चोट लगी तो मिला मौका... सीनियर लौटे तो छुट्टी! भारतीय टेस्ट टीम का नया ट्रेंड

श्रीलंका दौरे के लिए सारांश जैन को भारतीय टेस्ट टीम में मौका मिला है, लेकिन क्या यह सिर्फ वॉशिंगटन सुंदर की चोट का नतीजा है? पिछले दो साल में आकाश दीप, हर्षित राणा, अंशुल कंबोज और हर्ष दुबे जैसे कई गेंदबाजों को डेब्यू या टीम में जगह तो मिली, लेकिन लगातार मौके नहीं मिले. आखिर भारतीय टेस्ट टीम में नए गेंदबाजों को तैयार किया जा रहा है या वे सिर्फ चोटिल खिलाड़ियों के अस्थायी विकल्प बनकर रह गए हैं?

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टीम इंडिया में टिकना मुश्किल! (Photo, ITG/Getty) टीम इंडिया में टिकना मुश्किल! (Photo, ITG/Getty)

आजतक स्पोर्ट्स डेस्क

  • नी दिल्ली,
  • 29 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 12:05 PM IST

टीम इंडिया में सिर्फ अच्छा खेलना काफी नहीं है. सही समय पर सही खिलाड़ी का चोटिल होना भी जरूरी है. सुनने में यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन पिछले दो साल में भारतीय टेस्ट टीम के चयन पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ ऐसी ही दिखती है.

श्रीलंका दौरे के लिए चुने गए 33 साल के ऑफ स्पिनर सारांश जैन इसकी ताजा मिसाल हैं. घरेलू क्रिकेट में लगातार शानदार प्रदर्शन करने के बावजूद उन्हें टेस्ट टीम में जगह तब मिली, जब वॉशिंगटन सुंदर हैमस्ट्रिंग चोट के कारण बाहर हो गए. सवाल यह नहीं है कि सारांश इस मौके के हकदार थे या नहीं. सवाल यह है कि अगर सुंदर फिट होते, तो क्या सारांश आज भारतीय टीम में होते?

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यही सवाल पिछले दो वर्षों में कई खिलाड़ियों पर लागू होता है.

खाली कुर्सी दिखी... नाम आ गया

भारतीय टेस्ट टीम में नए गेंदबाजों का चयन अब कई बार किसी लंबी योजना का हिस्सा नहीं दिखता, बल्कि जरूरत के हिसाब से खाली जगह भरने जैसा नजर आता है.

हर्ष दुबे को अफगानिस्तान टेस्ट के लिए बुलाया गया, लेकिन डेब्यू नहीं मिला. जैसे ही रवींद्र जडेजा फिट हुए, उनका नाम टीम से गायब हो गया.

मुकेश कुमार को मौका तब मिला, जब शार्दुल ठाकुर फिट नहीं थे. कुछ टेस्ट खेलने के बाद वह भी बाहर हो गए और फिर वापसी नहीं हुई.

अंशुल कंबोज इंग्लैंड में चोटिल खिलाड़ियों के विकल्प बने. एक टेस्ट खेला और फिर चयनकर्ताओं की योजनाओं से बाहर हो गए.

यानी कई खिलाड़ियों की किस्मत उनके प्रदर्शन से पहले किसी और की फिटनेस तय कर रही है.

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भारत विकल्प तैयार कर रहा है या सिर्फ बैकअप?

किसी भी बड़ी टीम को भविष्य के लिए खिलाड़ी तैयार करने पड़ते हैं. लेकिन भारत में कई गेंदबाज 'सक्सेसर' नहीं, बल्कि 'स्टैंडबाय' बनकर रह जाते हैं.

आकाश दीप इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. उन्होंने 10 टेस्ट में 28 विकेट निकाले. इंग्लैंड में मैच जिताऊ प्रदर्शन किया. इसके बावजूद अगले कई महीनों तक उन्हें लगातार मौके नहीं मिले.

हर्षित राणा सीमित ओवरों में टीम इंडिया की पहली पसंद बन गए, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में दो मैचों के बाद उनका रास्ता बंद हो गया.

अगर कोई गेंदबाज अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी टीम में अपनी जगह पक्की नहीं कर पा रहा, तो सवाल सिर्फ खिलाड़ी पर नहीं, चयन की सोच पर भी उठता है.

बल्लेबाजों के लिए अलग नियम?

दिलचस्प बात यह है कि यही सख्ती बल्लेबाजों पर नजर नहीं आती. बी साई सुदर्शन शुरुआत में असफल रहे, फिर भी उन्हें दोबारा मौका मिला. करुण नायर को भी लंबा रन दिया गया. यानी बल्लेबाजों को यह भरोसा मिलता है कि एक-दो खराब मैच से करियर खत्म नहीं होगा.

गेंदबाजों को शायद यह भरोसा नहीं मिलता.

क्या WTC की मजबूरी है?

वर्ल्ड टेस्ट चैम्पियनशिप ने हर टेस्ट को बेहद अहम बना दिया है. हार का असर सीधे फाइनल की दौड़ पर पड़ता है. इसलिए टीम प्रबंधन जोखिम कम लेना चाहता है और अनुभवी खिलाड़ियों पर भरोसा करता है.

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लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. अगर नए गेंदबाज सिर्फ तब खेलेंगे, जब कोई सीनियर चोटिल होगा, तो भविष्य की तेज गेंदबाजी इकाई तैयार कैसे होगी?

आज जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद सिराज और रवींद्र जडेजा भारत की ताकत हैं. लेकिन अगले तीन-चार वर्षों में इन्हीं जगहों पर नए चेहरे चाहिए होंगे. सवाल यह है कि क्या उन खिलाड़ियों को आज पर्याप्त मौके मिल रहे हैं?

सारांश जैन की कहानी सिर्फ सारांश की नहीं

33 साल की उम्र में सारांश जैन के पास इंतजार करने के लिए ज्यादा वक्त नहीं है. अगर उन्हें श्रीलंका में डेब्यू मिल भी जाता है, तो असली चुनौती विकेट लेना नहीं होगी.

असली चुनौती होगी अगली टीम में अपना नाम बचाए रखना. क्योंकि पिछले दो वर्षों का रिकॉर्ड यही कहता है कि भारतीय टेस्ट टीम में डेब्यू मिलना आसान हो गया है, लेकिन टिकना पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल.


 

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