दिल्ली और गुरुग्राम वो शहर हैं जहां का रियल एस्टेट मार्केट देशभर के सबसे महंगे मार्केट्स में एक माना जाता है. खासकर गुरुग्राम में कई सुपर लग्जरी सोसायटीज बनी हैं, जहां घरों की कीमतें 100 करोड़ तक हैं. यहां एक अपार्टमेंट बिकता है तो देश भर में सुर्खियां बनती हैं, लेकिन मॉनसून की पहली बारिश में ही ये शहर लाचार दिखते हैं.
लोग घंटों तक अपनी गाड़ियों में बैठे ट्रैफिक की भीड़ से जूझते हैं. जिस दिल्ली-एनसीआर में लोग अपनी जिंदगी भर की कमाई लगाकर करोड़ों रुपये के घर खरीदते हैं, वहां पहली बारिश के बाद सबसे बड़ा सवाल यह क्यों बन जाता है कि 'आज घर सुरक्षित कैसे पहुंचेंगे?'
बारिश के बाद नदियों में तब्दील होती सड़कें, पानी में आधी डूबी गाड़ियां और घंटों लंबे ट्रैफिक जाम अब दिल्ली- गुरुग्राम की एक स्थायी पहचान बनते जा रहे हैं. यह स्थिति सिर्फ एक शहर की नहीं है, बल्कि देश के तमाम आधुनिक कहे जाने वाले महानगरों का यही हाल है.आजतक रेडियो के शो प्रॉपर्टी से फायदा में अर्बन प्लानर और आर्किटेक्ट डॉ.सुप्तेंदु पी बिश्वास ने इस मुद्दे पर विस्तार से बातचीत की.
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डॉ.सुप्तेंदु पी बिश्वास कहते हैं- 'अर्बन टाउन प्लानिंग का मतलब केवल ऊंची-ऊंची इमारतें खड़ी करना या चमचमाती सड़कें बनाना नहीं है. इसका सबसे पहला और बुनियादी सिद्धांत है संसाधनों का सही और न्यायसंगत वितरण. प्लानिंग का मुख्य काम यह तय करना होता है कि आज से 20 या 30 साल बाद कोई शहर कैसा दिखेगा. वहां कितनी आबादी बढ़ेगी, लोग कहां रहेंगे, कहां नौकरियां करेंगे, उनके मनोरंजन के साधन क्या होंगे, सड़कों की चौड़ाई और वाहनों का अनुपात क्या होगा. इन सबसे ऊपर, अर्बन प्लानिंग का अंतिम उद्देश्य नागरिकों के 'क्वालिटी ऑफ लाइफ' यानी जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाना होता है.'
भारतीय शहरों, विशेषकर गुरुग्राम की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां डेवलपमेंट पहले होता है और अर्बन प्लानिंग उसके पीछे-पीछे भागती है. बिल्डरों ने जमीनें खरीदीं, गगनचुंबी सोसायटियां और बड़े-बड़े कमर्शियल कॉम्प्लेक्स खड़े कर दिए, लेकिन उन इमारतों से निकलने वाले सीवेज, बारिश के पानी की निकासी और सार्वजनिक परिवहन जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए कोई दूरदर्शी योजना नहीं बनाई गई. जब विकास बिना किसी मास्टर प्लान के होता है, तो उसका नतीजा वही होता है जो आज हम गुरुग्राम की सड़कों पर देख रहे हैं.
यह प्राकृतिक नहीं, 'मैनमेड डिजास्टर' है
अक्सर सरकारें और प्रशासन जलभराव को 'प्राकृतिक आपदा' या 'अत्याधिक बारिश' का बहाना बनाकर टाल देते हैं, लेकिन डॉ. विश्वास ने आंकड़ों के साथ इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया. उन्होंने बताया कि दिल्ली-एनसीआर और गुरुग्राम के क्षेत्र में सालाना औसतन केवल 500 से 650 मिलीमीटर बारिश होती है. यदि हम भारत के दूसरे शहरों से इसकी तुलना करें, जैसे केरल के कोच्चि में, तो वहां सालाना लगभग 3000 मिलीमीटर तक बारिश होती है. जब कोच्चि जैसे शहर इतनी भारी बारिश को संभाल सकते हैं, तो गुरुग्राम जैसी जगह मात्र 600 मिमी बारिश में भी पूरी तरह ठप क्यों हो जाती है?
