भूटान में गासा जिले के लुंगो इलाके में वाकिला पर्वत के नीचे समुद्र तल से करीब 4480 मीटर की ऊंचाई पर शिंताफू झील (Sintaphu Tsho या Shintaphu Lake) है. यह मो छू (Mo Chu) नदी के ऊपरी हिस्से में बनी एक ग्लेशियल झील है. मो छू नीचे जाकर फो छू से मिलती है. पुनाखा के पास से पुनात्सांगछू बन जाती है.
भारत में पहुंचकर यही नदी संकोश के नाम से जानी जाती है. आगे ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है. इसी वजह से भूटान में झील फटने का असर सीधे पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी, कूचबिहार और असम के धुबरी जैसे इलाकों तक पहुंच सकता है. यह झील मोरेन (ग्लेशियर द्वारा छोड़ी गई मिट्टी-पत्थर की दीवार) से बंधी हुई है.
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इसका क्षेत्रफल लगभग 2.38 लाख वर्ग मीटर और पानी की मात्रा करीब 62 लाख घन मीटर बताई जाती है. 2021 की स्टडी में इसे संभावित खतरनाक ग्लेशियल झील (Potentially Dangerous Glacial Lake) की श्रेणी में रखा गया था. भूटान की नेशनल सेंटर फॉर हाइड्रोलॉजी एंड मेटियोरोलॉजी (NCHM) ने भी इसे 17 संभावित खतरनाक झीलों में शामिल किया है.
2021 की स्टडी ने क्या चेतावनी दी थी
2021 में विल्फ्राइड हैग और उनके सहयोगियों ने Applied Sciences जर्नल में “Hazard Assessment for a Glacier Lake Outburst Flood in the Mo Chu River Basin, Bhutan” नाम की स्टडी प्रकाशित की. उन्होंने हाइड्रोडायनामिक मॉडलिंग के जरिए 9 अलग-अलग परिदृश्यों का सिमुलेशन किया. स्टडी में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं. नई झीलें बन रही हैं. पुरानी झीलें बड़ी हो रही हैं. इससे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की आशंका बढ़ रही है.
स्टडी के मुताबिक शिंताफू झील का आकार और ग्लेशियर से नजदीकी इसे खतरनाक बनाते हैं. मॉडलिंग से पता चला कि सबसे खराब स्थिति में भी आवासीय इमारतों को ज्यादा नुकसान नहीं होगा, लेकिन सड़कें, पुल, खेत और इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो सकते हैं. इससे 120 किलोमीटर से ज्यादा दूर स्थित जलविद्युत परियोजनाओं के संचालन पर भी असर पड़ सकता है. सोलर प्लांट डैमेज हुआ.
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स्टडी ने यह भी चेताया कि कम रिजोल्यूशन वाले ऊंचाई मॉडल से बाढ़ का अनुमान गलत हो सकता है, इसलिए हाई रिजोल्यूशन डेटा जरूरी है. यह स्टडी आज की घटना को समझने का आधार बन गया है क्योंकि उसी झील से पानी निकलने की खबर आई है. ग्लेशियल झील तब बनती है जब ग्लेशियर पीछे हटता है. गड्ढे में पिघला पानी जमा होता है. यह पानी अक्सर कमजोर मोरैन डैम से रोका जाता है.
जब भारी बारिश, बर्फ पिघलना, भूकंप, हिमस्खलन या अंदरूनी दबाव से डैम टूटता है तो अचानक भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर दौड़ पड़ता है. इसे GLOF कहते हैं. पानी की रफ्तार बहुत तेज होती है और यह मलबा, पेड़, पत्थर और मिट्टी साथ लेकर चलता है. हिमालय क्षेत्र में ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं क्योंकि ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. भूटान में पहले भी 1994 में लुग्गे त्सो झील फटने से 21 लोगों की मौत हो चुकी है. 2015 में भी एक घटना हुई थी.
शिंताफू झील के मामले में गुरुवार 29 अक्टूबर 2026 की शाम पानी निकलने की रिपोर्ट आई. पानी मो छू नदी के रास्ते नीचे की ओर बढ़ा. भूटान में कुछ जगहों पर सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं, बेली ब्रिज गिरे और लाया क्षेत्र का संपर्क टूटा. गासा की हॉट स्प्रिंग्स भी प्रभावित हुईं. पानी की मात्रा कुछ रिपोर्टों में 74 लाख घन मीटर तक बताई गई, जो झील की मूल क्षमता के आसपास है.
