बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हो रहा का उपचुनाव अब एक रोचक जंग में तब्दील हो गया है. अब ये लड़ाई देश का सबसे हाई प्रोफाइल मुकाबला बना हुआ है, क्योंकि एक तरफ बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन के सियासी गढ़ को बचाने की है तो दूसरी तरफ चुनावी रणनीतिकार से नेता बने 'जन सुराज' पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर हैं. पीके खुद इस सीट से मैदान में उतरे हैं, जो उनका चुनावी डेब्यू है.
नितिन नवीन के विधायकी से इस्तीफे देने के बाद बांकीपुर उपचुनाव में बीजेपी ने पहले अभिषेक कुमार को उतारा था, लेकिन बाद में उनकी जगह पर नीरज कुमार सिन्हा पर दांव खेला है. नीरज सिन्हा बीजेपी के जमीनी कार्यकर्ता हैं, जिनके चुनावी मैदान उतरने के बाद पीके इसे अपनी मनोवैज्ञानिक जीत बता रहे हैं. लेकिन, बांकीपुर की जमीनी हकीकत और अंकगणित कुछ और ही बयां कर रहे हैं.
बांकीपुर में नीरज सिन्हा को भले ही राजनीतिक विश्लेषक कमजोर उम्मीदवार बताए जा रहे हों, लेकिन प्रशांत किशोर के चुनावी चक्रव्यूह को ध्वस्त करने का माद्दा रखते हैं. इसके पीछे बांकीपुर सीट के क्या कारण हैं, जिसके दम पर बीजेपी एक बार फिर से यह सीट जीतने का दावा कर रही है?
बांकीपुर 'बीजेपी का अभेद्य किला'
बांकीपुर सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि बीजेपी का सबसे मजबूत गढ़ है. पिछले नौ चुनावों से यहां सिर्फ और सिर्फ कमल खिलता आया है. 1995 से लगातार बीजेपी बांकीपुर सीट जीतती आ रही है. बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन पांच बार विधायक रहे हैं तो उससे पहले उनके पिता नवीन किशोर सिन्हा लगातार चार बार विधायक रहे हैं. इस तरह यह सीट नितिन नवीन के परिवार के मजबूत गढ़ के रूप में तब्दील हो चुकी है.
नितिन नवीन ने राज्यसभा चुने जाने के बाद विधायकी से इस्तीफा दे दिया था. इसके चलते ही बांकीपुर सीट पर उपचुनाव हो रहे हैं. नितिन नवीन की परंपरागत सीट होने के चलते बीजेपी को मात देना आसान नहीं है. इसकी वजह यह है कि पिछले तीन चुनाव में बीजेपी की जीत का आंकड़ा विपक्षी कैंडिडेट को मिले वोट से ज्यादा वोटों का था. पीके की पार्टी की 2025 के चुनाव में बांकीपुर सीट पर जमानत जब्त हो गई थी.
बांकीपुर सीट पर शहरी वोटरों में बीजेपी की जड़ें इतनी गहरी हैं कि यहां उम्मीदवार का चेहरा गौण हो जाता है, और वोट 'नरेंद्र मोदी' तथा 'कमल निशान' के नाम पर ही पड़ता है. अब बीजेपी ने भले ही नीरज कुमार सिन्हा को उतार रखा है, लेकिन साख नितिन नवीन की लगी हुई है. इसीलिए नितिन नवीन ने बीजेपी उम्मीदवार को जिताने के लिए दो दिन तक बांकीपुर सीट पर डेरा जमा रखा था.
जातिय के चक्रव्यूह में फंसे पीके
बांकीपुर विधानसभा सीट का जाति समीकरण ही बीजेपी के जीत का कारण बनता रहा. यहां पर कुल कुल मतदाताओं की संख्या करीब 3 लाख 91 हजार है. यहां पर सबसे ज्यादा मतदाता कायस्थ समुदाय के हैं. माना जाता है कि 14 फीसदी कायस्थ वोटर हैं, जो 60 से 65 हजार है. कायस्थ वोटों के चलते ही बीजेपी 1995 के चुनाव से लगातार जीत रही है. नितिन नवीन भी कायस्थ समुदाय से आते हैं.
कायस्थ समुदाय के बाद दूसरे नंबर पर यादव वोटर हैं, जो 12 फीसदी (55 से 60 हजार) है. इसके अलावा मुस्लिम वोटर 10 फीसदी, चंद्रवंशी 9 फीसदी, वैश्य समुदाय 9 फीसदी, दलित 8 फीसदी, भूमिहार 7 फीसदी, ब्राह्मण 7 फीसदी, राजपूत 5 फीसदी, कुर्मी 5 फीसदी और कुशवाहा समाज का 3 फीसदी वोट है.
