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PoK में सुलगती बगावत रोकने के लिए 8 हजार अतिरिक्त रेंजर्स की तैनाती

पाकिस्तान ने PoK में भड़के भीषण जनआक्रोश को कुचलने के लिए भारी हथियारों के साथ 8000 अतिरिक्त रेंजर्स तैनात किए हैं. महंगाई और उत्पीड़न के खिलाफ जारी इस विद्रोह से पूरा पाकिस्तान आंतरिक अशांति के संकट में घिर गया है.

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पाकिस्तानी रेंजर्स PoK के मुजफ्फराबाद में तैनात. (Photo: Reuters)
पाकिस्तानी रेंजर्स PoK के मुजफ्फराबाद में तैनात. (Photo: Reuters)

पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoK) में आंतरिक हालात पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो चुके हैं. बढ़ती महंगाई, बुनियादी सुविधाओं के अभाव और मानवाधिकारों के हनन के खिलाफ पिछले कई महीनों से चल रहा जनआक्रोश अब एक पूर्ण नागरिक विद्रोह में बदल चुका है. 

खुफिया सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के अनुसार, इस सुलगती बगावत को कुचलने और अपना नियंत्रण बनाए रखने के लिए पाकिस्तान सरकार और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने अत्यंत आक्रामक कदम उठाया है. पाकिस्तान ने पंजाब प्रांत से अतिरिक्त 8000 अर्धसैनिक बल (पाकिस्तान रेंजर्स) को PoK के अशांत इलाकों में तैनात कर दिया है. यह कदम दिखाता है कि इस्लामाबाद को इस क्षेत्र में अपने पैर उखड़ने का कितना गहरा डर सता रहा है.   

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भारी हथियारों की तैनाती और सीमा पर किलेबंदी

यह सैन्य लामबंदी केवल सैनिकों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है. खुफिया इनपुट के अनुसार, पाकिस्तान सेना ने रावलकोट और नियंत्रण रेखा के पास स्थित अन्य बेहद संवेदनशील क्षेत्रों में भारी हथियारों और सैन्य साजो-सामान की आवाजाही तेज कर दी है. 

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प्रदर्शनकारियों को डराने और किसी भी बड़े नागरिक मार्च को रोकने के लिए सड़कों पर बख्तरबंद गाड़ियां और मशीन गन से लैस चौकियां स्थापित की जा रही हैं. स्थानीय लोगों का आरोप है कि पाकिस्तानी हुकूमत नागरिकों की जायज आर्थिक मांगों को बंदूक की नोक पर दबाना चाहती है. रावलकोट, मीरपुर और मुजफ्फराबाद जैसे प्रमुख शहरों को छावनी में तब्दील कर दिया गया है ताकि जनता के विरोध प्रदर्शनों को बलपूर्वक कुचला जा सके.

PoK civil unrest

जनआक्रोश की असली वजह: भुखमरी, महंगाई और भेदभाव

PoK में भड़की इस आग के पीछे दशकों से चला आ रहा आर्थिक और प्रशासनिक शोषण है. जम्मू कश्मीर ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन में आम जनता बिजली के भारी-भरकम बिलों, आटे-दाल जैसी बुनियादी खाद्य वस्तुओं की आसमान छूती कीमतों और रोजगार के अभाव के खिलाफ सड़कों पर उतरी है. 

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि PoK की नदियों से बनने वाली पनबिजली का लाभ पाकिस्तान के पंजाब प्रांत को मिलता है, जबकि स्थानीय लोगों को अत्यधिक दरों पर बिजली बेची जा रही है. इसके साथ ही, पाकिस्तानी प्रशासन द्वारा बाहरी लोगों के लिए विधानसभा सीटें आरक्षित करने और स्थानीय संसाधनों पर कब्जा करने की नीतियों ने आग में घी डालने का काम किया है.   

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बर्बर दमन और मानवाधिकारों का उल्लंघन

जैसे-जैसे जनता का आंदोलन मुजफ्फराबाद चलो मार्च की ओर बढ़ा, पाकिस्तानी रेंजर्स और पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर सीधे गोलियां और आंसू गैस के गोले बरसाने शुरू कर दिए. हालिया झड़पों में कई नागरिकों और सुरक्षाकर्मियों की मौत हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं. 

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हालात को दुनिया की नजरों से छिपाने के लिए पाकिस्तानी हुकूमत ने पूरे क्षेत्र में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं बंद कर दी हैं. मीडिया पर पूरी तरह से अघोषित सेंसरशिप लगा दी है. नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं को आधी रात को घरों से उठाकर जेलों में ठूंसा जा रहा है, जिससे जनता का गुस्सा शांत होने के बजाय और भड़क गया है.   

चौतरफा संकट में घिरा पाकिस्तान 

मौजूदा स्थिति केवल PoK तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा पाकिस्तान इस समय चौतरफा आंतरिक अशांति और बगावत की चपेट में है. एक तरफ जहां बलूचिस्तान में चीनी प्रोजेक्ट्स और पाकिस्तानी सेना के खिलाफ उग्रवादी हमले और नागरिक आंदोलन (जैसे बलूच यकजेहती कमेटी का प्रदर्शन) अपने चरम पर हैं, वहीं दूसरी तरफ खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के आतंकियों ने समानांतर सरकार जैसी स्थिति पैदा कर दी है. 

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अब PoK में उठे इस जनविद्रोह ने शहबाज शरीफ सरकार और सैन्य मुख्यालय (GHQ) की रातों की नींद उड़ा दी है. आर्थिक रूप से कंगाल हो चुका पाकिस्तान एक साथ तीन मोर्चों पर भड़की इस आंतरिक आग को संभालने में पूरी तरह लाचार नजर आ रहा है.

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भारत का रुख 

PoK में जारी इस खूनी संघर्ष पर भारत ने भी कड़ी नजर रखी हुई है. भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि PoK में हो रही हिंसा और मानवाधिकारों का हनन पाकिस्तान के दशकों पुराने 'सिस्टमैटिक शोषण' और अवैध कब्जे का नतीजा है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी अब पाकिस्तान द्वारा अपने ही नियंत्रण वाले क्षेत्रों में नागरिकों पर किए जा रहे अत्याचारों को लेकर सवाल उठाने लगा है.

8000 अतिरिक्त रेंजर्स की यह ताजा तैनाती अस्थायी रूप से आंदोलन को धीमा जरूर कर सकती है, लेकिन यह साफ है कि बंदूक की गोलियों से पेट की भूख और अधिकारों की मांग को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता.   

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