दिल्ली-NCR में इन दिनों मौसम सिर्फ उमस और बारिश का नहीं, वायरस की भी खबर दे रहा है. H1N1 यानी स्वाइन फ्लू के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और अस्पतालों की ओपीडी में खांसी, बुखार और सांस से जुड़ी शिकायत लेकर पहुंचने वालों की संख्या भी बढ़ी है. दिल्ली के स्वास्थ मंत्री पंकज कुमार सिंह के मुताबिक दिल्ली में इस साल अब तक इन्फ्लुएंजा के करीब 3,000 मामले सामने आए हैं, जिनमें 2,308 मामले H1N1 इंफेक्शन के हैं.
अब जरा इस खबर को अपनी डेली ड्राइविंग और कार राइड से जोड़िए. ऑफिस जाते हुए, बच्चों को स्कूल छोड़ते हुए या ट्रैफिक में फंसे हुए कार का बंद केबिन बाहर की दुनिया से भले आपको बचाता दिखे, लेकिन ये आपके लिए खतरनाक हो सकता है. ख़ासकर तब, जब आपके साथ कोई और भी कार में मौजूद हो और वो व्यक्ति संक्रमित हो. एक स्टडी का कहना है कि, यदि कार का AC लगातार केबिन की हवा को रीसर्कुलेट कर रहा है, तो यही बंद केबिन इंफेक्शन बढ़ा सकता है.
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दिल्ली-NCR में H1N1 के बढ़ते मामलों के बीच कार के अंदर हवा के इस गणित को समझना बेहद जरूरी है. हालांकि एक बात यह भी है कि, ICMR ने साफ किया है कि भारत में H1N1 का कोई नया स्ट्रेन सामने नहीं आया है. मौजूदा वायरस पहले से मौजूद H1N1 ही है और फिलहाल किसी नए खतरे की बात सामने नहीं आई है. लेकिन केस बढ़ रहे हैं, इसलिए सावधानी को हल्के में लेने की वजह भी नहीं है.
कब और कैसे हुई स्टडी
2009 में आए इंफ्लुएंजा A(H1N1) यानी स्वाइन फ्लू महामारी के दौरान ऑस्ट्रेलिया में कार से यात्रा के दौरान इंफेक्शन फैलने का एक मामला सामने आया था. जिसके बाद वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि बंद कार में हवा के जरिए फ्लू फैलने का जोखिम कितना होता है और इसे किस तरह कम किया जा सकता है.
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन (NLM) एक स्टडी कहती है कि, कार के अंदर हवा के जरिए फ्लू इंफेक्शन का खतरा बढ़ने की संभावना काफी ज्यादा है. इस स्ट्डी में 1989 और 2005 मॉडल की दो कारों में वेंटिलेशन यानी हवा के आने-जाने के सिस्टम की जांच की गई. इसके लिए Wells-Riley मॉडल का इस्तेमाल किया गया. ताकि यह पता लगाया जा सके कि, कार के बंद केबिन के भीतर इंफेक्शन फैलने का खतरा कितना ज्यादा हो सकता है. और इस स्ट्डी में चौकानें हुए खुलासे हुए.
स्टडी की रिपोर्ट जानने से पहले यह भी समझना जरूरी है कि, आखिर Wells-Riley मॉडल क्या होता है? दरअसल, Wells-Riley मॉडल एक वैज्ञानिक तरीका होता है, जिसका इस्तेमाल यह जानने के लिए किया जाता है कि किसी बंद जगह में हवा के जरिए संक्रमण किस हद तक फैल सकता है. इसमें इंफेक्टेड व्यक्ति की मौजूदगी, उसके सांस लेने या खांसने से हवा में फैलने वाले इंफेक्टेड पाटिकल्स (कण), कमरे या कार का साइज, हवा का रीसर्कुलेशन रेट, सफर में लगने वाला समय और लोगों की संख्या जैसे प्वाइंट्स को ध्यान में रखा जाता है.
