बिहार के गया में चल रहे विश्व प्रसिद्ध 15 दिवसीय पितृपक्ष मेले में देश-विदेश से पिंडदानी तीर्थ यात्रियों के पहुंचने का सिलसिला जारी है. कोई अपने माता-पिता के मोक्ष की कामना लेकर गया पहुंचा है, तो कोई अपने पति, भाई-भाभी और उनके बच्चों के लिए पिंडदान कर रहा है. पिंडदानी तीर्थ यात्री गया के विष्णुपद मंदिर क्षेत्र और फल्गु नदी के तट के समीप पिंडदान, श्राद्ध कर्म और तर्पण कर रहे हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष के दौरान गया में पिंडदान और श्राद्ध कर्म का विशेष महत्व है. माना जाता है कि विष्णुपद मंदिर क्षेत्र और फल्गु नदी के समीप पिंडदान, श्राद्ध कर्म और तर्पण करने से मृत पितरों को मोक्ष मिलता है. साथ ही उनके वंशजों को पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है और कई पीढ़ियों का उद्धार होता है.
इसी धार्मिक मान्यता के साथ देश के अलग-अलग हिस्सों से तीर्थ यात्री गया पहुंच रहे हैं. यहां कोई बेटा अपने माता-पिता के लिए पिंडदान कर रहा है, तो कोई बेटी अपने पूर्वजों की मोक्ष की कामना लेकर कर्मकांड कर रही है. कोई अपने पति के लिए पिंडदान करने पहुंचा है, तो कोई परिवार के दूसरे सदस्यों और पूर्वजों के लिए यह धार्मिक अनुष्ठान कर रहा है. उत्तर प्रदेश से गया पहुंचे एक पिंडदानी तीर्थ यात्री ने बताया कि जिला प्रशासन की ओर से पिंडदान करने आने वाले तीर्थ यात्रियों के लिए अच्छी व्यवस्था की गई है. तीर्थ यात्री विधि-विधान के साथ पिंडदान कर रहे हैं.
गयासुर से जुड़ी है पिंडदान की कथा
पिंडदान से जुड़ी धार्मिक कथा का भी तीर्थ यात्रियों ने उल्लेख किया. उत्तर प्रदेश से आए तीर्थ यात्री ने बताया कि मान्यता के अनुसार गया में गयासुर नाम का एक असुर था. उसके ऊपर देवताओं ने 100 वर्ष तक यज्ञ किया था. यज्ञ समाप्त होने के बाद गयासुर उठकर चलने लगा, जिससे देवता परेशान हो गए. इसके बाद भगवान विष्णु आए और उन्होंने गयासुर के ऊपर अपना चरण रखा. इससे गयासुर का प्राण निकल गया. इसके बाद भगवान विष्णु ने गयासुर से वरदान मांगने को कहा. मान्यता के अनुसार गयासुर ने वरदान मांगा कि जो भी व्यक्ति गया आकर अपने पितरों का पिंडदान करे, उसके पितरों को मोक्ष और स्वर्गलोक की प्राप्ति हो.
तीर्थ यात्री के मुताबिक भगवान विष्णु ने गयासुर को यह वरदान दिया. इसी मान्यता के साथ लोग आज भी गया पहुंचकर अपने पितरों के लिए पिंडदान करते हैं. गया के विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरणों के निशान होने की भी धार्मिक मान्यता है. यहां भी तीर्थ यात्री पिंडदान करते हैं. महाराष्ट्र से गया पहुंचे पिंडदानी तीर्थ यात्री सेवक राम ने बताया कि यहां तीर्थ यात्रियों के लिए अच्छी व्यवस्था की गई है और किसी भी यात्री को किसी तरह की परेशानी नहीं हो रही है. उन्होंने बताया कि वह अपने माता-पिता, भाई-भाभी और उनके बच्चों का पिंडदान करने के लिए गया पहुंचे हैं.
सेवक राम ने बताया कि मान्यता है कि गया में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वे स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान करते हैं. उन्होंने पिंडदान से जुड़ी एक और धार्मिक कथा का जिक्र किया. सेवक राम के मुताबिक धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्रीराम और माता सीता राजा दशरथ का पिंडदान करने के लिए गया आए थे. जब श्रीराम पूजा की सामग्री लेने गए, तभी राजा दशरथ का हाथ नदी से निकला और उन्होंने माता सीता से पिंड देने को कहा. मान्यता के अनुसार माता सीता ने बालू का पिंड बनाकर राजा दशरथ को दिया था. सेवक राम ने कहा कि भगवान विष्णु को पता है कि जो लोग मन से पिंडदान करते हैं, उनके पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है.
पितृपक्ष मेले में राजस्थान और गौहाटी समेत देश के अलग-अलग हिस्सों से भी पिंडदानी तीर्थ यात्री पहुंचे हैं. सभी अपने-अपने पूर्वजों की मोक्ष की कामना लेकर गया में पिंडदान और श्राद्ध कर्म कर रहे हैं. गया के जिलाधिकारी शशांक शुभंकर ने बताया कि सोमवार को गया में काफी ज्यादा तीर्थ यात्रियों की भीड़ रही. उन्होंने बताया कि एक दिन में गया आने वाले तीर्थ यात्रियों की संख्या 3 लाख 95 हजार दर्ज हुई है. जिलाधिकारी के मुताबिक, आज 9 हजार 768 तीर्थ यात्रियों ने मेडिकल सुविधा का लाभ लिया. वहीं 70 वृद्ध तीर्थ यात्रियों ने व्हीलचेयर का इस्तेमाल किया.
एक दिन में 3 लाख 95 हजार तीर्थ यात्रियों की रिकॉर्ड संख्या
मेले के दौरान खोया-पाया व्यवस्था के जरिए भी तीर्थ यात्रियों की मदद की जा रही है. जिलाधिकारी ने बताया कि सोमवार को मेला क्षेत्र से 87 लोग गायब हुए थे, जिन्हें खोया-पाया के माध्यम से उनके परिवारों से मिलाया गया. जिलाधिकारी के अनुसार अभी तक गया आने वाले यात्रियों की कुल संख्या 4 लाख 60 हजार 200 दर्ज की गई है. पितृपक्ष के दौरान गया में देश-विदेश से पहुंच रहे तीर्थ यात्री अपने पितरों के मोक्ष की कामना के साथ विष्णुपद मंदिर क्षेत्र और फल्गु नदी के समीप पिंडदान, श्राद्ध कर्म और तर्पण कर रहे हैं.