बांकीपुर सीट पर सबसे निर्णायक भूमिका कायस्थ समाज की है, जो पारंपरिक रूप से भाजपा का कोर वोटर माना जाता रहा है. बांकीपुर का सामाजिक ताना-बाना पूरी तरह से बीजेपी के अनुकूल है. इस क्षेत्र में कायस्थ, ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत जैसे सवर्ण वोटरों की संख्या सबसे अधिक है. इसके साथ ही वैश्य समुदाय की भी बड़ी आबादी है. प्रशांत किशोर इन सवर्ण वोटों में सेंध लगाने की कोशिश में हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि बीजेपी के कोर सवर्ण और वैश्य वोटर किसी नए प्रयोग के बजाय पारंपरिक रूप से बीजेपी के साथ ही खड़े रहते हैं. नीरज कुमार सिन्हा भी कायस्थ हैं.
नितिन नवीन का मजबूत कैडर व नेटवर्क
बीजेपी ने बांकीपुर सीट पर भले ही अपना उम्मीदवार बदलकर नीरज कुमार सिन्हा पर दांव लगाया है, लेकिन संगठन की कमान अभी भी नितिन नवीन और उनके वफादार कार्यकर्ताओं के हाथों में है. बांकीपुर में बीजेपी के पास पन्ना प्रमुखों और बूथ अध्यक्षों की ऐसी फौज है जो दशकों से सक्रिय है. इसके विपरीत, प्रशांत किशोर की 'जन सुराज' एक नई पार्टी है, जिसके पास अभी बांकीपुर जैसे शहरी और पारंपरिक क्षेत्र में मजबूत बूथ-स्तरीय ढांचा नहीं है.
वोटिंग के दिन वोटर को बूथ तक लाने का काम कैडर करता है, जहां बीजेपी बेहद मजबूत है. तीन दशक से नितिन नवीन का परिवार ही बांकीपुर सीट पर चुनाव लड़ता रहा है, जिसके चलते पार्टी का कैडर और नेटवर्क बहुत ही मजबूत है. बीजेपी अपने इसी कैडर के सहारे बांकीपुर का उपचुनाव जीतने का तानाबाना बुन रही है, जिसके लिए अपने नेताओं की पूरी फौज उतार रखी है. बिहार की सत्ता में बीजेपी है, जिसका लाभ नीरज कुमार को मिल सकता है.
बांकीपुर में आरजेडी भी कमजोर नहीं
बांकीपुर में लड़ाई केवल पीके बनाम बीजेपी नहीं है बल्कि त्रिकोणीय बन रही है. राष्ट्रीय जनता दल ने बांकीपुर सीट से रेखा कुमारी को मैदान में उतारा है. आरजेडी का अपना एक निश्चित वोट बैंक (यादव और मुस्लिम) है, जिसे अपने साथ मजबूती से जोड़े रखने की कवायद में है. इसके अलावा वैश्य वोटर के सहारे बांकीपुर के चुनाव त्रिकोणीय मुकाबला बना रही है.
बांकीपुर सीट पर कुर्मी, चंद्रवंशी और कोइरी मतदाताओं की भी अच्छी संख्या है. प्रशांत किशोर सवर्ण और अतिपिछडे समाज के वोटबैंक के सहारे अपनी जीत का तानाबाना बुन रहे थे. आरजेडी ने वैश्य समाज की रेखा गुप्ता को प्रत्याशी बनाकर नया समीकरण गढ़ने का दांव चल दिया है, जिससे बीजेपी के कोर वोटबैंक के छिटकने का खतरा पैदा हो गया तो प्रशांत किशोर के लिए सियासी टेंशन बन गया है.
नीरज कुमार कैसे पीके पर पड़ेंगे भारी
उपचुनाव में विपक्षी (एंटी-बीजेपी) वोट आरजेडी और जन सुराज में बंट सकता है.. वोटों का यह बिखराव सीधे तौर पर बीजेपी के उम्मीदवार के लिए जीत की राह को बेहद आसान बना देगा, चाहे वह उम्मीदवार कितना भी लो-प्रोफाइल क्यों न हो. प्रशांत किशोर 60 प्रतिशत उन वोटरों पर नजर गड़ाए हुए हैं जो आमतौर पर वोट देने नहीं निकलते. वे नीट पेपर लीक और स्थानीय मुद्दों को उठाकर हवा बनाने की कोशिश जरूर कर रहे हैं, लेकिन बीजेपी की जड़ें काफी गहरी हैं. यही नीरज कुमार सिन्हा की सबसे बड़ी ताकत है.
बांकीपुर की 'शहरी और वैचारिक' राजनीति में बीजेपी का ब्रांड नेम इतना बड़ा है कि पीके के लिए इस किले को ढहाना सिर्फ चुनावी रणनीतियों के भरोसे मुमकिन नहीं दिखता, यहां बीजेपी का संगठन ही उसके सबसे कमजोर चेहरे को भी 'भारी' बना देता है. बीजेपी ने चुनाव से पहले जन सुराज पार्टी के तीन नेताओं को तोड़कर बांकीपुर सीट पर अपने सियासी गणित को मजबूत ही नहीं किया बल्कि पीके के गेम को भी बिगाड़ने की कवायद की है.