बिहार में भरत तिवारी के कथित पुलिस एनकाउंटर यानी मर्डर को 22 दिन बीत चुके हैं, लेकिन इस मामले में अब तक आरोपियों के खिलाफ कोई खास एक्शन नहीं हुआ. एक ओर पुलिस और जांच एजेंसियां वैज्ञानिक और न्यायिक जांच की बात कह रही हैं, वहीं दूसरी ओर परिवार का आरोप है कि अब तक किसी भी दोषी पुलिसकर्मी के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं हुई है. इसी वजह से भरत की मां ने आमरण अनशन का रास्ता चुना है. आइए, समझते हैं पूरी कहानी.
क्या था पूरा मामला?
17 जून 2026 को बिहार के भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव में पुलिस और एसटीएफ की एक कार्रवाई के दौरान भरत भूषण तिवारी को गोली लगी. पुलिस का दावा है कि भरत पर कई आपराधिक मामले दर्ज थे और उसने पुलिस टीम पर फायरिंग की थी. जवाबी कार्रवाई में वह घायल हुआ और बाद में उसकी मौत हो गई. वहीं परिवार शुरू से ही इसे फर्जी एनकाउंटर बताता रहा है और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है.
अब तक जांच में क्या-क्या हुआ?
मामले के तूल पकड़ने के बाद राज्य सरकार ने कई कदम उठाए. सबसे पहले एनकाउंटर में शामिल कुछ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और संबंधित थानाध्यक्ष को निलंबित कर दिया गया. इसके साथ ही दबाव इतना बढ़ गया कि इस मामले की जांच को आगे बढ़ाने के लिए फॉरेंसिक और न्यायिक जांच दोनों शुरू की गईं.
फॉरेंसिक जांच में क्या तलाश रही पुलिस?
इस मामले का सबसे बड़ा सवाल है कि भरत को लगी गोली किस हथियार से चली थी? इसी का पता लगाने के लिए अदालत की अनुमति के बाद तीन हथियार यानी निलंबित थानाध्यक्ष की सर्विस पिस्टल, एसटीएफ जवान की सरकारी पिस्टल और भरत के पास से बरामद पिस्टल को जांच के लिए एफएसएल भेजा गया है. साथ ही घटनास्थल से मिले कारतूस और खोखों का भी बैलिस्टिक मिलान कराया जा रहा है. यही रिपोर्ट तय करेगी कि गोली किस हथियार से चली थी और पुलिस के दावे घटनास्थल के सबूतों से मेल खाते हैं या नहीं.
कहां तक पहुंची न्यायिक जांच?
वारदात के 22वें दिन न्यायिक जांच आयोग ने भी अपनी कार्रवाई तेज कर दी है. आयोग ने भरत तिवारी के परिजनों के बयान आरा कोर्ट में दर्ज किए हैं. आयोग का कहना है कि वह सभी पक्षों के बयान और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पूरे एनकाउंटर की सच्चाई सामने लाने की कोशिश कर रहा है.
अनशन पर क्यों बैठी मां?
भरत की मां आशा देवी का कहना है कि इतने दिन बीत जाने के बाद भी जिन पुलिस अधिकारियों पर आरोप हैं, उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई और परिवार को न्याय नहीं मिला. उनका आरोप है कि सिर्फ जांच का आश्वासन दिया जा रहा है, लेकिन कार्रवाई नहीं हो रही. इसी कारण उन्होंने पहले सरकार को 8 जुलाई तक का अल्टीमेटम दिया था और कहा था कि यदि तब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो वह 9 जुलाई से आमरण अनशन शुरू करेंगी.
क्या हैं परिवार की मुख्य मांगें?
परिवार की मांग है कि कथित एनकाउंटर में शामिल सभी जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो, निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषियों को सजा मिले. इसी मामले में एक जनहित याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट में भी सीबीआई जांच की मांग उठाई गई है.
अब क्या होगा आगे?
अब इस पूरे मामले में दो जांच सबसे अहम मानी जा रही हैं. पहली, एफएसएल की बैलिस्टिक रिपोर्ट, जिससे यह स्पष्ट हो सकता है कि भरत को लगी गोली किस हथियार से चली. दूसरी, न्यायिक आयोग की रिपोर्ट, जो पुलिस की कार्रवाई और पूरे घटनाक्रम की वैधानिक जांच करेगी. इन दोनों रिपोर्टों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई और संभावित गिरफ्तारी या क्लीन चिट का रास्ता तय हो सकता है.
25 जून 2026, शाहपुर गांव, भोजपुर
पटना हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज विनोद कुमार सिन्हा इसी कथित एनकाउंटर की जांच करने के लिए 25 जून को शाहपुर गांव पहुंचे थे. एक ऐसा एनकाउंटर जिसे मर्डर साबित करने के लिए ज़्यादा मेहनत की भी ज़रुरत नहीं है. क्योंकि सब कुछ कैमरे में क़ैद हो गया था. एनकाउंटर के नाम पर मर्डर करने वाले आरोपी पुलिसवालों के ख़िलाफ एफआईआर भी दर्ज हो चुकी है.
इस मामले में कत्ल की धारा लगी है. लेकिन कमाल देखिए एनकाउंटर के नाम पर कत्ल की जिस तस्वीर को पूरे देश ने देखा, उसे देखने के लिए हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज साहब को बिहार सरकार ने 6 महीने का वक़्त दिया है. जबकि 22 जून को मर्डर को लेकर जिन पुलिसवालों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज हुई, उनकी गिरफ्तारी तो छोड़िए उनमें से एक को तो तबादले के नाम पर और भी अच्छी पोस्टिंग दे दी गई.