सुप्तेंदु पी बिश्वास कहते हैं 'अगर हम आज से 40-50 साल पहले के गुरुग्राम को देखें, तो वहां कभी ऐसी बाढ़ जैसी स्थिति नहीं बनती थी. इसका कारण यह था कि तब शहर में प्राकृतिक जल निकासी की व्यवस्था थी. अरावली की पहाड़ियों से जो पानी नीचे आता था, वह प्राकृतिक ढलान के सहारे जोहड़ और प्राकृतिक नालों से होते हुए शहर से बाहर निकल जाता था, लेकिन आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में हमने इन प्राकृतिक संपदाओं को नष्ट कर दिया.

उदाहरण के लिए, गुरुग्राम का मशहूर गोल्फ कोर्स रोड और उसके आसपास का पूरा चमचमाता इंफ्रास्ट्रक्चर सीधे उन प्राकृतिक नदी-नालों के ऊपर बना दिया गया है जो पानी के मुख्य रास्ते थे, जब आपने पानी का रास्ता ही ब्लॉक कर दिया, तो वह सड़कों और सोसायटियों के अंदर ही भरेगा. '
पानी का एक सीधा और प्राकृतिक नियम है उसे बहने के लिए रास्ता और जमीन में समाने के लिए जगह चाहिए. अर्बन प्लानिंग की भाषा में इसे 'सोकिंग' कहा जाता है, पहले गुरुग्राम में बड़े पैमाने पर कृषि भूमि और खुला क्षेत्र होता था, जहां बारिश का पानी जमीन के अंदर चला जाता था, इससे दो फायदे होते थे सड़कों पर पानी नहीं जमता था और भूजल स्तर रिचार्ज होता था. लेकिन आज पूरे शहर को कंक्रीट और डामर से पूरी तरह पाट दिया गया है. मिट्टी बची ही नहीं है, जिससे पानी जमीन के भीतर नहीं जा पाता और वह सतह पर जमा होकर बाढ़ का रूप ले लेता है.
दुबई बनाम भारतीय शहर: क्यों यह तुलना पूरी तरह गलत है?
जब भी भारत के किसी शहर में बाढ़ आती है, तो सोशल मीडिया और मीडिया के एक वर्ग में तुरंत दुबई या अन्य विदेशी शहरों का उदाहरण दिया जाने लगता है कि "देखिए, दुबई में भी तो बारिश में सड़कें डूब गई थीं." लेकिन डॉ. विश्वास कहते हैं दुबई जैसे मिडल-ईस्ट के शहरों से हमारे शहरों की तुलना करना पूरी तरह से अनुचित और गलत है. इसके पीछे दो मुख्य कारण हैं पहला, भारतीय शहरों पर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव है, जिसकी तुलना दुबई से कभी नहीं की जा सकती, दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि दुबई जैसे मरुस्थलीय देश बारिश के लिए कभी तैयार नहीं थे क्योंकि वहां ऐसा मौसम दशकों में एक बार होता है.
दुबई के पास ड्रेनेज सिस्टम न होने का एक भौगोलिक कारण था, फिर भी उन्होंने बहुत कम समय में अपने सिस्टम को रेक्टिफाई कर लिया, इसके विपरीत, भारत में मानसून कोई अचानक आने वाली घटना नहीं है. यह एक वार्षिक चक्र है, जिसके आने की तारीख और महीना सबको पहले से पता होता है, इसके बावजूद हर साल वही घुटनों तक नाले जैसा गंदा पानी सड़कों पर दिखना, हमारी प्रशासनिक लापरवाही और लाचारी को दर्शाता है.
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तो क्या अब इस स्थिति को कभी सुधारा नहीं जा सकता? डॉ. विश्वास का मानना है कि स्थिति को निश्चित रूप से बेहतर किया जा सकता है, बशर्ते हम पारंपरिक और गलत इंजीनियरिंग सोच को बदलें, उन्होंने इसके लिए कुछ बेहद महत्वपूर्ण और व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं.
