इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (SC/ST) अत्याचार निवारण अधिनियम से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि FIR में जातिसूचक गाली का हूबहू उल्लेख नहीं होने मात्र से मामला खत्म नहीं हो जाता. अगर आरोपी और पीड़ित एक ही गांव के निवासी हैं, तो इस तथ्य पर विचार करते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आरोपी को पीड़ित की जाति की जानकारी थी. हालांकि, ऐसा अनुमान SC/ST एक्ट की धारा 8 के प्रावधानों और मामले के तथ्यों के अधीन होगा.
यह मामला नितेश बिंद और अन्य की ओर से दायर अपील से जुड़ा है. न्यायमूर्ति संतोष राय ने इस अपील पर सुनवाई की. अपीलकर्ताओं ने विशेष न्यायाधीश, जौनपुर की ओर से 3 दिसंबर 2025 को पारित संज्ञान एवं तलबी आदेश को चुनौती दी थी. यह मामला जौनपुर जिले के मछलीशहर थाने में दर्ज FIR से संबंधित है. आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि FIR में किसी विशिष्ट जातिसूचक गाली का उल्लेख नहीं है, इसलिए अपराध के जरूरी तत्व पूरे नहीं होते और समन जारी करने का आदेश रद्द किया जाना चाहिए.
सरकारी वकील ने क्या दलील दी?
अपील का विरोध करते हुए सरकारी वकील ने कहा कि FIR में पीड़ितों को चोट पहुंचाने और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने के विशिष्ट आरोप लगाए गए हैं. घायलों के बयानों में आरोपियों की भूमिका और उनकी भागीदारी का भी उल्लेख है. सरकारी पक्ष के मुताबिक, इन बयानों की पुष्टि मेडिकल इंजरी रिपोर्ट से होती है. यह भी दलील दी गई कि आरोपी और घायल एक ही गांव के रहने वाले हैं, इसलिए आरोपियों को पीड़ितों की जाति की जानकारी होने के तथ्य पर विचार किया जा सकता है.
FIR में तीन आरोपी नामजद
हाई कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड पर गौर करते हुए कहा कि FIR में नितेश बिंद, पिंटू और रंजीत नामजद हैं. इन पर पीड़ितों को चोट पहुंचाने और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने के आरोप हैं. जांच के दौरान घायलों के बयानों में नितेश बिंद और रंजीत बिंद की विशिष्ट भूमिका और भागीदारी बताई गई है. कोर्ट के सामने मौजूद इंजरी रिपोर्ट भी FIR और घायलों के बयानों में दर्ज तथ्यों की पुष्टि करती है. इस तरह मामले में केवल FIR में इस्तेमाल किए गए शब्दों के आधार पर ही नहीं, बल्कि अन्य उपलब्ध साक्ष्यों को भी ध्यान में रखा गया.
एक ही गांव में रहने का तथ्य
कोर्ट ने पाया कि FIR में नितेश बिंद और रंजीत बिंद का पता ग्राम दाउदपुर, मछलीशहर, जिला जौनपुर दर्ज है. वहीं, सूचनाकर्ता और घायल भी इसी गांव के निवासी हैं. अदालत ने कहा कि आरोपी और पीड़ितों के एक ही गांव में रहने के तथ्य को SC/ST एक्ट की धारा 8 के तहत जाति की पहचान की जानकारी के बारे में उपधारणा पर विचार करते समय ध्यान में रखा जा सकता है.
हाई कोर्ट ने अपील क्यों खारिज की?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विशिष्ट आरोपों, घायलों के बयानों और इंजरी रिपोर्ट से मिलने वाली पुष्टि पर विचार किया. कोर्ट ने माना कि उपलब्ध सामग्री को देखते हुए ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को समन जारी करने में कोई गलती नहीं की. अदालत के मुताबिक, विशेष न्यायाधीश का 3 दिसंबर 2025 का आदेश सुविचारित है और उसमें हस्तक्षेप करने लायक कोई अवैधता नहीं है.
इसके बाद हाई कोर्ट ने अपील को गुण-दोष के अभाव में खारिज कर दिया. इस फैसले में FIR में जातिसूचक गाली का हूबहू उल्लेख न होने के साथ-साथ मामले के अन्य तथ्यों और सबूतों की अहमियत भी सामने आई.