ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध अब 14 दिन से ज्यादा चल चुका है. इस बीच एशिया में दो और बड़े खिलाड़ी सक्रिय हो गए हैं – चीन ताइवान पर दबाव बढ़ा रहा है. उत्तर कोरिया (किम जोंग उन) जापान व दक्षिण कोरिया पर मिसाइलों से दबाव डाल रहा है. क्या यह अमेरिका और इजरायल पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने की रणनीति है, ताकि ईरान युद्ध जल्द खत्म हो जाए?
या चीन और उत्तर कोरिया सच में जापान और ताइवान पर हमला करने की तैयारी कर रहे हैं? अमेरिका ने अपनी 7वीं फ्लीट के कई जहाज मिडिल ईस्ट भेज दिए हैं. जापान-दक्षिण कोरिया भी ईरान युद्ध में अमेरिका का पूरा समर्थन नहीं कर रहे हैं. यह स्थिति वैश्विक सुरक्षा को नया मोड़ दे रही है.
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चीन का ताइवान पर बढ़ता दबाव
चीन ने 2026 में अपनी रक्षा बजट बढ़ा दी है. ताइवान के खिलाफ अपनी सैन्य गतिविधियां तेज कर दी हैं. हाल ही में चीन की सेना ने ताइवान के आसपास बड़े अभ्यास किए, जिसमें युद्धपोत, तटरक्षक जहाज और 130 से ज्यादा फाइटर जेट शामिल थे. हालांकि ट्रंप-शी जिनपिंग की बैठक के बाद चीनी हवाई गतिविधियां थोड़ी कम हुई हैं, लेकिन चीन लगातार ताइवान को अलगाववादी बताकर दबाव बनाए हुए है.
विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन जानता है कि अमेरिका का ध्यान ईरान युद्ध में फंसा है, इसलिए वह ताइवान पर ग्रे जोन रणनीति (छोटे-छोटे दबाव) का इस्तेमाल कर रहा है. यह दबाव अमेरिका को मजबूर करने की कोशिश लगता है कि वह मिडिल ईस्ट से ध्यान हटाए.

उत्तर कोरिया का जापान-दक्षिण कोरिया पर मिसाइल दबाव
उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन ने मार्च 2026 में कई बैलिस्टिक मिसाइल टेस्ट किए हैं. 14 मार्च को करीब 10 मिसाइलें जापान सागर की ओर दागी गईं. ये टेस्ट अमेरिका-दक्षिण कोरिया के संयुक्त सैन्य अभ्यास के जवाब में किए गए. किम ने कहा कि ये परमाणु क्षमता वाली मिसाइलें हैं.
जापान ने सख्त विरोध जताया और दक्षिण कोरिया ने भी चिंता जताई. उत्तर कोरिया ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका की कमजोरी का फायदा उठा रहा है. इससे जापान और दक्षिण कोरिया दोनों पर दबाव बढ़ गया है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह भी ईरान युद्ध को लंबा खींचने की अप्रत्यक्ष रणनीति का हिस्सा हो सकता है.
अमेरिका की 7वीं फ्लीट की वापसी और सहयोगियों का रुख
ईरान युद्ध में अमेरिका ने अपनी 7वीं फ्लीट (जो पैसिफिक क्षेत्र की रक्षा करती है) के कई महत्वपूर्ण जहाज मिडिल ईस्ट भेज दिए हैं. USS ट्रिपोली जैसे एम्फीबियस असॉल्ट शिप को ताइवान के पास से हटाकर ईरान की ओर भेजा गया. इससे पैसिफिक में अमेरिका की डिटरेंस कमजोर हुई है.
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जापान और दक्षिण कोरिया भी ईरान युद्ध में अमेरिका को पूरा समर्थन नहीं दे रहे हैं. दोनों देशों ने कहा है कि वे सीमित सहयोग कर सकते हैं (जैसे पैट्रियट मिसाइल भेजना), लेकिन अपना पूरा ध्यान चीन और उत्तर कोरिया पर रखे हुए हैं. दोनों देशों में चिंता है कि अगर अमेरिका का ध्यान ईरान में फंसा रहा तो चीन ताइवान पर हमला कर सकता है.
क्या यह प्रॉक्सी प्रेशर गेम है?
कई एक्सपर्ट मानते हैं कि चीन और उत्तर कोरिया ईरान युद्ध का फायदा उठाकर अमेरिका पर अप्रत्यक्ष दबाव बना रहे हैं. ईरान युद्ध में अमेरिका की सैन्य शक्ति और संसाधन मिडिल ईस्ट में फंस गए हैं. अगर चीन ताइवान पर या उत्तर कोरिया जापान-दक्षिण कोरिया पर हमला करे तो अमेरिका को दो मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा.
यह रणनीति ईरान को राहत दिलाने और युद्ध जल्द खत्म करवाने की हो सकती है. चीन और उत्तर कोरिया पहले से ही ईरान के करीबी हैं. इसलिए यह प्रॉक्सी प्रेशर (अप्रत्यक्ष दबाव) की रणनीति लगती है, ताकि अमेरिका ईरान के साथ समझौता करने पर मजबूर हो जाए.
या वास्तविक हमले की तैयारी?
दूसरी तरफ कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि यह सिर्फ दबाव नहीं, बल्कि असली खतरा है. चीन ताइवान पर लंबे समय से हमले की तैयारी कर रहा है. उत्तर कोरिया भी अपनी मिसाइल क्षमता बढ़ा रहा है. अगर अमेरिका ईरान युद्ध में ज्यादा फंस गया तो चीन और उत्तर कोरिया वाकई हमला कर सकते हैं.
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जापान और दक्षिण कोरिया पहले से ही चिंतित हैं. दोनों देश अब अपनी रक्षा पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं. अगर चीन-उत्तर कोरिया मिलकर काम करें तो पैसिफिक क्षेत्र में बड़ा युद्ध शुरू हो सकता है. अमेरिका की 7वीं फ्लीट की वापसी इसी खतरे को और बढ़ा रही है.
दुनिया दो मोर्चों पर चिंतित
ईरान युद्ध अब सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहा. एशिया में चीन और उत्तर कोरिया की गतिविधियां अमेरिका की कमजोरी का फायदा उठा रही हैं. चाहे यह प्रॉक्सी प्रेशर गेम हो या असली हमले की तैयारी, दोनों ही स्थितियां खतरनाक हैं. जापान और दक्षिण कोरिया अमेरिका से ज्यादा समर्थन की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका के संसाधन ईरान में फंसे हैं. दुनिया अब देख रही है कि अमेरिका दो मोर्चों (ईरान और एशिया) पर कैसे संभाल पाएगा. अगर स्थिति और बिगड़ी तो वैश्विक युद्ध का खतरा बढ़ सकता है.