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भारत में अलर्ट और प्रशासन की तैयारियां
भारत में सेंट्रल वॉटर कमीशन (CWC) ने विशेष सलाह जारी की. पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले में संकोश नदी के किनारे कुमारग्राम, पाकरीगुड़ी, भोल्का, चेंगमाड़ी और आसपास के चाय बागानों तथा वन गांवों में अलर्ट जारी किया गया. वन मंत्री मनोज कुमार उरांव ने लोगों से सुरक्षित जगहों पर शिफ्ट होने की अपील की.
अलीपुरद्वार पुलिस अधीक्षक के अनुसार करीब 4 से 5 हजार लोग स्कूलों जैसे राहत शिविरों में पहुंचाए गए. छह हजार से ज्यादा लोग सुरक्षित स्थानों पर चले गए. कुल मिलाकर दस हजार से ज्यादा लोगों को शिफ्ट किया गया. NDRF और SDRF की टीमें तैनात हैं. सिविल डिफेंस टीम भी सक्रिय है. प्रशासन भूटान अधिकारियों के संपर्क में है.
संकोश नदी सिस्टम पर रेड अलर्ट जारी है. असम के धुबरी और पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी, कूचबिहार तथा दार्जिलिंग पहाड़ी इलाकों में भी सतर्कता बरती जा रही है. अधिकारियों का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है, घबराने की जरूरत नहीं, लेकिन सावधानी जरूरी है. पानी के साथ मृत मछलियां, लकड़ी और मलबा आने की आशंका जताई गई है.
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जलवायु परिवर्तन और हिमालय की बढ़ती चुनौती
यह घटना सिर्फ एक झील की नहीं बल्कि पूरे हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र की समस्या को उजागर करती है. ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. 1980 से 2018 के बीच दुनिया भर में ग्लेशियल झीलों की संख्या और क्षेत्रफल करीब 50 प्रतिशत बढ़ गया. भूटान में ग्लेशियर क्षेत्र 1980 से 2010 के बीच 23 प्रतिशत से ज्यादा घटा.
मो छू बेसिन में भी यही रुझान देखा गया. नई झीलें बन रही हैं. पुरानी बड़ी हो रही हैं. इससे GLOF का खतरा बढ़ रहा है. 2021 की स्टडी और NCHM के आकलन ने पहले ही चेताया था. वैज्ञानिक मॉडलिंग से पता चलता है कि बाढ़ का असर दूर तक पहुंच सकता है. जलविद्युत परियोजनाएं, खेती और गांव प्रभावित हो सकते हैं.
इसलिए नियमित निगरानी, हाई रिजोल्यूशन सैटेलाइट इमेजरी, अर्ली वार्निंग सिस्टम और समुदाय आधारित तैयारियां जरूरी हैं. भारत और भूटान के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था इस बार काम आई, जिससे समय पर अलर्ट जारी हो सका और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सका.
शिंताफू झील की घटना हमें याद दिलाती है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं रह गए हैं. नीचे मैदानों में भी असर पहुंच रहा है. 2021 की स्टडी में सुझाया गया था कि आपातकालीन कार्य योजनाएं तैयार रखी जाएं. अब जरूरत है कि ऐसी योजनाओं को अपडेट किया जाए, संवेदनशील क्षेत्रों में निकासी मार्ग साफ रखे जाएं और लोगों को जागरूक किया जाए.
अधिकारियों का फोकस अभी पानी के बहाव की निगरानी पर है. आने वाले घंटों में स्थिति और साफ होगी. फिलहाल प्रशासन पूरी तरह तैयार है. लोगों से अपील है कि अफवाहों पर ध्यान न दें, आधिकारिक सूचनाओं का पालन करें और नदी किनारे के इलाकों से दूर रहें. यह घटना वैज्ञानिक स्टडी की उपयोगिता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग दोनों की मिसाल है. हिमालय की नाजुक ईकोसिस्टम को बचाने और आपदाओं से निपटने के लिए निरंतर शोध, निगरानी और तैयारी ही सबसे बड़ा बचाव है.
ऋचीक मिश्रा