेद-136): ईरान के 'शाहेद-136' और अन्य सुसाइड ड्रोन बेहद सस्ते और प्रभावी हैं. ईरान इनका इस्तेमाल 'स्वार्म अटैक' के लिए करेगा ताकि अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दिया जा सके.
मुद्री बारूदी सुरंगें और फास्ट अटैक क्राफ्ट्स: फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में ईरान अपनी छोटी लेकिन बेहद तेज 'फास्ट अटैक बोट्स' और पनडुब्बियों के जरिए अमेरिकी युद्धपोतों पर आत्मघाती हमले कर सकता है. समुद्री सुरंगें बिछाकर वह वैश्विक तेल आपूर्ति को रोक सकता है.
अमेरिका की रणनीति: 'शॉक एंड ऑव' और पूर्ण हवाई वर्चस्व
अमेरिका की युद्ध नीति हमेशा से 'शॉक एंड ऑव' (Shock and Awe) की रही है, यानी युद्ध की शुरुआत में ही दुश्मन पर इतनी भीषण बमबारी करना कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूट जाए. अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ईरान के बचे-खुचे 22 फीसदी हथियारों के कमांड सेंटर्स, मिसाइल लॉन्च पैड्स, रडार सिस्टम और परमाणु ठिकानों को पूरी तरह नष्ट करना होगा.
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अमेरिका जमीनी सेना को ईरान के अंदर भेजने से बचेगा, क्योंकि वह वियतनाम या अफगानिस्तान जैसी स्थिति दोबारा नहीं चाहता. अमेरिकी रणनीति पूरी तरह से लंबी दूरी के सटीक हमलों, साइबर हमलों और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर पर टिकी होगी, जिससे ईरान का कम्युनिकेशन सिस्टम ठप किया जा सके.
अमेरिकी सेना के आधुनिक हथियार जो मचाएंगे तबाही
अमेरिका इस युद्ध में अपनी पूरी तकनीकी ताकत झोंक देगा. अमेरिकी सेना की ओर से ये गेम-चेंजिंग हथियार हो सकते हैं...
स्टील्थ फाइटर जेट्स और बॉम्बर्स: अमेरिकी वायुसेना अपने F-35 लाइटनिंग II और B-2 स्पिरिट का उपयोग करेगी. ये विमान ईरान के रडार की पकड़ में आए बिना उसके बंकरों और मिसाइल डिपो पर लेजर-गाइडेड बम गिरा सकते हैं.
टोमाहॉक क्रूज मिसाइलें: अमेरिकी नौसेना खाड़ी में तैनात अपनी पनडुब्बियों और विध्वंसक जहाजों से सैकड़ों टॉमहॉक मिसाइलें दागेगी, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे दुश्मन के ठिकानों को अचूक सटीकता से नष्ट कर सकती हैं.
साइबर और इलेक्ट्रॉनिक वेपन्स: अमेरिका ईरान के पावर ग्रिड, मिलिट्री कम्युनिकेशन और मिसाइल कंट्रोल सिस्टम को हैक करने के लिए 'स्टक्सनेट' जैसे खतरनाक साइबर हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है, जिससे बिना गोली चलाए भी ईरान के हथियार बेकार हो सकते हैं.
क्या होगा इस जंग का अंजाम?
यदि यह युद्ध होता है, तो संख्या बल और तकनीक के मामले में अमेरिका बेहद मजबूत स्थिति में होगा. ईरान के पास हथियारों की कमी उसे लंबे समय तक सीधे युद्ध में टिकने नहीं देगी. ईरान की असिमेट्रिक रणनीति, सुसाइड ड्रोन और होर्मुज को बंद करने की क्षमता पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख सकती है. यह जंग केवल दो देशों के बीच नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर तेल संकट और तीसरे विश्व युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर सकती है.