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बिना मंजूरी बिक रही है संयुक्त प्रॉपर्टी, ठगी से बचने के लिए तुरंत करें ये काम

कोई सह-मालिक दूसरे मालिकों की सहमति के बिना संयुक्त रूप से मालिकाना हक वाली पूरी प्रॉपर्टी को कानूनी तौर पर नहीं बेच सकता, लेकिन इससे विवाद होने की संभावना खत्म नहीं होती.

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बिना मर्जी रजिस्ट्री रोकने के कानूनी उपाय (Photo-ITG)
बिना मर्जी रजिस्ट्री रोकने के कानूनी उपाय (Photo-ITG)

भारत में संयुक्त स्वामित्व वाली संपत्तियों को लेकर विवाद होना आम बात है, विशेष रूप से तब जब परिवारों को विरासत में घर या ज़मीन मिलती है और वे मालिकाना हक का औपचारिक बंटवारा नहीं करते. एक आम सवाल यह उठता है कि क्या कोई एक सह-मालिक दूसरो को सूचित किए बिना या उनकी सहमति लिए बिना संपत्ति बेच सकता है.

हालांकि भारतीय कानून एक सह-मालिक को अपने अविभाजित हिस्से को ट्रांसफर करने की अनुमति देता है, लेकिन वे तब तक कानूनी रूप से पूरी संपत्ति नहीं बेच सकते जब तक कि सभी सह-मालिक सहमत न हों. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आपको पता चलता है कि कोई भाई-बहन, जीवनसाथी, बिजनेस पार्टनर या कोई अन्य सह-मालिक आपकी मंजूरी के बिना संयुक्त संपत्ति बेचने का प्रयास कर रहा है, तो तुरंत कदम उठाने से आपके मालिकाना हक की रक्षा हो सकती है. 

पहले यह पुष्टि करें कि को-ऑनर वास्तव में क्या बेचने की कोशिश कर रहा है. सबसे पहला कदम यह पता लगाना है कि सह-मालिक केवल अपने अविभाजित हिस्से को बेच रहा है या पूरी संपत्ति को ट्रांसफर करने की कोशिश कर रहा है.

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ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट 1882 की धारा 44 के तहत, एक सह-मालिक कानूनी रूप से संपत्ति में केवल अपने हिस्से को ही बेच सकता है. वे अन्य सह-मालिकों के हिस्से को ट्रांसफर नहीं कर सकता. अगर संपत्ति का बंटवारा नहीं हुआ है, तो खरीदार को केवल विक्रेता का अविभाजित हिस्सा ही मिलता है, संपत्ति के किसी खास हिस्से पर विशेष कब्ज़ा नहीं मिलता.

अगर आपको लगता है कि प्रस्तावित बिक्री सह-मालिक के कानूनी अधिकारों से अधिक है, तो कानूनी विशेषज्ञ सह-मालिक और संभावित खरीदार दोनों को एक औपचारिक नोटिस जारी करने की सलाह देते हैं. इस नोटिस में स्पष्ट रूप से उल्लेख होना चाहिए कि संपत्ति संयुक्त स्वामित्व में है और विक्रेता के पास पूरी संपत्ति को बेचने का अधिकार नहीं है. समय रहते की गई यह बातचीत कई बार सौदे को पूरा होने से रोक देती है और संभावित खरीदारों को भी मालिकाना हक के विवाद के बारे में सतर्क कर देती है.

बिक्री रोकने के लिए कोर्ट से स्टे ऑर्डर लें

अगर संपत्ति की बिक्री बिल्कुल तय लग रही है कोड ऑफ सिविल प्रोसिजर 1908 के तहत अंतरिम या स्थायी रोक के लिए सिविल कोर्ट का रुख कर सकते हैं.

स्टे ऑर्डर सह-मालिक को तब तक बिक्री पूरी करने से रोक सकती है जब तक कि मालिकाना हक का विवाद सुलझ नहीं जाता, अदालतें आम तौर पर यह देखती हैं कि क्या आवेदक का संपत्ति में प्रथम दृष्टया मालिकाना हक है और क्या इस सौदे की अनुमति देने से ऐसा नुकसान होगा जिसकी भरपाई न की जा सके. संपत्ति की रजिस्ट्री होने से पहले स्टे ऑर्डर लेना, बिक्री पूरी होने के बाद उसे चुनौती देने की तुलना में बहुत अधिक प्रभावी होता है.

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मालिकाना हक तय करने के लिए बृंटवारे का मुकदमा 

कई विवाद इसलिए पैदा होते हैं, क्योंकि विरासत में मिली संपत्तियां सालों तक बिना बंटवारे के पड़ी रहती हैं. विभाजन अधिनियम, 1893 (Partition Act, 1893) के तहत बंटवारे का मुकदमा अदालत को संपत्ति को औपचारिक रूप से विभाजित करने या प्रत्येक सह-मालिक का हिस्सा तय करने का अधिकार देता है. एक बार बंटवारा पूरा हो जाने के बाद, प्रत्येक सह-मालिक को एक विशिष्ट हिस्से पर स्पष्ट मालिकाना हक मिल जाता है, जिससे भविष्य में विवादों की गुंजाइश कम हो जाती है.

सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने हालिया फैसले में इस सिद्धांत को दोहराया है कि एक अविभाजित संपत्ति का सह-मालिक बंटवारे के माध्यम से अपना हिस्सा तय किए बिना पूरी संपत्ति को ट्रांसफर नहीं कर सकता.

 संपत्ति पहले ही बेची जा चुकी हो, तो क्या करें?

अगर आपकी अनुमति के बिना संपत्ति पहले ही बेची जा चुकी है, तो भी कानूनी उपाय उपलब्ध हैं. सह-मालिक स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट 1963 के तहत सेल डीड को रद्द करने की मांग कर सकते हैं और अदालत से अपने मालिकाना हक की घोषणा करने का अनुरोध कर सकते हैं. जहां इस सौदे में जालसाजी, धोखाधड़ी या किसी और के नाम पर दस्तखत करना शामिल हो, वहां भारतीय न्याय संहिता, 2023 के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत आपराधिक कार्यवाही भी शुरू की जा सकती है.

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खरीदारों के लिए भी सावधानी ज़रूरी है

खरीदारों के लिए भी संयुक्त स्वामित्व वाली संपत्तियां खरीदने में सावधानी बरतनी चाहिए. केवल एक सह-मालिक से संपत्ति खरीदने पर आम तौर पर केवल उस व्यक्ति का कानूनी हिस्सा ही ट्रांसफर होता है, इससे पूरी संपत्ति का विशेष मालिकाना हक स्वतः नहीं मिल जाता. यही एक कारण है कि बैंक होम लोन मंजूर करने से पहले टाइटल वेरिफिकेशन पर ज़ोर देते हैं और कई मामलों में सभी सह-मालिकों से सहमति या रिलीज डीड मांगते हैं.
 
सह-मालिकों और संभावित खरीदारों दोनों के लिए सबसे सुरक्षित तरीका यही है कि किसी भी सौदे को आगे बढ़ाने से पहले स्वामित्व रिकॉर्ड, म्यूटेशन एंट्री , एन्कमब्रेंस सर्टिफिकेट और टाइटल दस्तावेजों की अच्छी तरह जांच कर लें. शुरुआत में बरती गई ये सावधानियां बाद में लंबी और महंगी मुकदमेबाजी से बचा सकती हैं. 

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