'मैं भारत से नहीं... धरती से हूं', अंतरिक्ष से पृथ्वी देखकर शुभांशु शुक्ला की सोच क्यों बदल गई?

अंतरिक्ष में बिताए 20 दिनों ने शुभांशु शुक्ला को धरती और जिंदगी को देखने का एक नया नजरिया दिया. ISS से धरती का नजारा, स्पेस की विशालता, मिशन की चुनौतियां और गगनयान के लिए मिली सीख, उन्होंने अपने अनुभवों के जरिए साझा की.

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भारतीय एस्ट्रोनॉट और वायु सेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने एक मीडिया इंटरव्यू में अपने अनुभव शेयर किए. (File Photo: PTI) भारतीय एस्ट्रोनॉट और वायु सेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने एक मीडिया इंटरव्यू में अपने अनुभव शेयर किए. (File Photo: PTI)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 17 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 4:19 PM IST

भारतीय अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने अंतरिक्ष में बिताए 20 दिनों का अपना अनुभव साझा किया है. उन्होंने बताया कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) से धरती को देखने के बाद उनका नजरिया बदल गया. उन्हें लगा कि वह सिर्फ भारत से नहीं, बल्कि पूरी धरती से जुड़े हैं. शुभांशु शुक्ला पिछले साल Axiom-4 मिशन के तहत ISS पहुंचे थे और चार दशक से ज्यादा समय बाद अंतरिक्ष में जाने वाले दूसरे भारतीय बने.

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शुभांशु ने बताया कि धरती से हमें दुनिया बहुत बड़ी लगती है, लेकिन अंतरिक्ष से देखने पर यह भी ब्रह्मांड के सामने बहुत छोटी दिखती है. उन्होंने बताया कि बृहस्पति ग्रह में करीब 1300 धरतियां समा सकती हैं. इसके बाद सौर मंडल, मिल्की वे और उससे भी बड़े हिस्से हैं. इसलिए अंतरिक्ष की विशालता को देखना उनके लिए एक अलग अनुभव था.

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अंतरिक्ष में जाने के लिए सिर्फ उड़ान की ट्रेनिंग काफी नहीं होती. वहां एक अंतरिक्ष यात्री को कई तरह के काम करने पड़ सकते हैं. शुभांशु ने बताया कि उन्हें डॉक्टर, वैज्ञानिक और मैकेनिक जैसे कई कामों की ट्रेनिंग दी गई. उन्होंने माइक्रोबायोलॉजी और मेडिकल प्रक्रियाएं भी सीखीं.

अंतरिक्ष में पहुंचते ही बहुत कुछ बदल जाता है

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शुभांशु ने बताया कि माइक्रोग्रैविटी में चीजें वैसे काम नहीं करतीं, जैसे धरती पर करती हैं. अंतरिक्ष में पहुंचने के बाद कई चीजें नई होती हैं. उन्हें वहीं जाकर समझना पड़ता है. यही वजह है कि अंतरिक्ष यात्री को बहुत अच्छी ट्रेनिंग दी जाती है.

उन्होंने अंतरिक्ष यात्रा को 'मैनेज्ड क्राइसिस' यानी ऐसी मुश्किल स्थिति बताया, जिसके लिए पहले से तैयारी की जाती है. अंतरिक्ष में हवा और पानी जैसी जीवन के लिए जरूरी चीजें मौजूद नहीं होतीं. रॉकेट से उड़ान के समय भी बहुत ज्यादा ताकत और ऊर्जा का सामना करना पड़ता है. इसके लिए मिशन से पहले लगातार ट्रेनिंग और कई स्तरों पर जांच होती है.

Axiom-4 से गगनयान को क्या सीख मिली?

शुभांशु के मुताबिक Axiom-4 मिशन का एक बड़ा मकसद वहां से ज्यादा से ज्यादा सीखना और उस अनुभव का इस्तेमाल भारत के गगनयान मिशन में करना था. मिशन के दौरान इसरो की एक टीम भी मौजूद थी, जिसने पूरी प्रक्रिया को करीब से देखा और समझा.

