हिमालय में खतरे के बीच बन रहे होटल-घर, 3 लाख लोगों पर बाढ़ का खतरा, स्टडी में खुलासा

हिमालय में होटल, घर और सड़कें तेजी से बन रही हैं, लेकिन इन इलाकों में बाढ़ और ग्लेशियर झीलों के फटने का खतरा भी बढ़ रहा है. नई स्टडी ने चेतावनी दी है कि करीब 3 लाख लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं.

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आपको हिमालयी शहरों में इस तरह इमारतें जरूर दिख जाएंगी. (Photo: Getty) आपको हिमालयी शहरों में इस तरह इमारतें जरूर दिख जाएंगी. (Photo: Getty)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 29 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 1:07 PM IST

हिमालय के जिन इलाकों में बाढ़ आने और ग्लेशियर झीलों के फटने का खतरा है, वहां तेजी से घर, होटल और सड़कें बन रही हैं. एक नई स्टडी के मुताबिक, नेपाल, दक्षिण-पूर्वी तिब्बत और भारत के उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में करीब 3 लाख लोग ऐसे इलाकों में रह रहे हैं, जहां प्राकृतिक आपदाओं का खतरा है. साल 2016 से 2023 के बीच इन इलाकों में निर्माण करीब 45% बढ़ा है. वहीं, ग्लेशियर झीलों से बाढ़ के खतरे वाले इलाकों में निर्माण करीब 78% बढ़ गया है.

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यह स्टडी साइंटिफिक रिपोर्ट्स नाम की रिसर्च जर्नल में छपी है. इसे ब्रिटेन, नेपाल और भारत के 9 शोधकर्ताओं ने किया है. उन्होंने हिमालय की नदियों से 50 किलोमीटर तक के इलाकों और करीब 1,360 ग्लेशियर झीलों के आसपास के क्षेत्रों का अध्ययन किया. शोधकर्ताओं का कहना है कि खतरे में रहने वाले लोगों की संख्या 3 लाख से भी ज्यादा हो सकती है, क्योंकि स्टडी में आसपास के सभी इलाकों को शामिल नहीं किया गया.

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नदियों के किनारे बढ़ रहे घर और होटल

स्टडी के मुताबिक, हिमालय के कई इलाकों में पर्यटन के लिए होटल, सड़कें और दूसरी इमारतें तेजी से बनाई जा रही हैं. नेपाल का पोखरा शहर इसका एक उदाहरण है. यह शहर घूमने आने वाले लोगों के बीच काफी मशहूर है. पिछले 30 साल में यहां पर्यटकों की संख्या बढ़ी है और इसके साथ ही इमारतों की संख्या भी बढ़ी है.

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पोखरा शहर के बीच से सेती गांडकी नदी बहती है. शहर के मेयर धना राज आचार्य के मुताबिक, यहां कुछ पुरानी इमारतें नदी से सिर्फ 5 मीटर दूर हैं. नए नियमों के मुताबिक, नदी से सुरक्षित दूरी पर इमारतें बननी चाहिए. लेकिन पुरानी इमारतों को हटाना आसान नहीं है.

नेपाल के अन्नपूर्णा इलाके में भी नदियों के किनारे होटल और घर बनाए गए हैं. हाल में आई बाढ़ और पहाड़ों से मिट्टी-पत्थर खिसकने की घटनाओं से यहां नुकसान हुआ है. इन घटनाओं का असर पर्यटन के काम पर भी पड़ा है.

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ग्लेशियर झील फटी तो आ सकती है बाढ़

हिमालय में कई ग्लेशियर झीलें हैं. ग्लेशियर पहाड़ों पर जमी बर्फ के बड़े हिस्से होते हैं. तापमान बढ़ने से ये बर्फ तेजी से पिघल रही है. इससे झीलों में पानी बढ़ रहा है. अगर झील का किनारा टूट जाए, तो पानी तेजी से नीचे की ओर बह सकता है. इससे रास्ते में आने वाले घर, सड़कें और पुल बह सकते हैं.

नेपाल में साल 1940 के बाद से ग्लेशियर झीलों के फटने से बाढ़ आने की करीब 30 घटनाएं दर्ज की गई हैं. इसके अलावा, पहाड़ों पर तेज बारिश होने से मिट्टी और पत्थर नीचे गिर सकते हैं. इससे पहाड़ों के नीचे बसे गांवों और शहरों को नुकसान हो सकता है.

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तापमान बढ़ने से भी बढ़ रहा खतरा

वैज्ञानिकों के मुताबिक, हिमालय में तापमान बढ़ने की रफ्तार दुनिया के औसत से करीब दोगुनी है. इससे ग्लेशियर और पहाड़ों पर जमी बर्फ तेजी से पिघल रही है. इसके कारण पहाड़ों की जमीन कमजोर हो सकती है. भूकंप आने पर भी पहाड़ों से मिट्टी और पत्थर खिसकने का खतरा बढ़ जाता है. इससे नदियों के किनारे बसे इलाकों में बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है.

एक्सपर्ट्स  का कहना है कि कई जगह नदियों के किनारे निर्माण रोकने के नियम हैं, लेकिन उनका ठीक से पालन नहीं हो रहा है. नेपाल में बाढ़ से प्रभावित कुछ नदी किनारे के इलाकों में निर्माण पर रोक लगाने की तैयारी की जा रही है. वहीं, उत्तराखंड सरकार ने 12 अक्टूबर को बाढ़ के मैदानों में निर्माण और जमीन के इस्तेमाल को लेकर नए नियमों को मंजूरी दी. इनका मकसद बाढ़ से लोगों, घरों और जरूरी सुविधाओं को होने वाले नुकसान को कम करना है.

एक्सपर्ट्स  के मुताबिक, हिमालय जैसे इलाकों में घर, होटल और सड़कें बनाने से पहले वहां के खतरे को समझना जरूरी है. नदियों और ग्लेशियर झीलों के पास बिना योजना के निर्माण होने से बाढ़ के समय ज्यादा नुकसान हो सकता है. इसलिए नियम बनाने के साथ-साथ उनका पालन कराना भी जरूरी है.

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