बढ़ती महंगाई, महंगे मकान और बिगड़ती सरकारी सेवाओं के खिलाफ यूरोप में लोगों का गुस्सा सड़कों पर फूट रहा है. फ्रांस, इटली और अल्बानिया में विरोध प्रदर्शनों के बीच गिरफ्तारियों से लेकर हिंसा तक की घटनाएं सामने आ रही हैं. वहीं, स्पेन और पुर्तगाल में घरों की बढ़ती कीमतों के खिलाफ टेंट लगाकर विरोध जाताया जा रहा है. आखिर यूरोप क्यों सुलग रहा है?
सबसे पहले फ्रांस की बात करते हैं. फ्रांस में, जहां लोगों के विरोध का सदियों पुराना रिवाज है. वहां, स्कूली छात्रों ने इस प्रदर्शन को शुरू किया. वे खराब शिक्षा व्यवस्था, स्कूलों में पर्याप्त स्टाफ की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे. तीन हफ्ते से ज्यादा समय तक इन्होंने नाकेबंदी और प्रदर्शन किया. लेकिन यह प्रदर्शन तब बढ़ गया जब फ्रांस की CGT लेबर यूनियन और दूसरे एक्टिविस्ट भी इसमें शामिल हो गए. जबकि स्टूडेंट्स ने इसे फॉल ब्रेक के लिए ब्रेक किया. इस आंदोलन में अब कॉस्ट ऑफ लिविंग के खर्च और सरकारी सेवाओं से जुड़ी मांगें भी शामिल हैं.
फ्रांस, इटली और स्पेन समेत कई शीर्ष यूरोपियन इकॉनमी के अहम चुनावों के करीब आने पर शहर जंग के मैदान बन गए हैं. यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब यूरोप यूक्रेन के सपोर्ट में एक अहम मोड़ का सामना कर रहा है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से बात कर रहे हैं.
इमिग्रेंट्स इस तबाही के लिए जिम्मेदार: ट्रंप
ट्रंप ने इमिग्रेंट्स को इस तबाही के लिए जिम्मेदार ठहराया है. हालांकि, फ्रांस अधिकारियों और पुलिस ने इमिग्रेंट्स को दोषी नहीं ठहराया है.इन विरोध प्रदर्शनों को निराश युवाओं ने हवा दी. फ्रांस में काले कपड़े पहने, नकाबपोश आंदोलनकारियों समेत दूसरे लोगों ने हिंसा भड़काई है.
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने शनिवार को हुई हिंसा की निंदा की. उन्होंने कट्टर वामपंथी कार्यकर्ताओं पर इमारतों और पुलिस को निशाना बनाकर अशांति फैलाने का आरोप लगाया. वहीं, स्पेन में शिक्षा व्यवस्था को लेकर भी नाराजगी देखने को मिल रही है. प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों के शिक्षकों ने पिछले हफ्ते मैड्रिड में बेहतर वेतन और कामकाज की स्थिति की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू की. इस साल स्पेन के दूसरे इलाकों में भी शिक्षक इसी तरह के विरोध प्रदर्शन कर चुके हैं.
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किफायती घरों की कमी बनी युवाओं की परेशानी
यूरोप में युवाओं की नाराजगी की एक बड़ी वजह घरों की बढ़ती कीमतें और महंगा किराया भी है. कई शहरों में युवाओं के लिए अपनी कमाई के दम पर घर लेना या किराए पर रहना मुश्किल होता जा रहा है. इसी समस्या के खिलाफ स्पेन और पुर्तगाल में लोग विरोध कर रहे हैं और कई जगहों पर टेंट लगाकर अपना विरोध जता रहे हैं.
यह विरोध 87 साल की मैरीकारमेन नाम की महिला को निकाले जाने से शुरू हुआ था. बाद में उनकी अस्पातल में मौत हो गई थी. जिसके बाद यह विरोध शुरू हुआ और स्पेन के दूसरे शहरों में भी छोटे प्रोटेस्ट कैंप लगाए गए.
