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ट्रेनों के पीछे क्यों जलती-बुझती है लाल बत्ती? रेलवे के इस आदेश से खुला राज

ट्रेन के पीछे छोटी सी लाल रोशनी को आपने कई बार देखा होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसका काम क्या है? यह सिर्फ ट्रेन की पहचान के लिए नहीं होती, बल्कि रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था में इसकी अहम भूमिका है. अब रेलवे बोर्ड ने मालगाड़ियों में इस व्यवस्था को लेकर नियम और जिम्मेदारी सख्त करने के निर्देश दिए हैं.

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ट्रेन के पीछे लगी लाल बत्ती का सुरक्षा के लिहाज से अहम काम होता है. (File Photo)
ट्रेन के पीछे लगी लाल बत्ती का सुरक्षा के लिहाज से अहम काम होता है. (File Photo)

ट्रेन को सामने से देखते हुए हम उसके इंजन, डिब्बों और उसमें बैठे यात्रियों पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन क्या आपने कभी ट्रेन के सबसे पीछे गौर किया है? वहां एक छोटी सी लाल रोशनी दिखाई देती है. ज्यादातर लोगों के लिए यह बस ट्रेन का एक हिस्सा होती है, लेकिन रेलवे में इसका काम काफी अहम है.

यह रोशनी सिर्फ पीछे से दिखाई देने के लिए नहीं होती, बल्कि इससे रेलवे कर्मचारियों को यह पता लगाने में मदद मिलती है कि ट्रेन पूरी है या उसका कोई डिब्बा रास्ते में अलग हो गया है. अब रेलवे ने खास तौर पर मालगाड़ियों में इस सुरक्षा व्यवस्था को और सख्त करने का फैसला किया है.

रेलवे बोर्ड ने सभी जोनल रेलवे को मालगाड़ियों में टेल लैंप उपलब्ध कराने और इसके इस्तेमाल की व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है. यानी मालगाड़ी के सबसे पीछे लाल बत्ती की मौजूदगी और उसे लेकर जिम्मेदारी अब और स्पष्ट तरीके से तय की गई है.

ट्रेन के पीछे क्यों लगती है लाल बत्ती?

ट्रेन के सबसे आखिरी हिस्से में लगी इस लाल बत्ती को टेल लैंप (Tail Lamp) कहा जाता है. इसका सबसे अहम काम यह बताना है कि ट्रेन का आखिरी हिस्सा गुजर चुका है और पूरी ट्रेन सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ रही है. आसान भाषा में समझें तो अगर किसी मालगाड़ी के पीछे लाल टेल लैंप दिखाई दे रहा है, तो रेलवे कर्मचारी समझ सकते हैं कि ट्रेन का पूरा हिस्सा उनके सामने से गुजर चुका है. अगर किसी वजह से कोई डिब्बा या बोगी रास्ते में अलग हो जाए और पीछे टेल लैंप न दिखाई दे, तो यह स्थिति तुरंत ध्यान में आ सकती है. यानी यह छोटी सी लाल रोशनी ट्रेन की सुरक्षा के लिए काफी अहम होती है.

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मालगाड़ियों को लेकर रेलवे ने क्या कहा?

रेलवे बोर्ड ने सभी जोनल रेलवे को मालगाड़ियों में टेल लैंप उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं. यह व्यवस्था उन मालगाड़ियों पर भी लागू होगी जो ट्रेन मैनेजर या वर्किंग ट्रेन मैनेजर के साथ चलती हैं और उन पर भी जो इनके बिना चलती हैं. इसमें ऐसी मालगाड़ियां भी शामिल हैं जो ब्रेक वैन (Brake Van) के बिना चलती हैं. ब्रेक वैन ट्रेन के सबसे आखिर में लगा हुआ वह विशेष डिब्बा होता है, जिसमें ट्रेन मैनेजर यानी गार्ड अपनी ड्यूटी करते हैं. इसे ट्रेन का मिनी कंट्रोल रूम भी कहा जाता है. ऐसे में ट्रेन के आखिरी हिस्से की पहचान के लिए टेल लैंप की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है.

टेल लैंप कौन लेगा और कौन लौटाएगा?

रेलवे बोर्ड ने सिर्फ टेल लैंप उपलब्ध कराने की बात नहीं कही है, बल्कि इसकी जिम्मेदारी भी तय की है. ड्यूटी पर जाने से पहले लोको पायलट और असिस्टेंट लोको पायलट लॉबी से टेल लैंप टेकओवर करेंगे. ट्रेन की ड्यूटी पूरी होने के बाद वही टेल लैंप वापस उसी लॉबी में हैंडओवर करना होगा. इसका मतलब यह है कि टेल लैंप को लेकर यह साफ रहेगा कि उसे किसने लिया और ड्यूटी के बाद किसने वापस जमा किया. सभी जोनल रेलवे को इस व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करने को कहा गया है.

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आखिर अभी इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

यह फैसला 2 सितंबर को हुई सुरक्षा समीक्षा बैठक के बाद लिया गया. बैठक में मालगाड़ियों में टेल लैंप की उपलब्धता और उसके सही इस्तेमाल को लेकर चर्चा हुई थी. इसके बाद रेलवे बोर्ड ने इस व्यवस्था को औपचारिक निर्देश के तौर पर लागू करने को कहा. यानी रेलवे अब यह सुनिश्चित करना चाहता है कि मालगाड़ियों में आखिरी हिस्से की पहचान के लिए जरूरी सुरक्षा इंतजाम उपलब्ध रहें और उनके इस्तेमाल की जिम्मेदारी भी तय हो.

रात और कोहरे में अहम है टेल लैंप

दिन में ट्रेन का आखिरी डिब्बा आसानी से दिखाई दे सकता है, लेकिन रात या घने कोहरे में स्थिति अलग होती है. ऐसे समय में पीछे लगी लाल रोशनी दूर से दिखाई देने में मदद करती है. इससे पीछे से आने वाली ट्रेन के लोको पायलट को संकेत मिलता है कि आगे ट्रैक पर ट्रेन मौजूद है. जरूरत पड़ने पर वह समय रहते ट्रेन की गति कम करने या उसे रोकने की कार्रवाई कर सकता है.

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