शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे प्रदर्शन में पैलेट गन का इस्तेमाल एक बार फिर विवादों में आ गया है. एक कारतूस में 600 तक धातु या रबर के छर्रे भरे जाते हैं जो 1000 फीट प्रति सेकंड की तेज स्पीड से फैलकर निशाने को प्रभावित करते हैं. पुलिस इसे भीड़ नियंत्रण का हथियार मानती है लेकिन कई मामलों में यह गंभीर चोटें और स्थाई रूप से विकलांग बनने का कारण बन रहा है.
साहिल, शेख मंसूरी और साक्षी जैसे युवा प्रदर्शनकारियों की दर्दनाक कहानियां इस हथियार की खतरनाक प्रकृति को उजागर करती हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि पैलेट गन को नॉन-लीथल माना जाता है लेकिन इसका गलत इस्तेमाल जानलेवा साबित हो सकता है.
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पैलेट गन की तकनीकी विशेषताएं
पैलेट गन एक प्रकार की राइफल होती है जो मेटल या रबर पैलेट्स से भरे कारतूस चलाती है. एक कारतूस में 500 से 600 तक छर्रे भरे जा सकते हैं. ये छर्रे 1000 फीट प्रति सेकंड (लगभग 305 मीटर प्रति सेकंड) की स्पीड से निकलते हैं. बड़े एरिया में फैल जाते हैं.
स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के अनुसार इसे कम से कम 500 फीट की दूरी से और हमेशा कमर के नीचे निशाना लगाकर फायर करना चाहिए. लेकिन प्रदर्शनों में अक्सर SOP का पालन नहीं हो पाता. नतीजा होता है कि चेहरा, आंखें और ऊपरी शरीर पर गंभीर चोटें लगती हैं. धातु के छर्रे तो गहरी चोट पहुंचाते हैं जबकि रबर वाले भी दर्द और सूजन का कारण बनते हैं.

भारत में पैलेट गन का इस्तेमाल: जम्मू-कश्मीर से दिल्ली तक
भारत में पैलेट गन का सबसे ज्यादा इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी रोकने के लिए किया जाता रहा है. 2016-17 के आंदोलनों में हजारों लोग पैलेट चोटों से प्रभावित हुए. कई युवाओं की आंखें खराब हुई. चेहरे पर स्थाई निशान रह गए.
अब दिल्ली जैसे शहरों में भी छात्र आंदोलनों और सामान्य प्रदर्शनों में इसका उपयोग हो रहा है. परीक्षा अनियमितताओं के खिलाफ चल रहे आंदोलन में साहिल, शेख मंसूरी (25 वर्षीय, गुरुग्राम) और 21 वर्षीय साक्षी जैसे कई युवा गंभीर रूप से घायल हुए हैं. शेख मंसूरी के चेहरे पर सात पैलेट लगे, जिनमें नाक, माथा, दोनों आंखें और गाल शामिल हैं. उन्हें लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में सर्जरी करानी पड़ी और आगे भी इलाज की जरूरत है.
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प्रदर्शनकारियों की दर्दनाक कहानियां
साहिल अकेले नहीं हैं. शेख मंसूरी की स्थिति चिंताजनक है. उनकी आंखों और चेहरे पर लगी चोटों से स्थाई नुकसान की आशंका है. वहीं जंतर मंतर के पास स्टांपेड जैसी स्थिति में घायल हुई 21 वर्षीय साक्षी को राम मनोहर लोहिया अस्पताल में वेंटिलेटर से हटाया गया है.
ये मामले दिखाते हैं कि पैलेट गन से होने वाली चोटें सिर्फ तात्कालिक दर्द नहीं बल्कि लंबे समय तक चलने वाली विकलांगता भी पैदा करती हैं. आंखों में लगे छर्रे अंधेपन का कारण बन सकते हैं जबकि चेहरे पर लगने से सौंदर्य नुकसान और मानसिक आघात होता है.

पुलिस पैलेट गन को भीड़ नियंत्रण का सुरक्षित विकल्प मानती है क्योंकि यह गोली की तरह घातक नहीं होती. लेकिन मानवाधिकार संगठन और चिकित्सक इसे खतरनाक बताते हैं. जब भीड़ करीब होती है या गलत निशाना लगाया जाता है तो यह हथियार गंभीर चोट पहुंचा सकता है.
SOP के अनुसार 500 फीट की दूरी और कमर के नीचे निशाना जरूरी है. लेकिन व्यावहारिक रूप से प्रदर्शनों में दूरी कम हो जाती है. अक्सर ऊपरी शरीर पर भी लग जाता है. इससे कानूनी और नैतिक सवाल उठते हैं.
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चिकित्सकीय चुनौतियां और इलाज की जटिलता
पैलेट चोटों का इलाज जटिल होता है. छर्रे शरीर में गहरे धंस जाते हैं. सर्जरी के दौरान उन्हें निकालना मुश्किल होता है. आंखों में लगने पर कॉर्निया डैमेज, रेटिना डिटैचमेंट जैसी समस्याएं हो सकती हैं. डॉक्टरों का कहना है कि कई मामलों में एक से ज्यादा सर्जरी की जरूरत पड़ती है. पूरी तरह से सेहतमंद होना मुश्किल होता है.
विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि पुलिस को और बेहतर नॉन-लीथल विकल्पों जैसे वॉटर कैनन, आंसू गैस या इलेक्ट्रिक शॉक डिवाइसेज पर ध्यान देना चाहिए. पैलेट गन का इस्तेमाल केवल अत्यधिक जरूरी स्थिति में और सख्त SOP के साथ होना चाहिए. जम्मू-कश्मीर के अनुभव से सबक लेते हुए पूरे देश में गाइडलाइंस बनानी चाहिए.