Axiom मिशन में क्रू ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट और Falcon 9 रॉकेट स्पेसएक्स के थे. वहीं गगनयान के लिए इसरो अपना स्पेसक्राफ्ट और कैप्सूल तैयार कर रहा है. शुभांशु ने बताया कि दोनों मिशनों में यही बड़ा अंतर है. Axiom एक निजी कंपनी है, जो मिशन को कोऑर्डिनेट कर रही थी, जबकि गगनयान में भारत अपना हार्डवेयर और पूरी व्यवस्था खुद तैयार कर रहा है.

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अंतरिक्ष से धरती देखकर क्या महसूस हुआ?

शुभांशु ने बताया कि ISS से धरती को देखने पर उन्हें पहली बार लगा कि यह पूरा ग्रह उनका घर है. उन्होंने खुद को सिर्फ भारत से जुड़ा हुआ नहीं महसूस किया, बल्कि पूरी धरती से जुड़ा महसूस किया.

उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष की विशालता देखकर यह भी समझ आता है कि ब्रह्मांड के सामने इंसान और धरती कितने छोटे हैं. धरती हमें बहुत बड़ी लगती है, लेकिन अंतरिक्ष से देखने पर इसका पैमाना अलग नजर आता है.

ISS की पानी बचाने वाली तकनीक

शुभांशु ने बताया कि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर करीब 98 फीसदी पानी को दोबारा इस्तेमाल के लिए रिसाइकिल किया जाता है. उनके मुताबिक, अगर ऐसी तकनीक को धरती पर बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जा सके तो पानी बचाने में काफी मदद मिल सकती है.

जेन जी और जेन अल्फा के बच्चों के लिए शुभांशु ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी के पास नए सपने देखने की काफी आजादी है. लेकिन सिर्फ सपना देखना काफी नहीं है. किसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए लंबे समय तक उसके साथ जुड़े रहना और लगातार मेहनत करना जरूरी है.

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उन्होंने कहा कि आज लोगों के सामने चीजों की कमी से ज्यादा समस्या बहुत सारे विकल्प और ध्यान भटकाने वाली चीजों की है. इसलिए अपने लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखना जरूरी है. उनके मुताबिक, कोई बड़ा काम एक-दो दिन में नहीं होता. उसके लिए लंबे समय तक मेहनत करनी पड़ती है. उन्होंने स्कायरुट का उदाहरण देते हुए बताया कि आज जो काम नजर आ रहा है, उसके पीछे करीब 10 साल की मेहनत है.

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अंतरिक्ष यात्री का ज्यादातर समय धरती पर ही गुजरता है

शुभांशु ने बताया कि एक अंतरिक्ष यात्री अपने करीब 40 साल के करियर में आम तौर पर 2-3 बार ही अंतरिक्ष जा सकता है. अगर हर मिशन करीब छह महीने का हो, तो तीन मिशन में कुल करीब 1.5 साल अंतरिक्ष में बीतेंगे. बाकी करीब 38.5 साल धरती पर ही गुजरते हैं. इसलिए उन्होंने कहा कि सिर्फ अंतरिक्ष में जाने का इंतजार करने के बजाय धरती पर रहते हुए किए जा रहे काम का आनंद लेना जरूरी है.

गगनयान का मिशन अलग होगा

शुभांशु ने बताया कि ISS मिशन में पहले से चल रहे स्पेस स्टेशन पर प्रयोग किए जाते हैं और फिर वापस धरती पर आया जाता है. वहीं गगनयान भारत का अपना मानव अंतरिक्ष मिशन होगा. इसमें तकनीक और सिस्टम की जांच करना, ग्राउंड टीम से संपर्क बनाए रखना. इंसानों को सुरक्षित अंतरिक्ष तक ले जाकर वापस लाना मुख्य काम होगा.

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