कलकत्ता HC से ऋतब्रत बनर्जी को झटका! नेता प्रतिपक्ष पद पर नियुक्ति को बताया 'अस्थायी', स्पीकर की भूमिका पर सवाल

पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है. कलकत्ता हाईकोर्ट ने बागी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाए रखने का आदेश दिया है. डिवीजन बेंच ने टीएमसी की अंतरिम राहत याचिका खारिज करते हुए मामले को सिंगल बेंच के पास वापस भेजा है, जो दो महीने में अंतिम फैसला सुनाएगी.

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अब सिंगल बेंच दो महीने में अपना आखिरी फैसला सुनाएगी. (Photo- PTI) अब सिंगल बेंच दो महीने में अपना आखिरी फैसला सुनाएगी. (Photo- PTI)

इंद्रजीत कुंडू

  • कोलकाता,
  • 18 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 10:39 PM IST

पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष पद को लेकर चल रहे विवाद को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा आदेश आया है. अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) रतींद्र बोस के बागी तृणमूल कांग्रेस विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त करने के फैसले को 'अस्थायी' करार दिया है.

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा है कि ये फैसला फिलहाल 'न्यायिक समीक्षा' के अधीन है. हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस मामले को वापस सिंगल बेंच के पास भेज दिया है. 

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अदालत ने निर्देश दिया है कि ऋतब्रत बनर्जी की नियुक्ति सिर्फ दो महीने की अवधि के लिए लागू रहेगी. दो महीने के भीतर जस्टिस कृष्णा राव की सिंगल बेंच को स्पीकर की भूमिका और उनके फैसले की निष्पक्षता पर अंतिम निर्णय लेना होगा.

डिवीजन बेंच ने उठाया प्रक्रिया पर सवाल

जस्टिस शंपा सरदार और जस्टिस अजय कुमार गुप्ता की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में स्पीकर रतींद्र बोस की अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए. अदालत ने कहा, 'हमारा मानना है कि स्पीकर को दोनों गुटों को बुलाना चाहिए था, उनसे संबंधित दस्तावेज जमा करने को कहना चाहिए था और पार्टी के संविधान, नियमों व कोड आदि पर विचार करना चाहिए था.'

अदालत ने आगे कहा, 'क्या माननीय स्पीकर का कदम लोकतांत्रिक आदर्शों, तटस्थता और निष्पक्षता के सिद्धांतों के उलट था. इसका फैसला विद्वान एकल न्यायाधीश को करना चाहिए. अगर प्रक्रिया की अवैधता मामले की जड़ तक जाती है और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का हनन करती है, तो स्पीकर का फैसला न्यायिक समीक्षा के अधीन आता है.'

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क्या था पूरा विवाद?

3 जून को स्पीकर रतींद्र बोस ने टीएमसी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष नियुक्त किया था, जब ऋतब्रत ने ज्यादातर टीएमसी विधायकों के समर्थन का दावा किया था. वहीं, टीएमसी का आरोप था कि उनके दावे को नजरअंदाज किया गया और 20 मई को ही भेजे गए उनके पत्र पर स्पीकर ने कोई ध्यान नहीं दिया.

टीएमसी के शुरुआती दावे पर जवाब देने में स्पीकर की ओर से की गई देरी पर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ये देरी सिर्फ एक मामूली 'प्रक्रियात्मक गड़बड़ी' नहीं थी.

पार्टी के वजूद और संविधान पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बागी विधायक पार्टी की 'इच्छा, अनुशासन और फैसलों' को दरकिनार नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें अपना जनादेश काफी हद तक पार्टी के चुनाव चिन्ह और उसकी नीतियों के आधार पर मिलता है. 

बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि राजनीतिक दलों का अस्तित्व और पहचान चुनाव जीतकर आए व्यक्तिगत सदस्यों से परे होती है. ऐसे में विधायक दल में विभाजन की स्थिति में नेता प्रतिपक्ष तय करते समय पार्टी की इच्छा एक अहम कारक है.

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सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ दायर हुई थी याचिका

इससे पहले जस्टिस कृष्णा राव की सिंगल बेंच ने स्पीकर के फैसले पर स्टे (रोक) लगाने से इनकार कर दिया था. इसके बाद टीएमसी की ओर से नेता प्रतिपक्ष पद के मूल उम्मीदवार शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने सिंगल बेंच के आदेश को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच में याचिका दाखिल की थी. अब ये मामला वापस सिंगल बेंच के पास है, जिसका आगामी दो महीनों में आने वाला फैसला राज्य की राजनीति का रुख तय करेगा.

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