ब्रिक्स देशों की साझा करेंसी को लेकर पिछले कुछ समय से अटकलें तेज थीं. माना जा रहा था कि ब्रिक्स देश डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए किसी नई करेंसी या साझा भुगतान व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं. लेकिन फिलहाल ऐसा कोई ठोस फैसला या प्रस्ताव सामने नहीं आया है. सरकार ने साफ किया है कि BRICS में अभी जोर साझा करेंसी बनाने के बजाय सदस्य देशों के बीच लोकल करेंसी में द्विपक्षीय व्यापार और पेमेंट सिस्टम को मजबूत करने पर है.
नई दिल्ली में चल रहे दो दिवसीय BRICS समिट के पहले दिन के बाद विदेश मंत्रालय में आर्थिक संबंधों के सचिव सुधाकर दलेला ने कहा कि फिलहाल BRICS में किसी साझा करेंसी का कोई प्रस्ताव नहीं है. उन्होंने कहा कि लोकल करेंसी में ट्रेड सेटलमेंट को लेकर BRICS देशों के बीच कुछ समय से चर्चा चल रही है और यह कोई नया विषय नहीं है. उनके मुताबिक, द्विपक्षीय व्यापार में लोकल करेंसी का इस्तेमाल ट्रांजैक्शन कॉस्ट कम करने का एक व्यावहारिक तरीका है. दलेला ने कहा कि इसे मौजूदा ग्लोबल पेमेंट और सेटलमेंट सिस्टम के पूरक के तौर पर बढ़ावा दिया जा रहा है. इसका मकसद देशों के बीच व्यापार को आसान बनाना और लागत कम करना है.
पीयूष गोयल का लोकल करेंसी पर जोर
इससे पहले 11 सितंबर को भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने BRICS देशों से अपने पेमेंट सिस्टम को जोड़ने और लोकल करेंसी में व्यापार बढ़ाने की अपील की थी. BRICS बिजनेस फोरम 2026 के उद्घाटन सत्र में पीयूष गोयल ने कहा कि भारत का UPI अब 11 देशों में भी स्वीकार किया जा रहा है. उन्होंने BRICS सदस्य और पार्टनर देशों से अपने पेमेंट सिस्टम को जोड़ने, एक-दूसरे की लोकल करेंसी में व्यापार करने और डिजिटल ट्रेड को बढ़ावा देने की अपील की. खास बात यह है कि गोयल ने भी अपने संबोधन में किसी साझा BRICS करेंसी का प्रस्ताव नहीं रखा.
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नई दिल्ली डिक्लेरेशन में क्या कहा गया?
नई दिल्ली डिक्लेरेशन में भी BRICS देशों के बीच लोकल करेंसी के इस्तेमाल से व्यापार और निवेश बढ़ाने पर जारी चर्चा का जिक्र किया गया है. डिक्लेरेशन में ब्रिक्स देशों की राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का सम्मान करने की बात कही गई है. साथ ही यह भी माना गया है कि इस मामले में सभी देशों के लिए एक जैसा फॉर्मूला लागू नहीं किया जा सकता. यानी BRICS के भीतर फिलहाल बातचीत का फोकस नई साझा करेंसी बनाने से ज्यादा मौजूदा लोकल करेंसी के जरिए व्यापार और भुगतान को आसान बनाने पर है.
ब्रिक्स करेंसी को लेकर अमेरिका की चिंता
BRICS की साझा करेंसी और डॉलर पर निर्भरता कम करने यानी डी-डॉलराइजेशन की चर्चाओं ने अमेरिका का ध्यान भी खींचा है. डोनाल्ड ट्रंप नवंबर 2024 में, जब दूसरे कार्यकाल के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति-निर्वाचित हुए थे, उन्होंने ट्रुथ सोशल पर BRICS देशों को चेतावनी दी थी. उन्होंने कहा था कि अगर BRICS देश नई करेंसी बनाते हैं या अमेरिकी डॉलर के विकल्प के तौर पर किसी दूसरी करेंसी का समर्थन करते हैं, तो उन्हें 100 फीसदी टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है.
BRICS किन देशों का समूह है?
BRICS में शुरुआत में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे. 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई और सऊदी अरब समूह में जुड़े. 2025 में इंडोनेशिया भी इसका सदस्य बना. इसके अलावा बेलारूस, बोलिविया, कजाखस्तान, क्यूबा, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम BRICS पार्टनर देश बने. यह ग्रुप दुनिया की करीब 49.5% आबादी, करीब 40% GDP और करीब 26% ग्लोबल ट्रेड का प्रतिनिधित्व करता है.