scorecardresearch
 

प्रदर्शन पर भारी पैलेट गन, एक कारतूस में 600 छर्रे, एक हजार फीट प्रति सेकंड की स्पीड...

पैलेट गन से एक कारतूस में 600 छर्रे 1000 फीट प्रति सेकंड की स्पीड से निकलते हैं. दिल्ली प्रदर्शन में कई युवा गंभीर रूप से घायल हुए हैं. इस गन का इस्तेमाल कश्मीर से लेकर कई जगहों पर हुआ है.

Advertisement
X
ये तस्वीर 2018 की है जब श्रीनगर में प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिसकर्मी पैलेट गन का इस्तेमाल कर रहा था. (File Photo: Getty)
ये तस्वीर 2018 की है जब श्रीनगर में प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिसकर्मी पैलेट गन का इस्तेमाल कर रहा था. (File Photo: Getty)

शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शन में पैलेट गन का इस्तेमाल एक बार फिर विवादों में आ गया है. एक कारतूस में 600 तक धातु या रबर के छर्रे भरे जाते हैं जो 1000 फीट प्रति सेकंड की तेज स्पीड से फैलकर निशाने को प्रभावित करते हैं. पुलिस इसे भीड़ नियंत्रण का हथियार मानती है लेकिन कई मामलों में यह गंभीर चोटें और स्थाई रूप से विकलांग बनने का कारण बन रहा है. 

साहिल, शेख मंसूरी और साक्षी जैसे युवा प्रदर्शनकारियों की दर्दनाक कहानियां इस हथियार की खतरनाक प्रकृति को उजागर करती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि पैलेट गन को नॉन-लीथल माना जाता है लेकिन इसका गलत इस्तेमाल जानलेवा साबित हो सकता है.

यह भी पढ़ें: ट्रंप बड़े हमले की तैयारी में, मिडिल ईस्ट पहुंच रहे बॉम्बर्स, वॉरशिप्स और स्पेशल फोर्सेस

पैलेट गन की तकनीकी विशेषताएं 

पैलेट गन एक प्रकार की राइफल होती है जो मेटल या रबर पैलेट्स से भरे कारतूस चलाती है. एक कारतूस में 500 से 600 तक छर्रे भरे जा सकते हैं. ये छर्रे 1000 फीट प्रति सेकंड (लगभग 305 मीटर प्रति सेकंड) की स्पीड से निकलते हैं. बड़े एरिया में फैल जाते हैं. 

स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के अनुसार इसे कम से कम 500 फीट की दूरी से और हमेशा कमर के नीचे निशाना लगाकर फायर करना चाहिए. लेकिन प्रदर्शनों में अक्सर SOP का पालन नहीं हो पाता. नतीजा होता है कि चेहरा, आंखें और ऊपरी शरीर पर गंभीर चोटें लगती हैं. धातु के छर्रे तो गहरी चोट पहुंचाते हैं जबकि रबर वाले भी दर्द और सूजन का कारण बनते हैं.

Advertisement

Pellet gun use in cjp protest

भारत में पैलेट गन का इस्तेमाल: जम्मू-कश्मीर से दिल्ली तक

भारत में पैलेट गन का सबसे ज्यादा इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी रोकने के लिए किया जाता रहा है. 2016-17 के आंदोलनों में हजारों लोग पैलेट चोटों से प्रभावित हुए. कई युवाओं की आंखें खराब हुई. चेहरे पर स्थाई निशान रह गए.  

अब दिल्ली जैसे शहरों में भी छात्र आंदोलनों और सामान्य प्रदर्शनों में इसका उपयोग हो रहा है. परीक्षा अनियमितताओं के खिलाफ चल रहे आंदोलन में साहिल, शेख मंसूरी (25 वर्षीय, गुरुग्राम) और 21 वर्षीय साक्षी जैसे कई युवा गंभीर रूप से घायल हुए हैं. शेख मंसूरी के चेहरे पर सात पैलेट लगे, जिनमें नाक, माथा, दोनों आंखें और गाल शामिल हैं. उन्हें लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में सर्जरी करानी पड़ी और आगे भी इलाज की जरूरत है.

यह भी पढ़ें: ईरान ने किया CIA फैसिलिटी पर ड्रोन अटैक, क्या रूस से है कनेक्शन?

प्रदर्शनकारियों की दर्दनाक कहानियां

साहिल अकेले नहीं हैं. शेख मंसूरी की स्थिति चिंताजनक है. उनकी आंखों और चेहरे पर लगी चोटों से स्थाई नुकसान की आशंका है. वहीं जंतर मंतर के पास स्टांपेड जैसी स्थिति में घायल हुई 21 वर्षीय साक्षी को राम मनोहर लोहिया अस्पताल में वेंटिलेटर से हटाया गया है. 

ये मामले दिखाते हैं कि पैलेट गन से होने वाली चोटें सिर्फ तात्कालिक दर्द नहीं बल्कि लंबे समय तक चलने वाली विकलांगता भी पैदा करती हैं. आंखों में लगे छर्रे अंधेपन का कारण बन सकते हैं जबकि चेहरे पर लगने से सौंदर्य नुकसान और मानसिक आघात होता है.

Advertisement

Pellet gun use in cjp protest

पुलिस पैलेट गन को भीड़ नियंत्रण का सुरक्षित विकल्प मानती है क्योंकि यह गोली की तरह घातक नहीं होती. लेकिन मानवाधिकार संगठन और चिकित्सक इसे खतरनाक बताते हैं. जब भीड़ करीब होती है या गलत निशाना लगाया जाता है तो यह हथियार गंभीर चोट पहुंचा सकता है. 

SOP के अनुसार 500 फीट की दूरी और कमर के नीचे निशाना जरूरी है. लेकिन व्यावहारिक रूप से प्रदर्शनों में दूरी कम हो जाती है. अक्सर ऊपरी शरीर पर भी लग जाता है. इससे कानूनी और नैतिक सवाल उठते हैं.

यह भी पढ़ें: गड़बड़ गोला-बारूद से 62 करोड़ का नुकसान, धनुष प्रोजेक्ट पर भी PAC ने उठाए सवाल

चिकित्सकीय चुनौतियां और इलाज की जटिलता

पैलेट चोटों का इलाज जटिल होता है. छर्रे शरीर में गहरे धंस जाते हैं. सर्जरी के दौरान उन्हें निकालना मुश्किल होता है. आंखों में लगने पर कॉर्निया डैमेज, रेटिना डिटैचमेंट जैसी समस्याएं हो सकती हैं. डॉक्टरों का कहना है कि कई मामलों में एक से ज्यादा सर्जरी की जरूरत पड़ती है. पूरी तरह से सेहतमंद होना मुश्किल होता है.

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि पुलिस को और बेहतर नॉन-लीथल विकल्पों जैसे वॉटर कैनन, आंसू गैस या इलेक्ट्रिक शॉक डिवाइसेज पर ध्यान देना चाहिए. पैलेट गन का इस्तेमाल केवल अत्यधिक जरूरी स्थिति में और सख्त SOP के साथ होना चाहिए. जम्मू-कश्मीर के अनुभव से सबक लेते हुए पूरे देश में गाइडलाइंस बनानी चाहिए.

---- समाप्त ----
Live TV

Advertisement
Latest News in Hindi »
Advertisement