ज़रा सोचिए अगर किसी आम इंसान के ख़िलाफ क़त्ल जैसे संगीन जुर्म में एफआईआर दर्ज होती तो वो कब का अंदर होता. पर ये तो पुलिसवाले हैं. ये दूसरों को अंदर करते हैं. इन्हें कौन अंदर करेगा?
बिहार पुलिस के हाथों भरत तिवारी के क़त्ल को 22 दिन हो चुके हैं. पर इस केस का आलम क्या है दो पन्नों के ज़रिए इस बात का पता चलता है. वो दो पन्ने जो भरत तिवारी की मां के नाम पर आरा भोजपुर के एसपी को शिकायती पत्र के तौर पर लिखे गए थे. वो शिकायती पत्र 18 जून को पुलिस ने रिसीव किया था. बाकायदा उस पर पुलिस की मुहर और तारीख़ भी है.
आशा देवी ने शिकायत पत्र में जगदीशपुर के SDPO यानि सब डिविजनल पुलिस ऑफिसर और उनके साथ एनकाउंटर में शामिल अन्य पुलिसवालों के ख़िलाफ़ क़त्ल का मुक़दमा दर्ज करने की मांग की थी. चौतरफ़ा दबाव के बाद आखिरकार 22 जून को शाहपुर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया. भरत तिवारी की मां आशा देवी की उसी शिकायत पत्र को एफआईआर में तब्दील कर दिया गया.
बाकायदा उसमें केस नंबर 178/26 और तारीख़ भी लिखी है. 22 जून. साथ ही आरोपी पुलिसवालों के ख़िलाफ़ जो तीन धाराएं दर्ज की गईं हैं वो भी लिखी हैं. भारतीय न्यायिक संहिता यानि बीएनएस के तहत आरोपी पुलिसवालों के ख़िलाफ़ जो तीन धाराएं लगाई गईं हैं, उनमें पहला है 103 (1) यानि मर्डर. धारा 3(5) यानि एक साथ कई लोगों के मिलकर क़त्ल का इरादा. साथ ही बीएनएस की धारा 27.. यानि आर्म्स एक्ट.
अब ज़ाहिर है मर्डर के मामले में जिसकी सज़ा उम्रक़ैद से लेकर सजा-ए-मौत तक है. आमतौर पर पुलिस एफआईआर दर्ज होते ही आरोपी को गिरफ्तार कर लेती है. जांच बाद में शुरु होती है. लेकिन यहां चूंकि मामला घर का है तो पुलिस शायद भूल गई कि किसी को गिरफ्तार भी करना है. वैसे आशा देवी की शिकायत के बाद पुलिस ने कुल 5 पुलिसवालों के ख़िलाफ हत्या का मुक़दमा दर्ज किया है.
जिनमें पहले हैं 17 जून को हुए एनकाउंटर के नाम पर भरत तिवारी का क़त्ल करने वाली टीम की अगुवाई करने वाले SDPO यानि सब डिविजनल पुलिस ऑफिसर राजेश कुमार शर्मा और दूसरे हैं शाहपुर थाने के एसएचओ राजेश मालाकार. इन दोनों के अलावा एफआईआर में तीन और पुलिसवालों के नाम हैं. लेकिन उनके नाम ज़ाहिर नहीं हो पाए हैं. जानते हैं क्यों? क्योंकि पुलिस ने ना तो एफआईआर की कॉपी आम की है. ना ही उसे ऑनलाइन अपने पोर्टल पर अब तक अपलोड किया है.
लेकिन माना जा रहा है कि एनकाउंटर के बाद SDPO और एसएचओ के साथ जिन तीन पुलिसवालों को सस्पेंड किया गया था, उन्हीं तीनों के नाम एफआईआर में शामिल हैं. एनकाउंटर के बाद SDPO और एसएचओ के साथ सस्पेंड होने वाले जो बाकी तीन पुलिस अफ़सर हैं, वो हैं सब इंस्पेक्टर हरीश चंद्र कुमार और अंकित आर्यन और असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर रमाशंकर यादव. इनमें से सस्पेंडेड SDPO का तबादला कर उन्हें नारकोटिक्स डिपार्टमेंट में भेज दिया गया है. बाकी चार पुलिस अफ़सर भी फिलहाल मजे में हैं.
पुलिस के हाथों मारे गए भरत तिवारी के पिता बेबसी से पूछ रहे हैं कि जब सब कुछ सामने है. उनके बेटे को जब पुलिसवालों ने मारा सारे देश ने देखा. तो फिर और किस सबूत का इंतजार है? उनकी दलील में दम है कि जिस इलाके में उनके बेटे का पुलिसवालों के हाथों कत्ल हुआ, उस इलाके के कप्तान यानि एसपी अब भी अपनी कुर्सी पर जमे हुए हैं, तो फिर इंसाफ की उम्मीद क्या ही की जाए.
भरत तिवारी की मां आशा देवी की शिकायत पर 5 पुलिसवालों के ख़िलाफ हत्या का मुक़दमा दर्ज हुआ है. सिर्फ दर्ज हुआ है. एक्शन कुछ भी नहीं. भरत की मां आशा देवी का कहना है कि जिस तरह से उनके बेटे भरत तिवारी की पुलिस ने हत्या की है, उसकी वैसी ही सज़ा गुनहगार पुलिसवालों को मिलनी चाहिए. उनकी मांग है कि उन पुलिसवालों को फांसी से कम सज़ा ना हो. उन्होंने ये भी कहा कि जब तक उनकी ये मांग पूरी नहीं होगी वो अपनी लड़ाई जारी रखेंगी.