पाकिस्तान छोड़कर भारत आए हिंदुओं की कहानियों में दर्द जितना बड़ा है, उतना ही बड़ा बदलाव भी है. वहां जिन लोगों की जिंदगी डर, भेदभाव और असुरक्षा के बीच गुजरती थी, वे भारत आने के बाद पहली बार खुलकर त्योहार मनाने, अपने नाम से जीने और अपनी मेहनत की कमाई को अपने पास बचते देखने की बात करते हैं.
आजतक डॉट इन ने पाकिस्तान से भारत आकर बसे कई हिंदू परिवारों से बात की. उन्होंने बताया कि भारत आने के बाद शुरुआत जरूर मुश्किल रही, लेकिन धीरे-धीरे उनकी जिंदगी बदल गई. अब वे कहते हैं कि उनके बच्चों का भविष्य पहले से ज्यादा सुरक्षित दिखता है और सबसे बड़ी बात, अब उन्हें हर दिन डर के साथ नहीं जीना पड़ता.
‘सरहद पार के हिंदू’ सीरीज के चौथे पार्ट में बताते हैं कि जब पाकिस्तान से हिंदू भारत आ जाते हैं तो कैसे उनकी जिंदगी बदल जाती है…
'पहली बार लगा कि हम आजाद हैं'
करीब 28 साल पाकिस्तान में रहने के बाद 2014 में भारत आए जान बहादुर सिंह कहते हैं कि आजादी का असली मतलब उन्हें भारत आने के बाद समझ आया.
'जब भारत आए तब पहली बार महसूस हुआ कि हम सच में आजाद हैं. पाकिस्तान में हर दिन घुटन की जिंदगी थी. यहां कम से कम खुलकर सांस तो ले रहे हैं.' — जान बहादुर सिंह
दिवाली अब सिर्फ पूजा नहीं, पूरा उत्सव है
सोभराज भील बताते हैं कि पाकिस्तान में दिवाली और होली मनाई तो जाती थी, लेकिन बहुत सीमित तरीके से. उन्होंने बताया कि वहां दिवाली पर बस पूजा कर लेते थे, अपने लोगों में थोड़ा-बहुत मना लेते थे. यहां आने के बाद पहली बार देखा कि पूरा बाजार जगमगा रहा है, हर तरफ रोशनी है, लोग कई दिन पहले से तैयारी कर रहे हैं. तब लगा कि त्योहार ऐसे मनाए जाते हैं. वे बताते हैं कि अब उनके बच्चे बिना किसी डर के रंग खेलते हैं, दीप जलाते हैं और धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं.

जागीदार से होती थी पहचान
एक हिंदू ने बताया कि ‘पाकिस्तान में हिंदुओं के लिए सिर्फ धार्मिक ही नहीं, सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां भी हैं. पाकिस्तान के कई इलाकों में आज भी जागीरदारी व्यवस्था का प्रभाव है. वहां किसी की खुद की पहचान नहीं है. जागीरदारी सिस्टम चलता है. उनकी गुलामी करनी पड़ती है. अगर आप किसी जागीरदार के यहां मजदूरी कर रहे हैं, तभी आप वहां रह सकते हैं.'
‘कई बार व्यक्ति की पहचान उसके नाम से नहीं, बल्कि उस जागीरदार के नाम से होती है जिसके अधीन वह काम करता है. अगर कहीं जा रहे हैं और किसी ने रोक लिया तो अपना नाम नहीं बताना, जागीरदार का नाम बताना है. फिर आपको छोड़ दिया जाएगा. ऐसे में खुद की कोई पहचान नहीं रह जाती. लेकिन भारत में आकर अपने नाम और अपनी पहचान से जी रहे हैं.’
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अब अपना नाम छिपाना नहीं पड़ता
पाकिस्तान में कई लोग अपनी पहचान छिपाने की बात करते हैं. भारत आने के बाद यह मजबूरी खत्म हो गई. अब किसी को यह सोचकर नाम नहीं बताना पड़ता कि सामने वाला कैसा व्यवहार करेगा. उनके मुताबिक यह बदलाव सिर्फ धार्मिक नहीं, मानसिक आजादी भी है.
अब जो कमाते हैं, वही हमारा है
सोभराज भील बताते हैं कि पाकिस्तान में सबसे बड़ा डर यह रहता था कि मेहनत की कमाई कब छिन जाए.
'वहां अगर सौ रुपये भी बचा लेते थे तो डर रहता था कि कोई लूट लेगा. यहां जो कमाते हैं, लगता है कि वो हमारा है. कोई छीनने नहीं आएगा.' — जान बहादुर सिंह

1500 रुपये लेकर आए... आज लाखों की संपत्ति है
अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा बदलाव आर्थिक स्थिति को मानते हैं. पाकिस्तान से आए एक हिंदू बताते हैं, ‘जब मैं भारत आया था तो मेरे पास सिर्फ 1500 रुपये थे. आज मेहनत करके 15 से 20 लाख रुपये तक की संपत्ति बना ली है. यहां मेहनत का फल अपने परिवार के पास ही रहता है.'
पाकिस्तान से आने वाले अधिकांश हिंदू शुरुआत में मजदूरी, निर्माण कार्य और खेती-किसानी जैसे कामों से नई जिंदगी शुरू करते हैं.
बच्चों का भविष्य अब सबसे बड़ी उम्मीद
पाकिस्तान से आए कई परिवारों का कहना है कि उन्होंने अपना भविष्य नहीं, बल्कि अपने बच्चों का भविष्य बदलने के लिए भारत आने का फैसला किया. यहां अब बिना नाम बदले आजादी में रहने का मौका मिल रहा है.
पाकिस्तान में लूटपाट और असुरक्षा की बात करने वाले कई लोगों का कहना है कि भारत आने के बाद मानसिक शांति सबसे बड़ा बदलाव है.
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दिक्कतें आज भी हैं... लेकिन जिंदगी बदल गई
पाकिस्तान से आए हिंदू मानते हैं कि भारत में अभी भी कई चुनौतियां हैं. नागरिकता, आधार कार्ड, दूसरे सरकारी दस्तावेज और रोजगार जैसी समस्याएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं.
लेकिन उनके मुताबिक एक बात सबसे बड़ी है—अब डर उनकी जिंदगी का हिस्सा नहीं है. यही भावना लगभग हर उस परिवार की कहानी में दिखाई देती है, जिसने पाकिस्तान में अपना घर छोड़ा, लेकिन भारत आकर एक नई जिंदगी बनाने की कोशिश शुरू की.