'सॉफ्ट ड्रेन' का कॉन्सेप्ट अपनाना
सुप्तेंदु कहते हैं 'अभी तक हमारे देश में लोक निर्माण विभाग (PWD) और नगर निगम के इंजीनियर्स ड्रेनेज सिस्टम को केवल एक 'इंजीनियरिंग एक्सरसाइज' मानते हैं. उनका पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि कंक्रीट के पक्के नाले बनाकर पानी को कितनी तेजी से आगे बढ़ाया जाए. यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप एक फ्लाईओवर से अपनी गाड़ी बहुत तेजी से भगाकर ले जाएं, लेकिन आगे जाकर एक बड़े रेड लाइट या संकरे रास्ते पर ट्रैफिक जाम में फंस जाएं. कंक्रीट के नालों में पानी तेजी से बहता है और आगे जाकर जहां रास्ता संकरा होता है, वहां भयानक जलभराव कर देता है.'
इसका सही वैज्ञानिक समाधान 'सॉफ्ट ड्रेन' है, नालों को पूरी तरह कंक्रीट से पक्का करने के बजाय उनके निचले हिस्से को मिट्टी या प्राकृतिक सॉफ्ट सॉयल का रहने देना चाहिए, इससे पानी का बहाव थोड़ा धीमा होगा, जिससे पानी को जमीन के अंदर सोखने का समय मिलेगा. यह न केवल बाढ़ को रोकेगा बल्कि शहर के गिरते वाटर टेबल को भी सुधारेगा.

सीवर और स्टॉर्म वॉटर लाइन्स को अलग करना
भारतीय शहरों की एक और सबसे बड़ी तकनीकी खराबी यह है कि घरों से निकलने वाले सीवर का पानी और बारिश का पानी एक ही ड्रेनेज सिस्टम में मिला दिया जाता है. मानसून के दौरान जब अचानक पानी की मात्रा बढ़ती है, तो सीवर की लाइनें चोक हो जाती हैं और गंदा पानी बैकफ्लो मारकर सड़कों और घरों में घुसने लगता है. इन दोनों प्रणालियों का पूरी तरह से अलग होना अनिवार्य है, तभी सॉफ्ट ड्रेन का कॉन्सेप्ट जमीनी स्तर पर काम कर पाएगा.
हर साल मानसून से ठीक पहले सड़कों को खोदने, नए पाइप डालने और नालों की सफाई के नाम पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं, फिर भी नतीजा 'ढाक के तीन पात' ही क्यों रहता है? इसके पीछे प्रशासनिक तालमेल की भारी कमी और भ्रष्टाचार एक कड़वी सच्चाई है.
सुप्तेंदु कहते हैं -' किसी भी शहर के बुनियादी ढांचे को संभालने के लिए कई विभाग जिम्मेदार होते हैं जैसे सिंचाई विभाग, वन विभाग, नगर निगम और राज्य विकास प्राधिकरण इन सभी विभागों के बीच आपसी कोऑर्डिनेशन की भारी कमी है. जब तक एक विभाग सड़क बनाता है, दूसरा विभाग पाइप डालने के लिए उसे खोद देता है. कोई भी विभाग पूरी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होता और ज्यूरिस्डिक्शन की इसी लड़ाई में आम जनता पिसती है. इसके अलावा, ड्रेनेज के टेंडरों और मेंटेनेंस के कामों में होने वाला भ्रष्टाचार इस समस्या को और ज्यादा क्रॉनिक बना देता है.'
गुरुग्राम जैसे शहरों की यह दुर्दशा हमारे देश के रियल एस्टेट मार्केट और अर्बन गवर्नेंस पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान खड़ी करती है. लोग जिस प्रॉपर्टी के लिए करोड़ों रुपये का लोन लेते हैं, भारी भरकम टैक्स चुकाते हैं, क्या वे सिर्फ कुछ घंटों की बारिश में बंधक बन जाने के लिए यह सब करते हैं.