सुबह-सुबह स्कूल जाने की तैयारी. कोई बैग टांग रहा है, कोई कॉपी-किताब संभाल रहा है. लेकिन बिहार के बाढ़ जिले में कुछ बच्चों के लिए स्कूल पहुंचना इतना आसान नहीं है. इनके सामने पहले एक नदी आती है. और नदी पार करने के लिए न कोई पुल है, न नाविक. तो फिर बच्चे क्या करते हैं? एक जुगाड़ की नाव पर बैठते हैं और रस्सी पकड़कर खुद ही उसे खींचते हुए नदी पार करते हैं. यानी नाव भी खुद चलानी है और फिर स्कूल भी पहुंचना है.
ये मामला बिहार के बाढ़ जिले के टाल इलाके का है. यहां मुहाने नदी में पानी भरने के बाद कुछ बच्चों के लिए स्कूल जाना मुश्किल हो गया है. ये बच्चे एकडंगा पंचायत की छोटी सी बस्ती आजाद नगर के रहने वाले हैं. इनका स्कूल नदी के दूसरी तरफ है. बच्चे मोगलचक गांव स्थित प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते हैं.
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गंगा में आई बाढ़ के बाद मुहाने नदी में भी पानी भर गया. अब स्कूल जाने के लिए नदी पार करनी पड़ेगी. गांव में पहले से पीपा पुल में इस्तेमाल होने वाला लोहे का एक कैप्सूल पड़ा था. गांव वालों ने इसी कैप्सूल को जुगाड़ की नाव बना दिया. कैप्सूल को एक रस्सी से बांध दिया गया और नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे तक जाने का रास्ता तैयार हो गया. लेकिन इस जुगाड़ में एक बड़ा जोखिम भी है. इस नाव को चलाने के लिए कोई नाविक नहीं है.
करीब दस बच्चे रोजाना इसी जुगाड़ की नाव से नदी पार कर स्कूल जाते हैं. बच्चे कैप्सूल में बैठते हैं और रस्सी को खींचते हुए खुद ही नदी पार करते हैं.
नाव में बच्चे... लेकिन कोई बड़ा नहीं
वीडियो में बच्चों का पढ़ाई के प्रति जज्बा जरूर दिखाई देता है. लेकिन साथ ही एक डर भी है. बच्चों के साथ कोई वयस्क नजर नहीं आता. यानी नदी पार करने की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं मासूम बच्चों के कंधों पर है. अगर रस्सी में कोई दिक्कत आ जाए, कैप्सूल का संतुलन बिगड़ जाए या पानी का बहाव तेज हो जाए तो स्थिति खतरनाक हो सकती है.

पढ़ाई जरूरी है. स्कूल जाना भी जरूरी है. लेकिन सवाल है कि क्या स्कूल जाने के लिए बच्चों को रोज अपनी जान जोखिम में डालनी चाहिए? प्राथमिक विद्यालय मोगलचक के प्रभारी शिक्षक आदर्श अनिकेत का कहना है कि बच्चों के स्कूल आने-जाने में खतरा बना रहता है. उन्होंने बताया कि अभिभावकों से बच्चों के साथ स्कूल आने की बात कही जा चुकी है.
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लेकिन दिक्कत ये है कि ज्यादातर अभिभावक मजदूरी करने निकल जाते हैं. ऐसे में बच्चों को खुद ही स्कूल आना-जाना पड़ता है. वहीं बाढ़ के प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी अमित कुमार ने बताया कि बच्चों के गांव से स्कूल तक जाने के लिए सड़क का रास्ता भी है. हालांकि वह रास्ता करीब दो किलोमीटर का है. अधिकारियों के मुताबिक, दूरी कम करने के लिए बच्चे और उनके अभिभावक नदी वाला शॉर्टकट रास्ता चुन रहे हैं. अभिभावकों को बच्चों को सुरक्षित सड़क मार्ग से स्कूल भेजने के निर्देश दिए गए हैं.
जब बच्चों को पढ़ने के लिए रोज नदी पार करनी पड़े और नदी पार करने के लिए उन्हें खुद रस्सी खींचकर जुगाड़ की नाव चलानी पड़े, तो सवाल ये है कि आखिर इन बच्चों के लिए सुरक्षित रास्ते की व्यवस्था कौन करेगा?क्योंकि पढ़ाई के लिए हौसला जरूरी है. लेकिन बच्चों की सुरक्षा उससे भी ज्यादा जरूरी है.