बार्सिलोना में भी बड़े प्रोटेस्ट हुए. स्थानीय अखबार के मुताबिक, स्पेन में न्यूनतम वेतन 1,221 यूरो (USD 1,370) है, जबकि 80-स्क्वायर-मीटर के अपार्टमेंट का मासिक किराया लगभग 1,130 यूरो (लगभग USD 1,270) है. ऐसे में लोग सड़कों पर निकलकर इसके खिलाफ प्रोटेस्ट कर रहे हैं.
बढ़ती महंगाई और आर्थिक संकट के खिलाफ हो रहे प्रोटेस्ट
इटली की बात करें तो वहां, बढ़ती महंगाई और आर्थिक संकट के खिलाफ मिलान सहित कई शहरों में हिंसक प्रदर्शन हुए हैं. इटली के लोग बेहतर रोजगार और बेहतर स्वास्थ्य की मांग कर रहे हैं.
स्वास्थ्य, सेवा, शिक्षा, आवास और बेहतर वेतन की मांगों के साथ लोग सड़कों पर उतर आए हैं. सितंबर में इटली में महंगाई दर 4.2% तक पहुंच गई है. जो यूरोजोन की 3.8% की दर से ज्यादा है. ट्यूरिन, बोलोग्ना और मिलान में शांतिपूर्ण प्रदर्शन अब हिंसक रूप ले चुके हैं. यहां उपद्रवियों की पुलिस के साथ झड़प हुई. उन्होंने दुकानों में लूटपाट की और संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया. अब इन प्रदर्शनों को काबू में करने के लिए इटली की सरकार ने कड़े कदम उठाए हैं.
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने सोशल मीडिया पर नए कानून की जानकारी देते हुए कहा कि तोड़फोड़ और चोरी करना कोई क्रांतिकारी काम नहीं है. उन्होंने कहा कि तोड़फोड़ और चोरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपराध है.
नए प्रावधान तुरंत लागू हो गए हैं. इसके तहत कम से कम पांच लोगों के समूह में प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाले व्यक्ति को पांच साल तक की जेल और अधिकतम 20 हजार यूरो का जुर्माना हो सकता है. अगर प्रदर्शन के दौरान चेहरा ढका गया हो या किसी व्यक्ति को चोट लगी हो तो सजा और बढ़ सकती है.
अल्बानिया में क्यों हो रहा विरोध
अल्बानिया की राजधानी तिराना में रविवार को लगातार छठे दिन सरकार के खिलाफ प्रदर्न हुए. इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच फिर झड़पें हुईं. ये हालात तब और बिगड़ गए जब हाई स्कूल और यूनिवर्सिटी के छात्र भी सरकार विरोधी 'फ्लेमिंगो' आंदोलन में शामिल हो गए. प्रदर्शनकारी समाजवादी प्रधानमंत्री एडि रामा के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं.
प्रधानमंत्री रामा ने इन प्रदर्शनों की आलोचना की है. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों को एंटीफा के जरिए वैचारिक रूप से प्रभावित कर कट्टर बनाया जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस आंदोलन के पीछे आतंकी संगठन का हाथ बताया है.
अल्बानिया के इस आंदोलन की सबसे अहम मांग भ्रष्टाचार को खत्म करना है. इसका नाम 'फ्लेमिंगो' के प्राकृतिक आवास से जुड़ा है. इसी इलाके में रामा सरकार ने एक बड़े लग्जरी पर्यटन प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है.
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सर्बिया में भी सत्ता के खिलाफ युवाओं की चुनौती
सर्बिया में यूनिवर्सिटी के छात्र लगभग दो सालों से भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े प्रदर्शन कर रहे हैं. अब वे इस महीने होने वाले संसदीय चुनावों में अलेक्जेंडर वुसिक की वापसी को चुनौती दे रहे हैं. पूर्व राष्ट्रपति वुसिक 25 अक्टूबर को होने वाले मतदान के बाद प्रधानमंत्री के रूप में वापसी करना चाहते हैं. वहीं, युवाओं के समर्थन वाली स्टूडेंट्स लिस्ट पार्टी उनकी पार्टी को कड़ी चुनौती दे रही है.
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