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आसान भाषा में कहें तो यह मॉडल बताता है कि अगर संक्रमित व्यक्ति और दूसरे लोग एक ही बंद हवा में हैं, तो संक्रमण फैलने की संभावना कितनी बढ़ सकती है. कार जैसे छोटे और बंद केबिन में इसका इस्तेमाल यह समझने के लिए किया जाता है कि, विंडो बंद रखने और AC को रीसर्कुलेशन मोड पर चलाने से हवा में संक्रमण का जोखिम किस तरह बदल सकता है.
90 मिनट के सफर में 99.9 फीसदी तक जोखिम
इस स्टडी में पाया गया कि, कार में हवा को बार-बार अंदर ही घुमाने यानी रीसर्कुलेट करने के बजाय बाहर की ताजी हवा आने देने से इंफेक्शन का खतरा कम किया जा सकता है. खास तौर पर नए मॉडल की कार में अगर AC को रीसर्कुलेशन मोड पर चलाया जाए, तो 90 मिनट की यात्रा के दौरान अनुमानित संक्रमण का जोखिम 59 फीसदी से लेकर 99.9 फीसदी तक पहुंच सकता है. यानी लंबे समय तक बंद कार में किसी संक्रमित व्यक्ति के साथ सफर करना बीमारी को फैलने का खतरा बढ़ा देता है.
कार में कैसे फैलता है इंफेक्शन
फ्लू से इंफेक्टेड व्यक्ति के खांसने, छींकने, बात करने या सामान्य रूप से सांस लेने के दौरान बेहद छोटे इंफेक्टेड पाटिकल्स हवा में फैल सकते हैं. कार का केबिन छोटा और बंद होने के कारण ये कण आसपास की हवा में जमा हो सकते हैं. अगर बाहर की ताजी हवा अंदर नहीं आ रही है, तो न केवल इन पाटिकल्स की मात्रा बढ़ेगी बल्कि खतरा भी बढ़ेगा. वहीं AC का रीसर्कुलेशन मोड इस समस्या को और बढ़ा सकता है. इस मोड में कार का AC केबिन के अंदर की हवा को ही बार-बार घुमाता है और बाहर से ताजी हवा कम आती है.
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सिर्फ हवा ही नहीं, सरफेस से भी खतरा
कार में केवल केबिन एयर से ही खतरा नहीं है बल्कि सरफेस भी इस जोखिम को और बढ़ा सकता है. इंफेक्टेड व्यक्ति के खांसने या छींकने से वायरस वाले पाटिकल्स सीट बेल्ट, दरवाजे के हैंडल, स्टीयरिंग व्हील, इंफोटेंमेंट सिस्टम जैसे बार-बार छुए जाने वाले हिस्सों तक पहुंच सकते हैं. इन चीजों को छूने के बाद अगर कोई व्यक्ति अपने चेहरे, नाक या मुंह को छूता है, तो इंफेक्शन का खतरा पैदा हो सकता है. ख़ासतौर पर टचस्क्रीन इंफोटेंमेंट सिस्टम और अंदर के डोर हैंडल जिसका इस्तेमाल खूब होता है.
विंडो डाउन से मदद
कार में होने वाले इंफेक्शन के जोखिम को कम करने के लिए सबसे आसान उपायों में से एक है बाहर की ताजी हवा को अंदर आने देना. खिड़कियों को थोड़ा खोलने से कार के अंदर जमा इंफेक्टेड एयर बाहर निकल सकती है और हवा में मौजूद पाटिकल्स की मात्रा कम हो सकती है. इसके साथ ही AC या हीटर के रीसर्कुलेशन मोड को बंद रखना भी फायदेमंद हो सकता है.
मास्क और सैनेटाइज़र
यदि आपको किसी ऐसे व्यक्ति के साथ ही यात्रा करना मजबूरी है, जिसकी तबीयत खराब है या जिसको लेकर डर है कि वो इंफेक्टेड है. तो इस स्थिति में मास्क पहनना बेहद जरूरी है. ख़ासतौर पर यदि आप किसी लंबे सफर हों. इसके अलावा कार के अंदर स्टीयरिंग व्हील, डोर हैंडल, सीट बेल्ट और दूसरे पार्टस की लगातार सफाई करते रहें. और कार में एक सैनेटाइज़र जरूर रखें ताकि हाथ से फैलने वाले वायरस के जोखिम को कम किया जा सके.